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Rishi Panchami Vrat Katha: ऋषि पंचमी पर जरूर पढ़ें यह पौराणिक कथा, इसके बिना अधूरी मानी जाती है पूजा

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Sep 15, 2026 07:31 am IST,  Updated : Sep 15, 2026 07:57 am IST

सनातन धर्म में ऋषि पंचमी का खास महत्व माना जाता है। यह कोई त्यौहार नहीं है, बल्कि सप्त ऋषियों को श्रद्धांजलि देने और रजस्वला दोष से शुद्ध होने हेतु स्त्रियों द्वारा मनाया जाने वाला व्रत है। जानिए यह व्रत क्यों रखा जाता है और इसकी पावन कथा क्या है।

rishi panchami vrat katha- India TV Hindi
ऋषि पंचमी व्रत कथा Image Source : INDIA TV

ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं व्रत रहती हैं। यह व्रत रजस्वला दोष से मुक्ति पाने के लिए रखा जाता है। इस व्रत में सप्त-ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती है। हिन्दू धर्म में माहवारी के समय स्त्रियों द्वारा बहुत से नियमों का पालन किया जाता हैं। कहते हैं अगर गलती से किसी कारण इस समय में कोई भूल हो जाती है, तो महिलाओं को इस दोष से मुक्ति पाने के लिए ही ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। बता दें इस साल ऋषि पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त 15 सितंबर 2026 की सुबह 10:50 से दोपहर 01:18 बजे तक रहेगा। यहां आप जानेंगे ऋषि पंचमी की पावन कथा के बारे में।

ऋषि पंचमी की व्रत कथा

ऋषि पंचमी की कथा अनुसार, विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण देव रहा करते थे। उनकी पत्नी सुशीला बड़ी ही पतिव्रता थी। उनका एक पुत्र और एक पुत्री थी। जब कन्या विवाह योग्य हुई तो ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह कुल-परम्परा के अनुसार एक श्रेष्ठ कुटुम्ब में कर दिया। लेकिन दैवयोग से कुछ दिनों बाद ही वह विधवा हो गई। वैधव्य का दुःख प्राप्त होने पर वह पतिव्रत धर्म का पालन करते हुये अपने पिता के घर में रहने लगी। उस ब्राह्मण उत्तंग का हृदय अपनी बेटी की पीड़ा से अत्यन्त व्यथित था जिसके कारण वह अपने पुत्र को भवन आदि सौंप कर स्वयं पत्नी और पुत्री सहित गंगा के पावन तट पर निवास करने लगा और वहीं अपने शिष्यों को वेदाध्ययन कराने लगा।

एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने यह बात अपनी मां से कही। फिर मां ने ये बात पति को बताते हुए पूछा कि हे प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है? उसके जीवन में इतना दुख क्यों लिखा है। उत्तंक जी ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया कि पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी ही थी। लेकिन इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे और साथ ही अपनी सखियों की देखा-देखी इसने भाद्रपद शुक्ल पंचमी यानी ऋषि पंचमी का व्रत भी नहीं किया। इसलिए ही इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।

आगे उत्तंक जी ने कहा कि हे अनघे! रजस्वला काल में स्त्री पापग्रस्त होती है, प्रथम दिवस चाण्डाली, द्वितीय दिवस ब्रह्मघातिनी और तृतीय दिवस रजकी, अर्थात् धोबिन होती है और चतुर्थ दिवस वह शुद्ध होती है। पिछले जन्म में इसने अपनी सखियों के प्रभाव में आने के कारण ऋषि पंचमी व्रत का दर्शन करते हुये भी उसका अनादर किया था। लेकिन इसने पिछले जन्म में ऋषि पंचमी व्रत के उत्सव का जो दर्शन किया था, उससे ही यह इस जन्म में भी ब्राह्मण कुल में ही जन्मी। लेकिन इसने उस व्रत का अपमान किया था, जिसके कारण ही इसकी देह कृमिमय (कीड़ों से युक्त) हो गयी। यही इसके पाप और दण्ड का मूल कारण है।

पुत्री के पूर्वजन्म का वृत्तान्त जानने के बाद सुशीला बोली - हे नाथ! जिस ऋषि पंचमी व्रत के उत्सव का दर्शन करने मात्र से ही आपके समान ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण के कुल में इसका जन्म हुआ और उसी व्रत का अनादर करने से अर्धरात्रि में इसकी देह कृमियों से युक्त हो गयी, कृपया इस अद्भुत व्रत का वर्णन करने की कृपा करें। ऋषि बोले - हे सुशीले! मैं अब जिस सर्वोत्तम व्रत का वर्णन करने जा रहा हूं, वह व्रत इस प्रकार के सभी पापों से मुक्ति दिला देता है। इस व्रत का पालन करने से आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं यह व्रत स्त्रियों को सुख और सौभाग्य भी प्रदान करता है।

भाद्रपद शुक्ल पंचमी को किसी नदी, सरोवर आदि जलाशय में स्नान करके व्रत ग्रहण करना चाहिये। इसके बाद द्वारवती, अर्थात् मण्डप में सप्तऋषियों की स्थापना करनी चाहिये। फिर सप्त ऋषियों को पूर्ण विधि-विधान द्वारा दूध आदि पंचामृत पदार्थों से स्नान कराना चाहिये। इसके बाद उन्हें सुगंधित चन्दन अर्पित करना चाहिए। फिर कपूर अर्पित करें। साथ ही पुष्पों से उनका शृंगार करें और धूप, दीप आदि से उनका विधिवत् पूजन करें। पूजा के समय ऋषियों को उपवीत यानी बिना सिला हुआ अखण्ड वस्त्र भी जरूर चढ़ाना चाहिए। 

फिर तरह-तरह के फलों और नैवेद्य सहित अर्घ्यदान करना चाहिये। अर्घ्यदान करते समय मन ही मन यह प्रार्थना करनी चाहिये - 'कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वशिष्ट ये सभी मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्यजल को स्वीकार करें और इससे प्रसन्न हों।' साथ ही व्रत रखने वाली महिलाओं को इस कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिये और इस व्रत में शाग का ही भोजन करना चाहिये। जो महिला इस विधि से यह व्रत करती है वह सदैव सुखी, रूप-सौन्दर्य से युक्त और पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न होती है। जो स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत के अनुष्ठान को सम्पन्न करती है वह इस लोक में सभी प्रकार के सुख भोगती है।

इसके बाद उत्तंक जी ने कहा कि यदि कन्या अब भी शुद्ध मन से ऋषि पंचमी का व्रत करे तो इसके सारे दुःख दूर हो जाएंगे। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके सारे दुखों का अंत हो गया। साथ ही अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य की प्राप्ति हुई।

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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