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इंदिरा एकादशी की व्रत कथा: वाजपेय यज्ञ के समान फल देती है यह कथा, श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था इस एकादशी व्रत का महत्व

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Oct 06, 2026 06:18 am IST,  Updated : Oct 06, 2026 06:18 am IST

पितरों का उद्धार करने वाली इंदिरा एकादशी इस बार 6 अक्टूबर को मनाई जा रही है। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी व्रत को करने से सात पीढ़ियों तक के पितरों को मोक्ष मिल जाता है। यहां आप जानेंगे इस एकादशी का महत्व और पौराणिक कथा।

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इंदिरा एकादशी व्रत कथा Image Source : INDIA TV

पितृ पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार ये एकादशी 6 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। यह एकादशी पितरों की मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए बेहद पुण्यदायी मानी जाती है। कहते हैं इस दिन व्रत रखने से न केवल पितरों की आत्मा तृप्त होती है, बल्कि व्रती को भी उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को मनचाहा वरदान मिलता है। अगर आपने भी इंदिरा एकादशी का व्रत रखा है तो इस दिन ये पावन कथा जरूर पढ़ें।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

एक समय धर्मराज युधिष्ठिर भगवान कृष्ण से कहने लगे कि मैंने भाद्रपद शुक्ल एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब कृपा करके आप मुझे आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बतलाइये। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि आश्विन कृष्ण एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी सभी पापों को नष्ट करने वाली और पितरों को मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! तुम ध्यानपूर्वक इस पावन एकादशी की कथा को सुनो। इसेके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिल जाता है। इंदिरा एकादशी व्रत कथा इस प्रकार है;

सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी थी जिसमें इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा अपनी प्रजा का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा अपनी सभा में बैठे थे, तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उनकी सभा में पधारे। राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और उन्होंने उन्हें विधिपूर्वक आसन व सम्मान दिया। इसके बाद नारद मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं और आपकी बुद्धि धर्म में और मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद के ऐसे वचन सुनकर राजा ने कहा: हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल मंगल है। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए।

तब ऋषि ने कहा कि हे राजन! मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया था वहां यमराज से पूजित होकर मैंने सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में मैंने आपके धर्मात्मा पिता को देखा जो एकादशी का व्रत भंग होने के कारण वहां कष्ट भोग रहे थे। मैं उनका संदेश लेकर आया हूं उन्होंने कहा है कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण वे यमराज के निकट रह रहे हैं। उन्होंने कहा है कि यदि आप आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी का व्रत उनके निमित्त करें तो उन्हें स्वर्ग अवश्य प्राप्त होगा। ये सुनकर राजा ने महर्षि से इस व्रत को करने की विधि पूछी।

नारदजी ने कहा कि आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर अपने पितरों का श्रद्धापूर्व श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। फिर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें और प्रतिज्ञा करें कि मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा। हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार शालिग्राम भगवान की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को फलाहार का भोजन कराएं और दक्षिणा दें। फिर ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि से भगवान का पूजन करें। 

रात में जागरण करें और इसके बाद द्वादशी के दिन प्रात:काल भगवान का फिर से पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएं। अपने परिवार सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन यदि आप इस विधि से एकादशी का व्रत करोगे तो आपके पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को प्राप्त होंगे। नारदजी के बताए अनुसार राजा ने अपने बांधवों और दासों सहित व्रत किया। जिससे राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। इतना ही नहीं इस एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर खुद भी स्वर्गलोक को गया।

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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