तिग्मांशु धूलिया का नाम आते ही दिमाग में ऐसी कहानियां आती हैं, जिनमें छोटे शहरों की धूल, बीहड़ का खौफ, अपराध की दुनिया और राजनीति का खेल एक साथ दिखाई देता है। उनकी फिल्मों में किरदार सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं होते, बल्कि अपने साथ एक पूरा माहौल लेकर चलते हैं। यही वजह है कि जब घमासान जैसी फिल्म सामने आती है, जिसमें डकैत, पुलिस और चुनावी राजनीति आमने-सामने हैं, तो उम्मीद अपने आप बढ़ जाती है। फिल्म में वह कच्चापन और जमीन से जुड़ा माहौल जरूर दिखाई देता है, लेकिन कहानी जिस स्तर तक पहुंच सकती थी, वहां तक नहीं पहुंच पाती। घमासान एक क्राइम-एक्शन ड्रामा है, जिसकी कहानी बुंदेलखंड के उस इलाके में घूमती है जहां अपराध और राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। फिल्म के पास एक मजबूत विषय है, अच्छे कलाकार हैं और निर्देशक का अनुभव भी है। इसके बावजूद सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई मौकों पर फिल्म अपने ही बनाए माहौल का फायदा नहीं उठा पाती। कुछ सीक्वेंस असरदार हैं, कुछ संवाद ध्यान खींचते हैं और अंतिम हिस्से में कहानी संभलती भी है, लेकिन पूरी फिल्म को एक साथ देखें तो यह एक औसत अनुभव बनकर रह जाती है। विस्तार से जानें पूरा रिव्यू-
कहानी और प्लॉट
फिल्म की कहानी महाराज नाम के एक खतरनाक डकैत के इर्द-गिर्द बुनी गई है। वह जंगल में रहता है और उसके बारे में इलाके में ऐसा डर बना हुआ है कि लोग उसका नाम लेने से भी बचते हैं। उसका नेटवर्क इतना मजबूत है कि पुलिस के लिए उस तक पहुंचना आसान नहीं है। अपराध उसके लिए सिर्फ ताकत दिखाने का जरिया नहीं, बल्कि पूरे इलाके पर नियंत्रण बनाए रखने का माध्यम है। उसके प्रभाव में हिंसा, वसूली और राजनीति सब कुछ शामिल है। इसी माहौल में IPS अधिकारी आदित्य सिंह की एंट्री होती है। आदित्य ईमानदार अधिकारी है और चुनाव के दौरान उसे ऐसे इलाके में जिम्मेदारी मिलती है, जहां डर के कारण लोगों के लिए स्वतंत्र रूप से मतदान करना भी मुश्किल है। यहां उसका सामना सिर्फ एक अपराधी से नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम से होता है जिसमें अपराध और सत्ता एक-दूसरे को सहारा देते नजर आते हैं।
फिल्म की कहानी मूल रूप से आदित्य और महाराज के बीच चलने वाली इसी टकराहट को आगे बढ़ाती है। एक तरफ पुलिस की रणनीति है तो दूसरी तरफ महाराज का स्थानीय प्रभाव और उसका मजबूत नेटवर्क। दोनों के बीच यह मुकाबला धीरे-धीरे व्यक्तिगत संघर्ष का रूप लेता है। शुरुआती हिस्से में फिल्म कहानी का माहौल बनाने में कुछ ज्यादा समय लेती है। लगभग पहले आधे घंटे में गति थोड़ी धीमी महसूस हो सकती है। हालांकि इसके बाद घटनाक्रम तेजी पकड़ता है और पुलिस की तैयारियों तथा महाराज के खिलाफ बनाई जा रही रणनीति में दिलचस्पी पैदा होती है। कुछ गांव वाले और पुलिस वाले मुठभेड़ वाले हिस्से कहानी को आगे बढ़ाते हैं, लेकिन कई जगह इन दृश्यों को जरूरत से ज्यादा लंबा खींच दिया गया है। इससे रोमांच का असर कम होता है। फिल्म की अच्छी बात यह है कि यह क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते अपनी पकड़ दोबारा मजबूत करती है। अंतिम हिस्से में आदित्य की रणनीति कहानी में कुछ तनाव पैदा करती है। हालांकि यहां भी बहुत ज्यादा चौंकाने वाला मोड़ नहीं मिलता। फिल्म का सफर ऐसा है जिसमें आप कई घटनाओं का अंदाजा पहले ही लगा सकते हैं।
निर्देशन
तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन की सबसे बड़ी खासियत हमेशा उनका रॉ और देसी ट्रीटमेंट रहा है। 'घमासान' में भी वह इसी अंदाज को बरकरार रखते हैं। फिल्म को चमकदार क्राइम ड्रामा बनाने की बजाय वह उसे जमीन के करीब रखते हैं। चित्रकूट और बुंदेलखंड की लोकेशन फिल्म को वास्तविकता का एहसास देती हैं। गांव, जंगल, पुलिस कैंप और छोटे कस्बों का माहौल कहानी के लिए बिल्कुल सही बैठता है, लेकिन समस्या यह है कि निर्देशक कई दृश्यों में उस प्रभाव को पैदा नहीं कर पाते, जिसकी कहानी मांग करती है। फिल्म में हिंसा और क्रूरता के कई दृश्य हैं, लेकिन हर दृश्य दर्शक के भीतर वैसा डर या बेचैनी पैदा नहीं करता। कुछ सीक्वेंस ऐसे हैं जिनमें आइडिया अच्छा है, मगर उसका फिल्मांकन प्रभावी नहीं बन पाता। फिल्म में राजनीति और ग्रामीण समाज की जटिलताओं को भी छुआ गया है। चुनाव, सत्ता और अपराध का संबंध कहानी के बैकग्राउंड में मौजूद है। लेकिन इन विषयों को विस्तार से तलाशने के बजाय फिल्म जल्दी ही आदित्य और महाराज के आमने-सामने के संघर्ष पर लौट आती है। यही वजह है कि कहानी में मौजूद कई संभावनाएं अधूरी रह जाती हैं।
स्क्रीनप्ले और संवाद
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसका स्क्रीनप्ले है। एक डकैत-पुलिस कहानी में संवाद और किरदारों की परतें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। दर्शक को यह महसूस होना चाहिए कि सामने वाला अपराधी इतना खतरनाक क्यों है और पुलिस अधिकारी उसके खिलाफ किस मानसिकता के साथ खड़ा है। 'घमासान' इस मामले में आधी दूरी ही तय कर पाती है। महाराज को खतरनाक दिखाने के लिए कई हिंसक घटनाओं का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उसके व्यक्तित्व की गहराई कम महसूस होती है। इसी तरह आदित्य एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी है, लेकिन उसके निजी और पेशेवर संघर्ष को ज्यादा विस्तार नहीं दिया गया। कुछ संवाद अच्छे हैं, खासकर जब आदित्य और महाराज आमने-सामने आते हैं। लेकिन ऐसे संवादों की संख्या कम है जिन्हें फिल्म खत्म होने के बाद याद रखा जाए। स्रोत समीक्षाओं में भी स्क्रीनप्ले और याद रह जाने वाले संवादों की कमी को फिल्म की बड़ी कमजोरी माना गया है।
एक्टिंग
अरशद वारसी ने महाराज के किरदार को अपने अंदाज में निभाने की कोशिश की है। उनका लुक और बॉडी लैंग्वेज किरदार के अनुकूल है। वह पर्दे पर एक खतरनाक व्यक्ति की छवि बनाने में सफल होते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा मौके नहीं देती। कम संवाद भी उनके किरदार के असर को सीमित करते हैं। प्रतीक गांधी आदित्य के किरदार में संयमित नजर आते हैं। एक ईमानदार IPS अधिकारी के रूप में उनकी गंभीरता अच्छी लगती है। उनके किरदार में एक शांत स्वभाव है और यही बात उन्हें महाराज के आक्रामक व्यक्तित्व से अलग करती है। हालांकि उनके किरदार को भी ज्यादा मजबूत बैकस्टोरी और बेहतर संवाद मिलते तो प्रदर्शन का असर और बढ़ सकता था।
राजपाल यादव इस फिल्म में सबसे ज्यादा चौंकाते हैं। उन्हें आमतौर पर कॉमेडी से जुड़े किरदारों में देखने वाले दर्शकों के लिए यहां उनका अलग रूप दिलचस्प है। उनका किरदार फिल्म में एक अलग तरह की ऊर्जा लेकर आता है और वह अपने हिस्से को प्रभावी ढंग से निभाते हैं। इशिता दत्ता सीमित स्क्रीन टाइम में आदित्य की पत्नी के किरदार में ठीक लगती हैं। हालांकि उनके किरदार को भी कहानी में ज्यादा करने के लिए नहीं दिया गया है। बाकी कलाकारों का काम कहानी की जरूरत के मुताबिक है।
सिनेमैटोग्राफी और तकनीकी पक्ष
तकनीकी तौर पर फिल्म पूरी तरह निराश नहीं करती। इसकी सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और बुंदेलखंड की लोकेशन को कैमरे ने खूबसूरती से कैद किया है। फिल्म की दुनिया में एक रॉ और वास्तविक एहसास है, जो इसके विषय के साथ अच्छी तरह मेल खाता है। कॉस्ट्यूम और आर्ट डिजाइन भी कहानी के ग्रामीण परिवेश को विश्वसनीय बनाते हैं। दूसरी तरफ एडिटिंग औसत है। फिल्म की लंबाई का सबसे ज्यादा असर यहीं दिखाई देता है। कुछ दृश्यों को छोटा किया जाता तो कहानी ज्यादा तेज और प्रभावी लग सकती थी। एक्शन सीक्वेंस में भी सुधार की गुंजाइश है। फिल्म में कई जगह हिंसा दिखाई गई है, लेकिन सिर्फ हिंसा दिखा देना किसी दृश्य को रोमांचक नहीं बनाता। कुछ मुठभेड़ और ऑपरेशन वाले हिस्सों में तनाव पैदा होता है, लेकिन कई लंबे सीक्वेंस अपना असर खो देते हैं।
क्या नहीं किया काम?
फिल्म के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इसमें एक बेहतरीन क्राइम ड्रामा बनने की पूरी संभावना थी, लेकिन स्क्रीनप्ले उस संभावना को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाया। कहानी में अपराध, राजनीति, चुनाव और पुलिस व्यवस्था जैसे कई मजबूत पहलू हैं, लेकिन इन सबको गहराई देने की बजाय फिल्म मुख्य टकराव तक सीमित रहती है। दूसरी बड़ी समस्या पेसिंग है। शुरुआत धीमी है और बीच में कुछ सीक्वेंस कहानी को रोकते हुए लगते हैं। एक्शन के बावजूद हर जगह रोमांच बरकरार नहीं रहता। तीसरी समस्या किरदारों की है। महाराज और आदित्य दोनों को और ज्यादा परतें दी जा सकती थीं। दर्शक को दोनों की सोच, कमजोरियों और निजी संघर्षों के बारे में ज्यादा जानने का मौका मिलता तो उनकी भिड़ंत का असर कहीं ज्यादा होता।
अंतिम फैसला
'घमासान' एक ऐसी फिल्म है जिसमें विषय मजबूत है, लोकेशन शानदार हैं और कलाकारों ने अपनी तरफ से अच्छा काम किया है। तिग्मांशु धूलिया का रॉ ट्रीटमेंट फिल्म को एक अलग पहचान देता है और अरशद वारसी, प्रतीक गांधी तथा राजपाल यादव अपने-अपने हिस्से में प्रभावित करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, असमान गति, सीमित किरदार और कई जगह पूर्वानुमानित घटनाक्रम फिल्म को बेहतरीन क्राइम थ्रिलर बनने से रोक देते हैं। फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य जरूर हैं जो दर्शक को स्क्रीन से जोड़े रखते हैं, लेकिन उनके बीच कई ऐसे हिस्से भी आते हैं जहां ध्यान भटकना स्वाभाविक है। क्लाइमैक्स फिल्म को थोड़ा संभालता है, मगर पूरी यात्रा को यादगार बनाने के लिए इतना काफी नहीं है। अगर आपको डकैत, पुलिस और ग्रामीण राजनीति पर आधारित रॉ कहानियां पसंद हैं तो 'घमासान' को एक बार देखा जा सकता है, लेकिन इसे तिग्मांशु धूलिया की पुरानी फिल्मों के स्तर पर रखकर देखने से निराशा हो सकती है। यह न तो पूरी तरह खराब फिल्म है और न ही ऐसी फिल्म जिसे देखने के बाद लंबे समय तक याद रखा जाए।