भारतीय सिनेमा में डार्क कॉमेडी और 'नियो-नोइर' शैलियों के साथ प्रयोग करना हमेशा से एक जोखिम भरा काम रहा है। निर्देशक अक्सर 'कल्ट' क्लासिक्स बनाने की होड़ में मौलिकता और स्पष्टता को पीछे छोड़ देते हैं। 'कैंडी एंड द पिज्जा गर्ल' इसी श्रेणी की एक ऐसी फिल्म है, जो अपनी बनावट और शीर्षक के साथ दर्शकों को एक विचित्र और रोमांचक सफर का वादा तो करती है, लेकिन जल्द ही अपने ही बुने हुए जाल में उलझ जाती है। फिल्म का नाम और इसका प्रचार इसे एक 'ट्रिपी' अनुभव के रूप में पेश करता है, परंतु परदे पर यह अनुभव किसी रोमांचक यात्रा के बजाय एक थका देने वाले सफर में बदल जाता है। जहाँ 'दिल्ली बेली' जैसी फिल्मों में अराजकता के पीछे एक सधी हुई पटकथा थी, वहीं यहाँ केवल अराजकता ही शेष रह जाती है।
पटकथा और कहानी
फिल्म की कहानी मुंबई की एक ही रात के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है, जहाँ विभिन्न पात्रों के जीवन एक सनकी मोड़ पर आकर टकराते हैं। सिद्धांत रूप में, यह विचार दिलचस्प लगता है, लेकिन निष्पादन के स्तर पर पटकथा पूरी तरह से बिखर जाती है। कहानी में 'पिज्जा गर्ल' का प्रवेश एक बड़े रहस्य की तरह दिखाया गया है, पर फिल्म के आगे बढ़ने के साथ यह रहस्य सुलझने के बजाय दर्शकों को चिढ़ाने लगता है।
लेखन में सबसे बड़ी कमी यह है कि पात्रों के बीच होने वाले टकराव और घटनाएं बेहद संयोग आधारित लगती हैं। डार्क कॉमेडी की सफलता इस बात पर टिकी होती है कि स्थितियाँ कितनी भी अजीब क्यों न हों, वे कहानी के भीतर तार्किक लगनी चाहिए। यहाँ, घटनाएं बिना किसी ठोस आधार के घटती हैं। नॉन-लीनियर स्टोरीटेलिंग का सहारा लेकर फिल्म अपनी कमजोरियों को छिपाने की कोशिश करती है, लेकिन यह केवल भ्रम पैदा करता है। कहानी में गहराई की कमी है और संवाद, जो कभी-कभी दार्शनिक होने की कोशिश करते हैं, बनावटी और उबाऊ लगने लगते हैं।
अभिनय: प्रतिभा का गलत इस्तेमाल
अभिनय के मोर्चे पर, फिल्म में कुछ अनुभवी नाम होने के बावजूद, कमजोर कैरेक्टेराइजेशन ने कलाकारों के हाथ बांध दिए हैं। निनाद कामत ने 'बॉबी' के रूप में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी है। उनकी संवाद अदायगी और हाव-भाव में वह सनक साफ दिखती है जिसकी निर्देशक को तलाश थी। हालांकि, उनका किरदार इतना एग्जैजुरेटेज है कि एक समय के बाद वह प्रभावी होने के बजाय परेशान करने लगता है।
शिवानी सिंह ने 'कैंडी' के रूप में एक शांत गरिमा बनाए रखने की कोशिश की है, जो फिल्म के शोर-शराबे के बीच राहत की तरह आती है। लेकिन उनके किरदार को पर्याप्त विस्तार नहीं मिला है। प्रिया बनर्जी, जिन्होंने 'पिज्जा गर्ल' की मुख्य भूमिका निभाई है, केवल एक प्रतीकात्मक उपस्थिति बनकर रह गई हैं। उनका अभिनय रहस्यमयी होने के बजाय भ्रमित लगता है। अन्य सहायक कलाकार जैसे दारा संधू और निमिष शितोले ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने की कोशिश की है, लेकिन फिल्म का ढांचा इतना कमजोर है कि कोई भी व्यक्तिगत प्रदर्शन इसे डूबने से नहीं बचा पाता।
निर्देशन और विजन
निर्देशक अखिल कपूर ने फिल्म को एक अंतर्राष्ट्रीय 'इंडी' फिल्म जैसा लुक देने का प्रयास किया है। उनका विजन आधुनिक शहरी जीवन के अंधेरे पक्ष को दिखाना था, लेकिन वे 'स्टाइल' और 'सबस्टेंस' के बीच संतुलन बनाने में विफल रहे। निर्देशन में स्पष्टता की कमी साफ झलकती है; ऐसा लगता है जैसे निर्देशक खुद तय नहीं कर पाए कि वे एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर बनाना चाहते हैं या एक विशुद्ध डार्क कॉमेडी।
फिल्म का पेसिंग भी एक बड़ी समस्या है। एक रात की कहानी होने के बावजूद, फिल्म की गति इतनी धीमी है कि दर्शक अपनी रुचि खोने लगते हैं। नीयॉन लाइटों और तंग गलियों का उपयोग दृश्य रूप से अच्छा लग सकता है, लेकिन यदि निर्देशक भावनाओं और तनाव को पर्दे पर नहीं उतार पा रहे हैं, तो ये तकनीकी तत्व बेमानी हो जाते हैं। अतियथार्थवाद के नाम पर जो कुछ भी परोसा गया है, वह कलात्मक कम और अव्यवस्थित अधिक लगता है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी रूप से फिल्म औसत है। सिनेमैटोग्राफी ने मुंबई की रातों को कैप्चर करने में मेहनत की है। नीयॉन रंगों का अत्यधिक उपयोग और 'डच एंगल्स' का सहारा इसे एक 'ट्रिपी' वाइब देने के लिए लिया गया है। शुरुआत में यह आकर्षक लगता है, लेकिन पूरी फिल्म के दौरान यही पैटर्न इसे एक संगीत वीडियो जैसा बना देता है।
फिल्म का संगीत और साउंड डिजाइन कहानी के 'उन्मादी' मूड को बढ़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई जगहों पर पृष्ठभूमि संगीत संवादों पर हावी हो जाता है। संपादन (Editing) इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे खींचे गए हैं, और ट्रांजिशन इतने झटकेदार हैं कि वे कहानी के प्रवाह को बाधित करते हैं। यदि संपादन थोड़ा चुस्त होता, तो शायद यह फिल्म देखने योग्य बनी रहती।
एक अधूरा और थकाऊ अनुभव
'कैंडी एंड द पिज्जा गर्ल' एक ऐसी फिल्म है जो बहुत कुछ होने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः कुछ भी ठोस नहीं बन पाती। यह लीक से हटकर चलने का साहस तो दिखाती है, लेकिन उस रास्ते पर चलने के लिए जरूरी स्पष्टता और पकड़ इसमें गायब है। डार्क कॉमेडी के शौकीनों के लिए भी यह एक कठिन परीक्षा की तरह है क्योंकि यहाँ 'कॉमेडी' कम और 'असुविधा' ज्यादा है।
अंतिम वर्डिक्ट
यदि आप सिनेमाई प्रयोगों के कट्टर प्रशंसक हैं और आपके पास असीमित धैर्य है, तो ही आप इस फिल्म की ओर रुख करें। आम दर्शकों के लिए, यह एक दिशाहीन और उलझी हुई फिल्म साबित होगी जो अंत तक आते-आते अपनी प्रासंगिकता खो देती है। इसे 'आउट ऑफ द बॉक्स' कहने के बजाय 'आउट ऑफ कंट्रोल' कहना ज्यादा सटीक होगा।
रेटिंग: 2/5 सितारे