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बांग्लादेश भूल गया पाकिस्तान का अत्याचार, कही बेतुकी बात; 1971 की जंग में भारत की भूमिका पर उठाए सवाल

 Edited By: Amit Mishra
 Published : Dec 18, 2025 02:53 pm IST,  Updated : Dec 18, 2025 03:39 pm IST

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की ओर से भारत को लेकर लगातार विवादित बयान दिए जा रहे हैं। अब बांग्लादेश वो दिन भी भूल गया है कि 1971 में पाकिस्तान की सेना ने उनके लोगों के साथ क्या किया था।

Bangladesh Freedom Army 1971 War- India TV Hindi
Bangladesh Freedom Army 1971 War Image Source : AP

Bangladesh And 1971 War: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की ओर से भारत के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने 1971 के मुक्ति संग्राम में बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका को प्रमुख बताते हुए बड़ा दावा कर दिया।  हुसैन ने कहा कि बिना उनका समर्थन मिले भारत पाकिस्तान पर विजय प्राप्त नहीं कर पाता। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बना हुआ है। ढाका में भारतीय उच्चायोग की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर बांग्लादेश के उच्चायुक्त को तलब कर अपनी कड़ी आपत्ति भी दर्ज की है।

'...तो असंभव थी जीत'

ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तौहीद हुसैन ने भारत पर आरोप लगाया कि वह लगातार 1971 के मुक्ति युद्ध में बांग्लादेश के योगदान को कम आंकता रहा है। हुसैन ने जोर देकर कहा कि बांग्लादेशी मुक्ति योद्धाओं (मुक्ति वाहिनी) के बिना यह विजय असंभव थी। हुसैन ने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में विजय दिवस को कोलकाता में अलग तरीके से मनाया जाता है, जो यह संकेत देता है कि भारत अपनी सशस्त्र सेनाओं को ही पूर्ण श्रेय देता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों ने निभाई सक्रिय भूमिका

हुसैन के अनुसार, "यह सच है कि भारत ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की, लेकिन बांग्लादेश में उनकी जीत के संदर्भ में उनके खुद के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यदि स्थानीय स्तर पर पाकिस्तानी सेना को कमजोर नहीं किया जाता, तो भारत को विजय प्राप्त करने में काफी समय लगता और भारी नुकसान उठाना पड़ता। ज्यादा लोगों की जान जाती।" उन्होंने आगे कहा कि बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानी कम से कम छह महीने से सक्रिय थे। विरोध की शुरुआत तो पहले से थी, लेकिन जून के आसपास मुक्ति संग्राम पूरी तरह युद्ध में शामिल हो गया। बिना इन सेनानियों के समर्थन के यह जीत हासिल नहीं हो सकती थी।

Bangladesh People Cheers Indian Army 1971 War
Image Source : APBangladesh People Cheers Indian Army 1971 War

अंतरिम सरकार ने कुरेदे पुराने घाव

यह बयान 16 दिसंबर को विजय दिवस के ठीक बाद आया है, जब दोनों देश 1971 के युद्ध की याद में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। भारत में इसे विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है, जहां भारतीय सैनिकों की बहादुरी और बलिदान को याद किया जाता है। वहीं बांग्लादेश में यह मुक्ति युद्ध की विजय का प्रतीक है। लेकिन, अंतरिम सरकार के इस बयान ने पुराने घावों को कुरेद दिया है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1971 के युद्ध का संक्षिप्त इतिहास और दोनों देशों का दृष्टिकोण 

1971 का युद्ध दक्षिण एशिया के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना की दमनकारी कार्रवाइयों, विशेषकर ऑपरेशन सर्चलाइट के बाद, बंगाली राष्ट्रवाद उभरा। लाखों शरणार्थी भारत की सीमा में आए, जिसने भारत को हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया। मुक्ति वाहिनी ने गुरिल्ला युद्ध लड़ा, जबकि भारतीय सेना ने 3 दिसंबर 1971 से औपचारिक युद्ध शुरू किया। मात्र 13 दिनों में पाकिस्तानी सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया, और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।

भारतीय दृष्टिकोण 

भारतीय दृष्टिकोण से यह विजय भारतीय सशस्त्र बलों की रणनीतिक सफलता थी, जिसमें वायुसेना की श्रेष्ठता और थलसेना की तेज प्रगति शामिल थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने ना केवल पाकिस्तान को हराया, बल्कि मानवीय संकट को भी रोका। भारत हमेशा से मुक्ति बहिनी की भूमिका को स्वीकार करता है और दोनों देशों के बीच युद्ध स्मारकों का आदान-प्रदान होता रहा है।

Pakistan Surrender To India 1971 War
Image Source : APPakistan Surrender To India 1971 War

बांग्लादेशी दृष्टिकोण

बांग्लादेशी पक्ष से, विशेषकर अंतरिम सरकार इसे मुख्य रूप से बंगाली सेनानियों का संघर्ष मान रही है, जिसमें भारत केवल सहयोगी था। तौहीद हुसैन जैसे लोगों के बयान इसी को बल देते हैं। यह बदलाव शेख हसीना के सत्ता से हटने के नजर आया है, जब से अंतरिम सरकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में कार्यरत है। 

ढाका में बढ़ता तनाव और सुरक्षा चिंताएं

इस बयान का समय और भी संवेदनशील है क्योंकि ढाका में भारतीय उच्चायोग की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे महसूस किए जा रहे हैं। 17 दिसंबर को 'जुलाई यूनिटी' के बैनर तले सैकड़ों प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे थे। ये प्रदर्शनकारी भारत-विरोधी नारे लगा रहे थे और अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें बीच रास्ते में रोक दिया, लेकिन यह घटना भारत के लिए चिंता का विषय बनी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश के उच्चायुक्त रियाज हमीदुल्लाह को तलब किया। मंत्रालय ने बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी याद दिलाई कि वह भारतीय मिशन और उसके कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। कुछ कट्टरपंथी तत्वों द्वारा उत्तर-पूर्वी भारत (सेवन सिस्टर्स) को अलग करने की धमकियां भी सामने आई हैं, जिसने तनाव को और बढ़ा दिया है। 

यूनुस सरकार को बेतुके बयानों से बचना चाहिए

भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं। 1971 के युद्ध के बाद दोनों देशों ने विकास सहयोग, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। लेकिन, शेख हसीना के सत्ता से चले जाने के बाद संबंधों में दरार आई है। पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की बढ़ती निकटता के संकेत भी मिल रहे हैं। फिलहाल, यूनुस सरकार को ऐसे बयानों से बचना चाहिए जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करें। 

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