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आप जैसा कोई रिव्यू: प्यार, परंपरा और पूर्वानुमान की थकी हुई प्रस्तुति, जानें कैसा है आर माधवन और फातिमा का काम

 Written By: साक्षी वर्मा
 Published : Jul 11, 2025 02:25 pm IST,  Updated : Jul 11, 2025 02:27 pm IST

'आप जैसा कोई' मूवी नेटफ्लिक्स पर रिलीज कर दी गई है। इस फिल्म की कहानी में नारीवाद को पेश करने की काफी कोशिश की गई है, लेकिन ये विफल होती ही नजर आ रही है।

aap jaisa koi
फातिमा सना शेख और आर माधवन। Photo: INSTAGRAM
  • फिल्म रिव्यू: आप जैसा कोई
  • स्टार रेटिंग 2/5
  • पर्दे पर: 11.07.2025
  • डायरेक्टर: विवेक सोनी
  • शैली: रोमांटिक ड्रामा

आर माधवन और फ़ातिमा सना शेख अभिनीत "आप जैसा कोई" एक बहु-सांस्कृतिक प्रेम कथा प्रस्तुत करने की कोशिश करती है, लेकिन यह कोशिश अधूरी ही रह जाती है। फिल्म की शुरुआत, ट्रेलर और संगीत उम्मीदें तो जगाते हैं, लेकिन फिल्म इन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। यह कहानी दो ऐसे लोगों की है जो उम्र के एक खास पड़ाव पर आकर प्रेम में पड़ते हैं, लेकिन उनका रिश्ता सामाजिक अपेक्षाओं, स्वीकृति और आपसी असुरक्षाओं के बोझ तले दम तोड़ देता है।

कहानी की परतें

फिल्म की कहानी श्रीरेणु त्रिपाठी (आर. माधवन) और मधु बोस (फ़ातिमा सना शेख) के इर्द-गिर्द घूमती है। श्रीरेणु, एक 42 वर्षीय संस्कृत शिक्षक हैं, जो जमशेदपुर में रहते हैं और अपने अकेलेपन से जूझ रहे हैं। वो जीवन में एक साथी की तलाश कर रहे हैं और उनके छात्र भी उनके अकेलेपन से वाकिफ हैं। वहीं दूसरी ओर, मधु बोस एक 35 वर्षीय बंगाली महिला हैं जो कोलकाता से आई हैं और फ्रेंच पढ़ाती हैं। उनका ताल्लुक एक संयुक्त परिवार से है और उन्हें 'अच्छे घर की लड़की' माना जाता है। जब ये दोनों मिलते हैं, तो शुरुआती दिलचस्पी के बाद उनका रिश्ता तेजी से विकसित होता है — मिलना, प्रेम में पड़ना, असुरक्षाओं को पार करना, और अंततः सगाई तक पहुँच जाना।

हालांकि, यहीं से फिल्म की गिरावट शुरू होती है। दोनों किरदारों के बीच का रिश्ता जटिल नहीं, बल्कि सतही और अपरिपक्व लगता है। एक मामूली तकरार से रिश्ता टूट जाता है और फिर बहुत ही जल्द एक और संक्षिप्त पुनर्मिलन होता है, जो दर्शकों को निराश करता है। इस जल्दबाज़ी और बिखरे हुए इमोशन्स के चलते दर्शक अंत में यही कहते हैं – "यह क्या था?"

लेखन और निर्देशन की खामियाँ

फिल्म की कहानी राधिका आनंद ने लिखी है, जबकि पटकथा और संवाद जेहान हांडा के हैं। यहीं पर सबसे बड़ी कमी नजर आती है। विषय चयन अच्छा है — लैंगिक समानता, आत्म-सम्मान और भावनात्मक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को उठाने की मंशा स्पष्ट है। लेकिन लेखन में वह धार और परिपक्वता नहीं है जो इस संवेदनशील विषय को मजबूती दे पाती। संवाद कई बार कृत्रिम और असंगत लगते हैं और किरदारों की भावनाएँ गहराई से उभर नहीं पातीं। निर्देशक विवेक सोनी और छायाकार देबोजीत रे को जरूर कुछ श्रेय दिया जा सकता है। खासतौर पर 'जब तू साजन' गाने के दौरान कुछ दृश्य सुंदर और भावनात्मक रूप से प्रभावी हैं। फिल्म के कुछ दृश्य स्वप्निल और सिनेमैटिक दृष्टि से अच्छे हैं, लेकिन वे कहानी की कमजोरियों को ढकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

फिल्म एक गंभीर मोड़ तब लेती है जब श्री को पता चलता है कि मधु का अकेलापन वैसा नहीं है जैसा उन्होंने सोचा था। लेकिन इस मोड़ को जिस तरह पेश किया गया है, वह दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में असफल रहता है। साथ ही, फिल्म की एक बड़ी चूक यह है कि इसमें फ़ातिमा के किरदार को पूरी तरह उभारने का अवसर नहीं दिया गया। उनके करियर या व्यक्तिगत आकांक्षाओं को कोई खास महत्व नहीं दिया गया है, जिससे उनका किरदार अधूरा सा लगता है।

चरित्र चित्रण और अभिनय

आर माधवन जैसे अनुभवी अभिनेता का किरदार श्रीरेणु त्रिपाठी शुरू में तो प्रभावी लगता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उनका अभिनय असंतुलित होता जाता है। खासकर फिल्म का अंतिम ‘स्वीकारोक्ति’ वाला दृश्य, जो भावनात्मक रूप से सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए था, बेहद बनावटी और असहज लगता है। फ़ातिमा सना शेख़ मधु बोस के रूप में ईमानदार कोशिश करती हैं, लेकिन उनके किरदार को जिस तरह गढ़ा गया है, उसमें उनकी प्रतिभा पूरी तरह निखर नहीं पाती। यदि उनके किरदार में बंगाली संस्कृति की थोड़ी अधिक झलक होती — बोलचाल, पहनावा, व्यवहार में — तो शायद वह और अधिक प्रभावी होतीं। सिर्फ सूती साड़ियाँ पहनना और कभी-कभार बंगाली संवाद बोलना पर्याप्त नहीं है।

आयशा रजा मिश्रा ने श्री की एक महिला मित्र के किरदार में उम्दा अभिनय किया है। वह एक ऐसी महिला हैं जो अपने पति से कुछ और चाहती हैं लेकिन बदले में केवल ‘घर का काम’ पाती हैं। वह अपने पति को धोखा देती हैं और निर्देशक इस धोखे को पति द्वारा माफी मांगने से ‘न्यायोचित’ ठहराने की कोशिश करते हैं, जो सरासर अनुचित लगता है। उनके किरदार में अंत में जो आत्मविश्वास दिखता है, वह शुरुआत से ही दिखाया जा सकता था। अलगाव का फैसला खुलकर लेने की बजाय धोखा देना, उनके किरदार को कमजोर बनाता है। नमित दास को ‘हीरो का सबसे अच्छा दोस्त’ की भूमिका में देखकर अफ़सोस होता है। वह एक प्रतिभाशाली अभिनेता हैं और उन्हें इससे कहीं बेहतर और जटिल किरदार मिलने चाहिए थे।

तकनीकी पक्ष और संगीत

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी खूबसूरत है। रोशनी, रंगों और कैमरा एंगल्स के माध्यम से कुछ दृश्य वाकई सुंदर लगते हैं। खासकर फ्रेम कम्पोजिशन में देबोजीत रे ने अच्छा काम किया है। संगीत फिल्म का एक उजला पक्ष है। 'धुआँ धुआँ' और 'सारे जग में' जैसे गाने न सिर्फ़ अच्छे सुनाई देते हैं, बल्कि दृश्यांकन में भी दिल छू लेते हैं। हालांकि, फ्रेंच संवादों का अत्यधिक उपयोग खटकता है और ‘ब्रेथटेकिंग’ जैसे शब्दों का बार-बार दोहराव अखरता है।

कुल मिलाकर – अधूरी संभावनाएं

"आप जैसा कोई" एक ऐसी फिल्म है जो कुछ खास कहने की मंशा रखती है, लेकिन वह उसे कह नहीं पाती। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें कोई खास नयापन नहीं है। इसकी संरचना, घटनाएँ और संवाद पहले कई बार देखे और सुने जा चुके हैं। फिल्म कई बार "रॉकी और रानी की प्रेम कहानी" की याद दिलाती है, लेकिन वहां जहाँ करण जौहर ने अपने किरदारों को गहराई और परतें दी थीं, यहां सब कुछ सतही और पूर्वानुमानित लगता है। निर्देशक और लेखकों की टीम अगर थोड़ी और मेहनत करती और किरदारों को यथार्थ के करीब ले जाती, तो यह फिल्म एक प्रभावशाली सामाजिक और भावनात्मक कथा बन सकती थी। लेकिन फिलहाल, यह फिल्म अपने दिल को छू लेने वाले संगीत और सिनेमैटोग्राफी के अलावा, दर्शकों को कुछ भी खास नहीं देती।

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