पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का खतौली विधानसभा क्षेत्र 'जाटलैंड' की अहम राजनीतिक सीट मानी जाती है। खतौली में पिछले 3 दशकों में BJP, राष्ट्रीय लोक दल, भारतीय किसान कामगार पार्टी और BSP तक को जीत मिल चुकी है। खतौली विधानसभा सीट, मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र का भाग है और इसका नंबर 15 है। 2027 के विधानसभा चुनाव में खतौली ऐसी सीट है जो RLD, सीट शेयरिंग में BJP से मांग सकती है। खतौली में, मुस्लिम, जाट, गुर्जर, सैनी और SC वर्ग के मतदाता भारी संख्या में हैं। आइए चुनावी इतिहास और सामाजिक समीकरण से समझते हैं कि 1991 से 2022 तक खतौली का चुनावी इतिहास क्या रहा है और यहां का सामाजिक समीकरण कैसा है।
90 के दौर में BJP का मजबूत गढ़ रही BJP
अगर बात करें खतौली के चुनावी इतिहास की तो 1991 में BJP के प्रत्याशी सुधीर कुमार बालियान ने 53 हजार 773 वोटों के साथ निर्दलीय कैंडिडेंट बिरहम सिंह बालियान को करारी शिकस्त दी थी। तब बिरहम सिंह बालियान को 32 हजार 252 वोट मिले थे और 21 हजार 521 वोटों के अंतर से उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। दो साल बाद ही हुए 1993 के विधानसभा चुनाव में सुधीर कुमार बालियान एक बार फिर जीत का परचम लहराते हैं और जनता दल के उम्मीदवार राजेंद्र सिंह को 13 हजार 668 वोटों से पटखनी देने में कामयाब हो जाते हैं।
1996 में अजीत सिंह की पार्टी ने पलट दी बाजी
लेकिन 1996 के विधानसभा चुनाव में खतौली की राजनीतिक तस्वीर बदल जाती है, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की नई नवेली पार्टी भारतीय किसान कामगार पार्टी पहली बार यूपी विधानसभा चुनाव में उतरती है और खतौली में उसके कैंडिडेट होते हैं राजपाल सिंह बालियान। खतौली में BKKGP के प्रत्याशी को झोली भर-भरकर वोट मिलते हैं और यह 1991 से लेकर 2022 तक के सभी चुनावों की सबसे बड़ी जीत साबित होती है। राजपाल सिंह बालियान को 81 हजार 334 वोट मिलते हैं, जबकि उनके विरोधी BJP प्रत्याशी सुधीर कुमार बालियान 43 हजार 544 वोटों पर ही सिमट जाते हैं। ये चुनाव अजीत सिंह की पार्टी 37 हजार 790 वोटों के भारी-भरकम अंतर से जीत लेती है।
2002 में BKKGP, RLD के रूप में उतरी और फिर से जीता चुनाव
अब साल आता है 2002 का और अजीत सिंह की BKKGP अब RLD यानी राष्ट्रीय लोक दल के रूप में जनता के बीच थी। 2002 में भी अजीत सिंह की पार्टी राजपाल सिंह बालियान पर दांव लगाती है और उसे कामयाबी भी मिल जाती है। RLD प्रत्याशी को 70 हजार 705 वोट मिलते हैं और वह अपने प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रमोद त्यागी को 28 हजार 171 वोटों के अंतर से हरा देते हैं। इस चुनाव में प्रमोद त्यागी 42 हजार 534 वोट ही हासिल कर पाते हैं।
| वर्ष | विजेता | पार्टी | वोट | रनर-अप | पार्टी | वोट | अंतर |
| 1991 | सुधीर कुमार बालियान | BJP | 53,773 | बिरहम सिंह बालियान | निर्दलीय | 32,252 | 21,521 |
| 1993 | सुधीर कुमार बालियान | BJP | 48,973 | राजेंद्र सिंह | जनता दल | 35,305 | 13,668 |
| 1996 | राजपाल सिंह बालियान | BKKGP | 81,334 | सुधीर कुमार बालियान | BJP | 43,544 | 37,790 |
| 2002 | राजपाल सिंह बालियान | RLD | 70,705 | प्रमोद त्यागी | SP | 42,534 | 28,171 |
| 2007 | योगराज सिंह | BSP | 38,205 | राजपाल सिंह बालियान | RLD | 22,184 | 16,021 |
| 2012 | करतार सिंह भड़ाना | RLD | 46,722 | तारा चंद शास्त्री | BSP | 40,847 | 5,875 |
| 2017 | विक्रम सैनी | BJP | 94,771 | चंदन सिंह चौहान | SP | 63,397 | 31,374 |
| 2022 | विक्रम सैनी | BJP | 1,00,651 | राजपाल सिंह सैनी | RLD | 84,306 | 16,345 |
| 2022 उपचुनाव | मदन भैया | RLD | 97,139 | राजकुमारी सैनी | BJP | 74,996 | 22,143 |
(सोर्स- Election Commission Of India)
2007 में यूपी और खतौली दोनों में जीती BSP
फिर, 2007 में जब पूरे प्रदेश में BSP की लहर चली थी तो खतौली भी इससे अछूता नहीं रहता है। BSP के योगराज सिंह, RLD के विधायक राजपाल सिंह बालियान का विजय रथ रोक देते हैं और उन्हें 16 हजार 21 वोटों के अंतर से चुनावी मैदान में चित कर देते हैं। 2007 के चुनाव में योगराज सिंह को 38 हजार 205 वोट और राजपाल सिंह बालियान को 22 हजार 184 वोट मिलते हैं। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट प्रमोद त्यागी तीसरे और BJP के सुधीर कुमार बालियान पांचवें स्थान पर चले जाते हैं।
2012 में RLD ने वापस कब्जाई खतौली सीट
लेकिन 2012 में RLD अपनी जमीन वापस ले लेती है। इस बार, RLD नए प्रत्याशी को चुनावी मैदान में उतारती है। खतौली के विधानसभा चुनाव में RLD उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना, BSP के उम्मीदवार तारा चंद्र शास्त्री को 5 हजार 875 वोटों के छोटे अंतर से हरा देते हैं। वोटों की हार-जीत का यह अंतर तीन दशक के चुनावों में सबसे कम रहा। RLD प्रत्याशी को 46 हजार 722 वोट और तारा चंद शास्त्री को 40 हजार 847 वोट मिलते हैं।
24 साल बाद खतौली में BJP की वापसी
2017 के विधानसभा चुनाव में BJP, खतौली में 24 साल बाद वापसी करने में कामयाब होती है और जीत का सेहरा बंधता है विक्रम सैनी के सिर पर। विक्रम सैनी 94 हजार 771 वोट हासिल करके प्रतिद्वंदी सपा कैंडिडेट चंदन सिंह चौहान को 31 हजार 374 वोटों के अंतर से हार का स्वाद चखाते हैं। इस चुनाव में सपा प्रत्याशी को 63 हजार 397 वोट मिलते हैं। वहीं, BSP का उम्मीदवार शिवन सिंह सैनी 37 हजार 380 वोट ही हासिल कर पाते हैं। इस चुनाव में RLD चौथे नंबर पर चली जाती है। RLD प्रत्याशी शाहनवाज राणा को महज 12 हजार 846 वोट मिलते हैं।
2022 में खतौली में BSP का प्रदर्शन RLD पर पड़ा भारी
अब बारी आती है 2022 के विधानसभा चुनाव की और BJP एक बार फिर विक्रम सैनी पर भरोसा जताती है। विक्रम सैनी भी इस विश्वास पर खरे उतरते हैं और 1 लाख 651 वोट पाकर 16 हजार 345 वोटों के अंतर से जीत दर्ज करते हैं। हालांकि, उनके सामने RLD ने भी सैनी समाज के राजपाल सिंह सैनी को चुनावी मैदान में उतारा था लेकिन वह 84 हजार 306 वोटों पर ही सिमटकर रह जाते हैं।
दिलचस्प बात ये थी कि इस चुनाव में सपा और RLD गठबंधन में चुनाव लड़े थे लेकिन उनका काम खराब BSP के प्रत्याशी करतार सिंह भड़ाना ने कर दिया था। ये करतार सिंह भड़ाना वही थे, जिन्होंने RLD के टिकट पर 2012 में खतौली विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीत भी हासिल की थी। करतार सिंह इस चुनाव में 31 हजार 412 वोट हासिल करते हैं और RLD प्रत्याशी 16 हजार 345 वोटों से हार जाता है। चूंकि करतार सिंह, RLD के विधायक रह चुके थे तो उनकी जनता के बीच और खासकर RLD समर्थित वोटों में काफी पकड़ थी। शायद इसी वजह से सपा-RLD गठंबधन के बावजूद खतौली सीट BJP के खाते में चली जाती है।
मौजूदा विधायक को सजा होने से खतौली में उपचुनाव
दरअसल, अक्टूबर 2022 में मुजफ्फरनगर की कोर्ट, 2013 के दंगों से जुड़े एक मुकदमे में खतौली विधायक विक्रम सैनी को 2 साल की सजा सुना देती है। चूंकि, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत दो या उससे अधिक सजा पाने पर विधायक-सांसद की सदस्यता चली जाती है तो ये विक्रम सैनी के लिए बड़ा झटका होता है। अदालत के फैसले के बाद, विधानसभा सचिवालय विक्रम सैनी की सदस्यता खत्म होने की वजह से खतौली विधानसभा सीट को 11 अक्टूबर 2022 से खाली घोषित कर देती है।
अब खतौली में 5 दिसंबर को उपचुनाव होता है और इसमें सपा-RLD फिर 2022 की तरह साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं। प्रत्याशी के रूप में RLD के मदन भैया को मौका दिया जाता है। वहीं, BJP विक्रम सैनी की पत्नी राजकुमारी सैनी को सियासी पिच पर उतारती है। ये मुकाबला सीधी टक्कर का था, BSP ने ये उपचुनाव नहीं लड़ा था। ऐसे में सपा-RLD का गठबंधन जीत जाता है और प्रदेश में BJP सरकार के बावजूद राजकुमारी सैनी को शिकस्त मिलती है। इस उपचुनाव में RLD प्रत्याशी को 97 हजार 139 वोट मिलते हैं और BJP की राजकुमारी सैनी को 74 हजार 996 वोट। मदन भैया ये चुनाव 22 हजार 143 वोटों के बड़े अंतर से चुनाव जीत लेते हैं।
खतौली का चुनावी इतिहास क्या कहता है?
1991 से 2022 के 8 विधानसभा चुनाव देखें तो BJP ने 4, RLD ने 3 क्योंकि BKKP पार्टी भी उन्हीं की थी और BSP ने एक बार जीत दर्ज की है। सपा को खतौली में जीत कभी भी नसीब नहीं हुई है। हालांकि, दिसंबर 2022 के उपचुनाव में जब RLD के मदन भैया जीते थे तो सपा उनके साथ गठबंधन में जरूर थी।
खतौली का सामाजिक समीकरण
खतौली में मुस्लिम, जाट, सैनी, गुर्जर, SC वर्ग और दूसरे OBC समूहों के लोग बहुतायत में रहते हैं। यहां कभी मुस्लिम-जाट की गोलबंदी तो कभी सैनी और दूसरे OBC समूहों का कॉम्बिनेशन बनाने की कोशिश होती दिखाई देती है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में जाट NDA के पाले में नजर आ सकते हैं। दरअसल, खतौली उन सीटों में शामिल है, जिसको RLD सीट शेयरिंग में BJP से मांग सकती है।
एक और भी गौर करने वाली बात होगी कि अगर ये सीट NDA की सीट शेयरिंग में RLD के खाते में जाती है और वह जाट उम्मीदवार उतारती है तो क्या सपा नॉन जाट समाज उम्मीदवार पर दांव लगाएगी। माना जा रहा है कि 2027 में खतौली का चुनाव, पार्टियों की तरफ से उम्मीदवारों के चयन, NDA के भीतर सीट बंटवारे, समाजवादी पार्टी की खतौली में स्ट्रैटेजी और स्थानीय सामाजिक गठजोड़ पर बहुत हद तक निर्भर करेगा। सरधना में भी यूपी चुनाव 2027 में BJP के सामने सीट वापस लेने की चुनौती है। सरधना का चुनावी समीकरण भी बड़ा जबरदस्त है।