कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी आपके दिलो-दिमाग में लंबे समय तक बनी रहती हैं और आपको उनके किरदारों से प्यार हो जाता है। वहीं, कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं जिन्हें देखते समय आपको उनके रनटाइम का एक-एक मिनट भारी महसूस होने लगता है और आप बस उनके खत्म होने का इंतजार करते हैं। अनन्या पांडे और लक्ष्य की मुख्य भूमिकाओं से सजी फिल्म 'चांद मेरा दिल' दुर्भाग्य से दूसरी श्रेणी में अधिक फिट बैठती है। यह फिल्म एक ऐसी गहरी, संवेदनशील और भावनात्मक प्रेम कहानी बयां करने की कोशिश करती है, जहां दो बेहद युवा लोगों को परिस्थितियों के कारण वक्त से पहले समझदार और बड़ा होना पड़ता है। लेकिन अत्यधिक मेलोड्रामा, बेवजह के भावनात्मक बिखराव और भ्रमित कर देने वाले लेखन के जाल में उलझकर, यह फिल्म दर्शकों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने में पूरी तरह से असफल साबित होती है।
इस फिल्म का इस तरह कमजोर रह जाना इसलिए भी अधिक निराश करता है क्योंकि यह फिल्म कभी भी बॉलीवुड में रोमांस की परिभाषा को बदलने या कोई बहुत बड़ा प्रयोग करने का दावा नहीं करती थी। सच कहें तो इसे किसी प्रयोग की जरूरत भी नहीं थी; एक बेहद साधारण और सीधी कहानी भी दर्शकों को तब तक पूरी तरह से बांधकर रख सकती है, जब तक कि उसे पर्दे पर पूरी ईमानदारी और गहराई के साथ उतारा जाए। लेकिन 'चांद मेरा दिल' की गाड़ी लगातार दो छोरों के बीच हिचकोले खाती रहती है—यह कभी बहुत ज्यादा बेसिक (साधारण) हो जाती है, तो कभी बिना किसी वजह के अत्यधिक जटिल रूप अख्तियार कर लेती है। नतीजा यह निकलता है कि फिल्म में कुछ बेहद प्यारे पल, शानदार संगीत और कलाकारों के बीच की हल्की-फुल्की केमिस्ट्री तो दिखाई देती है, लेकिन इस पूरे ताने-बाने को एक सूत्र में पिरोने के लिए जिस 'आत्मा' की जरूरत थी, वह गायब नजर आती है।
कॉलेज रोमांस से लेकर जिंदगी के कड़े संघर्षों तक की कहानी
अगर फिल्म की कहानी की बात करें, तो इसके केंद्र में चांदनी (अनन्या पांडे) और आरव (लक्ष्य) नाम के दो युवा हैं। दोनों एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र हैं, जहां उनकी मुलाकात होती है और सामान्य युवाओं की तरह वे भी धीरे-धीरे एक-दूसरे के गहरे प्यार में पड़ जाते हैं। उनका यह कॉलेज रोमांस काफी तेजी से आगे बढ़ता है और दोनों एक-दूसरे के साथ पूरी जिंदगी बिताने के सपने देखने लगते हैं। हालांकि, कहानी में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ तब आता है जब चांदनी शादी से पहले ही गर्भवती (प्रेग्नेंट) हो जाती है। इस उम्र में इस तरह की स्थिति किसी भी युवा जोड़े के लिए झकझोर देने वाली होती है।
दोनों परिवारों के भारी विरोध, तीखी नाराजगी और सामाजिक लोक-लाज के दबाव के बावजूद, चांदनी इस बच्चे को जन्म देने और उसे रखने का एक बेहद साहसी लेकिन मुश्किल फैसला करती है। यहां से आरव और चांदनी की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। वे दोनों समाज के तानों, वित्तीय संकट (फाइनेंशियल प्रेशर), करियर की चिंताओं और अपनी उम्र के अपरिपक्व भावनात्मक स्वभाव से जूझते हुए एक साथ नई जिंदगी बसाने की कोशिश करते हैं। वे एक घर लेते हैं, जिम्मेदारियां बांटते हैं और एक वयस्क की तरह जीने की कोशिश करते हैं। लेकिन तभी उनकी जिंदगी में एक बहुत बड़ा झगड़ा और वैचारिक टकराव होता है, जो उनके पूरे भविष्य की दिशा को पूरी तरह से बदल कर रख देता है।
बिखरी हुई पटकथा और उलझा हुआ लेखन
कागज पर या सुनने में यह कहानी बेहद व्यावहारिक, प्रासंगिक और सीधे दिल को छूने वाली लगती है। आज की पीढ़ी के युवा जिस तरह के दबावों और असमंजस से गुजरते हैं, यह फिल्म उसी को पर्दे पर दर्शाने का दावा करती है। लेकिन 'चांद मेरा दिल' की सबसे बड़ी और बुनियादी कमजोरी इसकी कमजोर पटकथा (स्क्रीनप्ले) और दिशाहीन लेखन है। लेखक और निर्देशक ने इस साधारण कहानी को ज्यादा ड्रामा देने के चक्कर में इसमें इतने सारे भावनात्मक मोड़, अनावश्यक सब-प्लॉट्स और भटकाव जोड़ दिए हैं, जो दर्शकों को प्रभावित करने के बजाय थका देते हैं।
फिल्म के कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें बिना किसी उचित तालमेल के जबरदस्ती एक-दूसरे के साथ सिल दिया गया हो, जिसके कारण दृश्यों का स्वाभाविक प्रवाह (फ्लो) पूरी तरह से गायब दिखता है। फिल्म में कई बड़े और गंभीर टकराव अचानक से बिना किसी ठोस वजह के पैदा होते हैं और बिना किसी तार्किक अंत के उतनी ही तेजी से सुलझ भी जाते हैं। इन भावनात्मक पलों को पर्दे पर ठहरने, विकसित होने और दर्शकों के दिलों में उतरने के लिए जिस ठहराव की जरूरत थी, उसकी इस पूरी फिल्म में भारी कमी खलती है।
अभिनय
अगर अभिनय के मोर्चे पर बात करें, तो अभिनेत्री अनन्या पांडे ने इस फिल्म में वाकई अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी और कड़ी मेहनत की है। उन्होंने चांदनी के किरदार में एक खास गर्माहट, मासूमियत और संवेदनशीलता लाने का गंभीर प्रयास किया है। खासकर फिल्म के दूसरे हिस्से में, जहां उनका किरदार भारी मानसिक और भावनात्मक तनाव से गुजरता है, वहां अनन्या की मेहनत साफ झलकती है। कई भावुक दृश्यों में उनका यह प्रयास रंग लाता है और दर्शक उनके प्रति सहानुभूति महसूस करते हैं। हालांकि, कुछ दृश्यों में ऐसा भी लगता है कि वे उन भारी-भरकम भावनाओं को जबरदस्ती चेहरे पर लाने की कोशिश कर रही हैं, जिन्हें फिल्म की कमजोर स्क्रिप्ट ने ठीक से स्थापित ही नहीं किया था। इसके बावजूद, उनके इस प्रदर्शन को उनका एक सिंसियर एफर्ट माना जाएगा।
दूसरी ओर इस फिल्म से बड़ी उम्मीदें जगाने वाले अभिनेता लक्ष्य की स्क्रीन प्रेजेंस काफी शानदार और आकर्षक है। फिल्म के कई हिस्सों में उनके चेहरे के हाव-भाव, संवाद अदायगी का तरीका और बॉडी लैंग्वेज दर्शकों को बॉलीवुड सुपरस्टार रणबीर कपूर के शुरुआती दिनों की याद दिलाते हैं। कुछ विशिष्ट गंभीर दृश्यों में वे बेहद आश्वस्त और प्रभावशाली दिखाई देते हैं, लेकिन फिल्म का कमजोर और ढीला लेखन उन्हें अपनी अभिनय क्षमता को पूरी तरह से तलाशने और दिखाने का मौका नहीं देता।
अनन्या और लक्ष्य के बीच की स्क्रीन केमिस्ट्री कुछ शुरुआती दृश्यों में बेहतरीन स्पार्क पैदा करती है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वह केमिस्ट्री कहीं खो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फिल्म की कहानी खुद ही बार-बार अपने भावनात्मक प्रवाह को बीच में ही तोड़ देती है। कई जगहों पर दोनों का अभिनय काफी नाटकीय और पहले से रिहर्सल किया हुआ महसूस होता है, जैसे कलाकार उस परिस्थिति को भीतर से जीने के बजाय सिर्फ कैमरे के पीछे से मिलने वाले निर्देशों (क्यूज) का इंतजार कर रहे हों।
ग्राउंडेड रियलिज्म और सिनेमाई ड्रामे का असंतुलन
विवेक सोनी के निर्देशन में बनी और करण जौहर के मशहूर बैनर धर्मा प्रोडक्शंस के तहत तैयार हुई यह फिल्म शुरुआत से लेकर अंत तक अपने टोन (मिजाज) को लेकर भारी असमंजस में दिखाई देती है। एक तरफ फिल्म खुद को एक यथार्थवादी, जमीन से जुड़ी, गंभीर और आधुनिक दौर की प्रेम कहानी के रूप में पेश करना चाहती है, तो दूसरी तरफ इसमें पारंपरिक बॉलीवुड का भव्य सिनेमाई ड्रामा, लाउड मेलोड्रामा और बनावटीपन भी ठूंसने की कोशिश की गई है। इन दोनों अलग-अलग शैलियों के बीच का संतुलन पूरी फिल्म में कभी भी सही तरीके से उभरकर सामने नहीं आ पाता।
निर्देशक विवेक सोनी कहानी की गति (पेसिंग) को नियंत्रित करने में भी बुरी तरह मात खा गए हैं। फिल्म उन हिस्सों में बहुत धीमी गति से रेंगती है जहां कहानी को तेजी से आगे बढ़ना चाहिए था, और इसके विपरीत, उन महत्वपूर्ण भावनात्मक बदलावों वाले दृश्यों को बेहद जल्दबाजी में निपटा देती है जहां दर्शकों को किरदारों के दर्द और उनके फैसलों को समझने के लिए समय की आवश्यकता थी। आप पूरी फिल्म के दौरान किसी ऐसे पल का इंतजार करते रहते हैं जो सीधे आपके दिल पर गहरा वार करे और आपको रोने पर मजबूर कर दे, लेकिन पूरी फिल्म में ऐसा शायद ही कभी होता है।
सचिन-जिगर ने फूंकी फिल्म में जान
अगर इस फिल्म का कोई एक पक्ष पूरी तरह से परफेक्ट, मजबूत और काबिले-तारीफ है, तो वह निश्चित रूप से इसका संगीत है। मशहूर संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर ने फिल्म के लिए एक बेहद खूबसूरत, रूहानी और शानदार साउंडट्रैक तैयार किया है, जो फिल्म के कई बेहद फीके और उबाऊ दृश्यों में भी जान फूंकने का काम करता है।
फिल्म का टाइटल ट्रैक बेहद सुरीला और दिल को छू लेने वाला है, जो थिएटर्स से बाहर निकलने के बाद भी आपके दिमाग में लंबे समय तक गूंजता रहता है। इसके अलावा फिल्म के कुछ सॉफ्ट और बैकग्राउंड रोमांटिक गाने इतने बेहतरीन ढंग से लिखे और गाए गए हैं कि वे फिल्म के संवादों से कहीं अधिक गहराई से किरदारों की भावनाओं को व्यक्त कर देते हैं। निश्चित रूप से, इस फिल्म के भावनात्मक माहौल को पूरी तरह बिखरने से बचाने में इसके संगीत ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
क्या रहा बेहतर और कहां चूक गई फिल्म?
क्या सही रहा
- फिल्म के कुछ चुनिंदा हिस्सों में जहां दोनों मुख्य किरदारों के बीच बिना किसी शोर-शराबे के शांत बातचीत, छोटी-मोटी नोकझोंक और संवेदनशील संवाद होते हैं, वे दृश्य काफी वास्तविक और प्यारे लगते हैं।
- फिल्म का शुरुआती हिस्सा, जो कॉलेज के दिनों और प्यार की शुरुआत को दिखाता है, काफी हल्का-फुल्का और मनोरंजक है। यहां अनन्या और लक्ष्य की केमिस्ट्री सबसे ज्यादा नेचुरल लगती है।
- सचिन-जिगर का संगीत पूरी फिल्म को एक मजबूत भावनात्मक सहारा देता है और कमजोर दृश्यों के प्रभाव को भी बढ़ा देता है।
कहां चूक गई फिल्म
- फिल्म की कहानी ही इसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है। स्क्रिप्ट लगातार सादगी और जबरदस्ती थोपी गई जटिलता के बीच झूलती रहती है, जिससे दर्शक किरदारों से जुड़ नहीं पाते।
- फिल्म की गति बेहद असमान है। यह महत्वपूर्ण और गहरे दृश्यों को बहुत जल्दी खत्म कर देती है, जबकि गैर-जरूरी दृश्यों को बेवजह लंबा खींचती है।
- कई जगहों पर संवाद बेहद अस्वाभाविक और भारी-भरकम लगते हैं, जो 20-22 साल के युवाओं की सामान्य बोलचाल की भाषा से मेल नहीं खाते। इसके कारण कलाकारों के रिएक्शन्स भी कई बार डिलेड और नकली महसूस होते हैं।
निराशाजनक रूप से एक औसत सिनेमा
कुल मिलाकर कहें तो 'चांद मेरा दिल' के पास एक बेहतरीन, यादगार, दिल को छू लेने वाला और संवेदनशील रोमांटिक ड्रामा बनने के सभी जरूरी तत्व मौजूद थे। फिल्म के पास धर्मा प्रोडक्शंस जैसा बड़ा बैनर था, युवा कलाकारों की लगन थी, सचिन-जिगर का शानदार संगीत था और एक ऐसी कहानी थी जिससे आज की युवा पीढ़ी बहुत आसानी से खुद को जोड़ सकती थी। लेकिन बेहद कमजोर लेखन, बिखरी हुई पटकथा और अनुभवहीन एग्जीक्यूशन के कारण यह फिल्म दर्शकों के दिल पर कोई स्थायी प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहती है। यह कोई बहुत खराब या असहनीय फिल्म नहीं है जिसे देखना बिल्कुल समय की बर्बादी हो, लेकिन अपनी ही बनावटी कमियों और मेलोड्रामा के कारण यह सिर्फ एक निराशाजनक औसत फिल्म बनकर रह जाती है, जो बेहतर होने की क्षमता रखने के बावजूद अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाती। 'चांद मेरा दिल' के लिए अंतिम रेटिंग 5 में से 2 स्टार।