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Bharat Bhhagya Viddhaata Review: बंदूक के आगे ढाल बनीं निहत्थी नर्सें, इतिहास के एक भूले हुए अध्याय को कंगना ने किया जिंदा

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jun 12, 2026 12:14 pm IST,  Updated : Jun 26, 2026 01:08 pm IST

Bharat Bhhagya Viddhaata Review: कंगना रनौत की फिल्म सिनेमाघरों में आज रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी में दम हैं और कंगना के अभिनय में भी पुरानी वाली बात नजर आ रही हैं। जानें पूरी फिल्म कैसी है।

Kangana Ranaut
कंगना रनौत। Photo: STILL FROM TRAILER
  • फिल्म रिव्यू: भारत भाग्य विधाता
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 12/06/2026
  • डायरेक्टर: मनोज तपड़िया
  • शैली: हिस्टॉरिकल थ्रिलर ड्रामा

सिनेमाघरों में हर शुक्रवार कुछ नई कहानियां दस्तक देती हैं। पिछले हफ्ते जहां फिल्मों का पूरा ध्यान सहमति जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर था, वहीं इस शुक्रवार मेकर्स हमें इतिहास के उन पन्नों की तरफ ले गए हैं जिन्होंने हमारे देश को हमेशा के लिए बदल दिया। इसी कड़ी में कंगना रनौत स्टारर फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' बड़े पर्दे पर रिलीज हुई है। जब भी 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों पर कोई फिल्म बनती है तो जहन में ताज होटल, नरीमन हाउस या सीएसटी स्टेशन के खौफनाक मंजर आ जाते हैं, लेकिन यह फिल्म हमें उस भयानक रात के एक ऐसे हिस्से में ले जाती है, जिसके बारे में अमूमन बहुत कम बात की जाती है। निर्देशक मनोज तपड़िया ने इस बार बंदूक उठाने वाले जवानों की नहीं, बल्कि सफेद वर्दी में जान बचाने वाली नर्सों की कहानी चुनी है। चलिए जानते हैं कि क्या यह फिल्म दर्शकों के दिलों को छूने में कामयाब रही।

एक खामोश और सधी हुई शुरुआत

फिल्म की शुरुआत बहुत ही शांत और आम तरीके से होती है। निर्देशक ने पहले ही फ्रेम से चीख-पुकार या धमाके दिखाकर दर्शकों को चौंकाने की कोशिश नहीं की है, जो कि एक बहुत ही समझदारी भरा फैसला है। शुरुआत में कहानी अपने किरदारों और उनके माहौल को बहुत धीरे-धीरे हमारे सामने लाती है। यह किसी बड़े बजट की एक्शन थ्रिलर फिल्म की तरह नहीं शुरू होती, जहां सीधे विलेन की एंट्री करा दी जाए। इसके उलट फिल्म हमें मुंबई के एक सरकारी अस्पताल की रोजमर्रा की जिंदगी से रूबरू कराती है। शुरूआती सीन्स में अस्पताल की वही जानी-पहचानी खामोशी, तीमारदारों की भीड़ और नर्सों की आपसी बातचीत दिखाई गई है। माहौल में एक अजीब सा ठहराव है, जिसे देखकर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि अगले कुछ घंटों में यहाँ क्या कयामत आने वाली है। यह धीमी और बिना ज्यादा राज खोले की गई शुरुआत दर्शकों को कहानी से जुड़ने का पूरा मौका देती है।

कहानी और पटकथा का ताना-बाना

फिल्म की कहानी मुख्य रूप से मुंबई के मशहूर कामा अस्पताल के इर्द-गिर्द बुनी गई है। कहानी के केंद्र में है नर्स गीता माधव (कंगना रनौत), जो असल जिंदगी की बहादुर नर्स अंजलि कुलथे के किरदार से प्रेरित है। गीता अपनी साथी नर्सों शीला (गिरीजा ओक गोडबोले) और बबीता (स्मिता तांबे) के साथ मिलकर अस्पताल में अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभा रही है। फिल्म का पहला हिस्सा इन नर्सों के दो अलग-अलग परिवारों को दिखाता है, एक परिवार जो अस्पताल के कमरों में बेड पर लेटा है और दूसरा परिवार जो शिफ्ट खत्म होने के बाद घर पर उनका इंतजार कर रहा है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब अचानक शहर के अलग-अलग हिस्सों जैसे ताज होटल और रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी की खबरें आने लगती हैं। शुरुआत में अस्पताल के स्टाफ को लगता है कि यह कोई मामूली वारदात है, लेकिन तभी दो खूंखार आतंकवादी कामा अस्पताल की ढलती दीवारों के अंदर दाखिल हो जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है खौफ, अंधेरे और रोंगटे खड़े कर देने वाले तनाव का वो दौर, जहां बिना किसी हथियार के ये नर्सें और अस्पताल का बाकी स्टाफ अपने मरीजों की जान बचाने के लिए मौत से भिड़ जाता है। पटकथा इस भयानक रात को पल-पल के हिसाब से पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है।

मनोज तपड़िया का निर्देशन और अयान सिल का कैमरा

निर्देशक मनोज तपड़िया की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इस संवेदनशील विषय को संभालने के लिए काफी हद तक एक जमीनी और यथार्थवादी रास्ता चुना। उन्होंने फिल्म को एक लाउड देशभक्ति का ड्रामा बनाने के बजाय मानवीय संवेदनाओं पर ज्यादा फोकस रखा। मनोज का निर्देशन तब सबसे ज्यादा निखर कर आता है जब वह अस्पताल के गलियारों में छिपे डर को कैमरे के जरिए दर्शकों तक पहुंचाते हैं। यहां सिनेमैटोग्राफर अयान सिल का काम बेहतरीन है। उनका कैमरा कामा अस्पताल के संकरे रास्तों, सीढ़ियों और धुंधली रोशनी वाले वार्डों में इस तरह घूमता है कि दर्शक खुद को उसी खौफनाक माहौल का हिस्सा मानने लगते हैं। दूसरे हिस्से की शुरुआत में जब आतंकवादी अस्पताल में दाखिल होते हैं तो कैमरे का मूवमेंट और दृश्यों का कंपोजिशन आपके अंदर एक अजीब सी घबराहट पैदा कर देता है। निर्देशक ने अस्पताल की रोजमर्रा की दिक्कतों और नर्सों के मध्यमवर्गीय मराठी परिवारों के ताने-बाने को बहुत ही सादगी से पर्दे पर दिखाया है।

अभिनय 

अभिनय के मोर्चे पर यह फिल्म किसी एक सुपरस्टार के कंधों पर नहीं टिकी है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। कंगना रनौत ने गीता माधव के किरदार में बहुत ही सधा हुआ और गंभीर अभिनय किया है। उन्होंने अपनी पुरानी फिल्मों की तरह यहां कोई लार्जर दैन लाइफ या फिल्मी हीरो बनने की कोशिश नहीं की, बल्कि एक आम और डरी हुई लेकिन फर्ज के आगे डट जाने वाली महिला के रूप में वह बेहद स्वाभाविक लगी हैं। हालांकि कुछ जगहों पर उनका मराठी लहजा थोड़ा बनावटी और अजीब लगता है, लेकिन उनकी आंखों का सन्नाटा और चेहरे के भाव उस कमी को छुपा लेते हैं। कहा जा सकता है कि कंगना कई सालों बाद अपने पुराने वाले अंदाज में वापसी की हैं और उन्होंने फिर यकीन दिला दिया है कि वो एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं।

फिल्म का असली दिल इसकी बाकी सपोर्टिंग कास्ट में धड़कता है। गिरीजा ओक गोडबोले और स्मिता तांबे जैसी बेहतरीन अभिनेत्रियों ने नर्सों के किरदार में कमाल का काम किया है। उनके बीच के डायलॉग्स और मुश्किल वक्त में एक-दूसरे को सिर्फ आंखों से ढांढस बंधाने वाले सीन्स बहुत ही सजीव बन पड़े हैं। ईशा डे, अनुभवी सुहिता थत्ते और रसिका अगाशे ने भी अपने छोटे-छोटे किरदारों में जान फूंक दी है। यह देखकर अच्छा लगता है कि मेकर्स ने कंगना का नाम बड़ा होने के बावजूद बाकी कलाकारों को पूरा स्पेस दिया, जिससे यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि 'सामूहिक साहस' की दास्तान बन सकी।

कहां रह गई कमी?

'भारत भाग्य विधाता' एक बेहद उम्दा फिल्म बन सकती थी, लेकिन कुछ कमियां हैं।  फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका संगीत है। फिल्म के जो सीन्स बहुत ही गंभीर और तनाव से भरे होने चाहिए थे, वहां बैकग्राउंड म्यूजिक को जरूरत से ज्यादा लाउड और फिल्मी हीरोइक बना दिया गया। ऐसा लगता है कि मेकर्स जबरदस्ती दर्शकों के अंदर देशभक्ति का उबाल लाना चाह रहे थे, जबकि कहानी का असली ड्रामा अपने आप में ही बहुत मजबूत था। यह लाउड संगीत कई जगह दृश्यों की गंभीरता को कम कर देता है।

इसके अलावा फिल्म के आखिरी आधे घंटे में बहुत सारी चीजें एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है। फिल्म का पेस बीच-बीच में बिगड़ता है, खासकर जब कहानी अस्पताल के तनाव से हटकर किरदारों के फ्लैशबैक या भावुक सीन्स में जाती है। स्क्रीनप्ले में जो कसावट दूसरे हिस्से की शुरुआत में दिखती है, वह क्लाइमेक्स आते-आते थोड़ी हिलती है। इस वजह से जो जज्बाती झटका दर्शकों को आखिर में लगना चाहिए था, उसका असर थोड़ा कम हो जाता है। हालांकि फिल्म का बिल्कुल आखिरी हिस्सा इतना प्रभावी है कि हर कमजोरी को कवर कर देता है।

वर्डिक्ट

संक्षेप में कहें तो 'भारत भाग्य विधाता' 26/11 के उन अनसुने नायकों को एक सच्ची और आदरपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में कहीं पीछे छोड़ दिया गया था। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि संकट के समय केवल बंदूक थामने वाले ही नहीं, बल्कि मरीजों के सिर पर हाथ रखने वाली ये नर्सें भी देश की सबसे बड़ी रक्षक हैं। तकनीकी कमियों और संगीत के भटकाव के बावजूद कलाकारों का दमदार अभिनय और कहानी की ईमानदारी इसे देखने लायक बनाती है। अगर आप इतिहास की इस दिल दहला देने वाली रात को एक नए और मानवीय नजरिए से देखना चाहते हैं तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है। हमारी तरफ से इस फिल्म को मिलते हैं 3.5 स्टार।

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