नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जयंती माह में रूपा अय्यर के निर्देशन में बनी ये पीरियड ड्रामा फिल्म आजाद हिंद फ़ौज की पृष्ठभूमि पर बेस्ड है, जिसमें विशेष रूप से उसकी महिला इकाई रानी झांसी रेजिमेंट (जिसे रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट के नाम से भी जाना जाता है) पर फोकस किया गया है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला क्रांतिकारी नीरा आर्या के जीवन गाथा फिल्म में विशेष रूप से दिखाया गया है नए साल पर फिल्म आजाद भारत सिनेमागृह में का प्रमुख आकर्षण है ।
भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में कई वीरांगनाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है और ऐसी ही एक फ्रीडम फाइटर नीरा आर्या थीं, जिनके संघर्ष और उनके बलिदान को इस सिनेमा में प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है. सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में नीरा आर्या काम करती थीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान की दुश्मन बनी अंग्रेज सरकार में सीआईडी इंस्पेक्टर अपने पति श्रीकांत को भी नीरा ने जान से मार दिया था। सुभाष चंद्र बोस की रणनीति के साथ ही फिल्म आजाद भारत नीरा आर्या की दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी कहती है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
नीरा आर्या की मुख्य भूमिका रूपा अय्यर ने बहुत ही असरदार तरीके से निभाई है. नीरा के आक्रोश, गुस्सा, चेहरे के हाव भाव ने प्रभावित किया है। वह अंग्रेजों का अत्याचार सहती है मगर हिम्मत नहीं हारती। हर एक रूप मे रूपा अय्यर किरदार में ढली हुई नजर आती है। विशेष उल्लेख उस सीन का है जब नीरा अपने पति श्रीकांत (प्रियांशु चटर्जी) को मार देती है और ये संवाद बोलती है "तुम जैसे अंग्रेजो के कुत्ते के हाथ मे नेताजी कभी नहीं आने वाले।" नीरा आर्या को पर्दे पर उतारना बहुत मुश्किल और चुनौतियों भरा था मगर इस रोल के लिए रूपा अय्यर की मेहनत और तैयारी दिखाई देती है। इस भूमिका के लिए वह अवॉर्ड की हकदार हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में श्रेयस तलपड़े ने भी अपनी गहरी छाप छोड़ी है और उनके कुछ चुनिंदा किरदारों मे से ये भूमिका होग। इस रोल के लिए जो संजीदगी चाहिए थी उन्होंने उसे अपने चेहरे के अलावा शारीरिक भाषा में भी कायम रखा है. जब वह ये डायलॉग बोलते हैं, "नारी जब ठान ले उसे कोई नहीं रोक सकता। मुझे नाज है हिंद की नारी पर. इतिहास साक्षी है कि भारतीय नारी चट्टान को भी हिला सकती है।" सरस्वती राजामणि के रूप में इंदिरा तिवारी का अभिनय भी सराहनीय है और छज्जूराम के रूप में सुरेश ओबेरॉय ने भी अपनी भूमिका से न्याय किया है।
जहां तक निर्देशन का सवाल है रूपा अय्यर हर मोर्चे पर सफल रही हैं। एक गुमनाम क्रांतिकारी पर फिल्म बनाना बड़ी जिम्मेदारी का काम था। उन्होने काफी अध्ययन और रिसर्च के बाद इसे फिल्माया है। फिल्म बेशक वास्तविक घटनाओं पर आधारित है मगर कहानी में ट्विस्ट और टर्न दर्शकों को पसंद आएंगे। निर्देशक रूपा अय्यर ने ऑडियंस के रोंगटे खड़े कर देने वाली फिल्म बनाई है। देशभक्ति की भावना जगाती फिल्म की शूटिंग अद्भुत ढंग से की गई ह। ट्रेनिंग के दृश्य जोश और जज्बे से भरे है। थ्रिल भरे दृश्य आपको एंगेज रखते हैं. बैकग्राउंड म्युज़िक लाजवाब है जो कहानी की रफ़्तार के अनुसार है।
अभिनय और डायरेक्शन के अलावा फिल्म के डायलॉग दिल छू लेने वाले हैं। नीरा जब महिलाओं को संबोधित करती है, 'प्रेम ही करना हो तो अपने देश से करो। ये मत भूलो कि देश पहले है। स्वतंत्रता किसी एक के लिए नहीं पूरे भारत के लिए है।" या फिर ये संवाद देखें 'क्रांति की तलवार बम या बंदूक पर नहीं विचारों की धार पर तेज की जाती है।' फिल्म का संगीत पक्ष भी मजबूत है> जय हो गीत शानदार है जो देशभक्ति की भावना और जोश को जगाता है। सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित भारत की पहली महिला सेना में शामिल स्वतंत्रता सेनानी नीरा आर्य की ये कहानी हर भारतीय को देखनी चाहिए। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ अनकही कहानियों और कुछ गुमनाम सिपाहियों की स्टोरी में से ये भी एक जरूरी सच्ची कथा है जो साहस और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करती है।