आखिरकार वो दिन आ ही गया, जिसका सुपरस्टार विजय के फैंस को बेसब्री से इंतजार था। तमिलनाडू का मुख्यमंत्री बनने से पहले थलापति विजय की आखिरी फिल्म 'जना नायकन' को कई मुश्किलों से होकर गुजरना पड़ा। पहले ये फिल्म जनवरी 20226 को रिलीज होनी थी, लेकिन सेंसरशिप के चक्कर में ये फिल्म ऐसी फंसी की दर्शकों 'जना नायकन', हिंदी में जिसका नाम 'जन नेता' है, को देखने के लिए पूरे 7 साल का इंतजार करना पड़ गया। विजय की आखिरी फिल्म होने के चलते लाखों दर्शक इससे भावनात्मक रूप से जुड़े थे और ये कहना गलत नहीं होगा कि ये पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ विजय की फिल्म है। अब ये मोस्ट अवेटेड फिल्म (जना नायकन) सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है और इसमें विजय की एंट्री, शानदार एक्शन सीन तो दमदार हैं, लेकिन दूसरी तरफ फिल्म की कहानी, क्लाइमैक्स और जरूरत से ज्यादा लंबाई कहीं न कहीं निराश करते हैं। खैर अब चलिए फिल्म के पॉजिटिव और नेगेटिव पहलुओं पर बात करते हैं।
कहानी
कहानी थालपति वेत्री कोंडन उर्फ टीवीके (विजय) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जेल में बंद है। जेल में बंद वेत्री को देखकर एक दिन एक ईमानदार जेलर (गौतम वासुदेव मेनन) को उस पर दया आती है, जो उसके अंदर की इंसानियत को पहचानता है और आखिरकार नियमों के खिलाफ जाकर ये जेलर वेत्री को उसकी बूढ़ी मां (रेवती) से मिलवाता है। लेकिन, जेलर को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है। नियमों की अनदेखी करने के चलते उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। वहीं एक हादसे जेलर की मौत हो जाती है, लेकिन मौत से पहले वो अपनी बेटी विजी (ममता बैजू) की जिम्मेदारी वेत्री को सौंप देता है, जिसके बाद वेत्री, विजी का ख्याल रखता है और उसे सेना में अधिकारी बनाने का सपना पूरा करने निकल पड़ता है।
इसी बीच कहानी में एंट्री होती है जॉन हेमलर की, जिसका किरदार बॉबी देओल ने निभाया है। जॉन एक निर्दयी हत्यारा और एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी है। जॉन, साउथ अफ्रीका में अराजकता फैलाने के बाद अब भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देना चाहता है। फिर कहानी में पत्रकार कयाल (पूजा हेगड़े) की भी एंट्री होती है। इसी बीच विजी किडनैप हो जाती है। जब वेत्री, विजी को बचाने पहुंचता है तो उसका सामना जॉन हेमलर से होता है। दोनों के तार अतीत से जुड़े हैं। जॉन का एक अतीत है और इस अतीत में वो कभी डिप्टी कमिश्नर अमरीश पुजारी हुआ करता था। मगर शुरुआत में जो कहानी भावनात्मक लगती है, वो जल्दी ही आतंकवाद, राजनीति, सत्ता की लड़ाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों में उलझ जाती है।इसमें कुछ जॉन उर्फ अमरीश का क्या अतीत है? और उसका वेत्री से क्या कनेक्शन है, ये फिल्म के सेकेंड हाफ में पता चलता है।
अभिनय
अभिनय की बात करें तो विजय हमेशा की तरह 'जन नेता' में भी आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। अगर ये कहें कि विजय ही इस फिल्म की जान हैं तो गलत नहीं होगा। वैसे भी ये पूरी तरह से विजय की ही फिल्म है, जिनकी स्क्रीन प्रेजेंस दमदार है। कहानी अगर कहीं कमजोर भी पड़ने लगती है तो विजय का स्टारडम दर्शकों को स्क्रीन से बांधे रखता है। मगर फिल्म उतने देर तक ही देखने का मन करता है, जब तक विजय सामने होते हैं। उनके डायलॉग, अंदाज, जोश और आक्रोश कमाल का है। हिंदी डब वर्जन में संकेत महात्रे की आवाज है, जो विजय के ऑरा को जस्टिफाई करती है।
बॉबी देओल, जॉन हेमलर के किरदार में कागजों पर जितने दमदार लगते हैं, स्क्रीन पर उतना असर नहीं छोड़ते। बॉबी देओल ने बीती कुछ फिल्मों में खूंखार विलेन के किरदार निभाए हैं, लेकिन सभी में एक सा अभिनय कर रहे हैं। उन्हें देखकर ‘एनिमल’ के अबरार या फिर यूं कहें कि ‘अल्फा’ के फतेह का याद आना लाजमी है। वही एक्सप्रेशन और वही अंदाज, लगता है जैसे अगर कुछ बदला है तो वो है नाम। निर्दयी हत्यारे के रोल में वह कुछ खास नहीं डराते।
पूजा हेगड़े की बात करें तो फिल्म में उनका किरदार कुछ खास कमाल नहीं दिखाता। वह फिल्म में नाम मात्र के लिए हैं और ममता बैजू विजी के किरदार में अच्छी लगी हैं। ममता की खासियत ये है कि उन्हें जो भी किरदार दिया जाए, वह उसमें जान फूंक देती हैं। उनके अलावा प्रकाश राज, प्रियामणि, गौतम वासुदेव मेनन, और नासर ने अपने किरदारों से इंसाफ किया है।
निर्देशन और तकनीकी पहलू
'जन नेता' उर्फ 'जना नायकन' के निर्देशक एच. विनोद हैं, जिन्होंने एक मजबूत भावनात्मक कहानी को राजनीति का चोला पहनाने की ऐसी कोशिश की है, जो फिल्म पर भारी पड़ता है। कहानी जगह-जगह पर भटकती है। फर्स्ट हाफ में कई जगह कहानी आधी ही समझ आती है, हालांकि सेकेंड हाफ की शुरुआत में ये समझ आ जाती है। बॉबी देओल वाला पूरा ट्रैक कमजोर लगता है। कभी-कभी लगता है जैसे निर्देशक जानते थे कि ये विजय की आखिरी फिल्म है तो फैंस में जबरदस्त क्रेज होगा ही, तो उन्होंने लॉजिक के पीछे जाना जरूरी नहीं समझा। स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ लगता है और कमजोर लेखन और एडिटिंग, तकनीक को भी कमजोर कर देते हैं। कुल मिलाकर जो फिल्म शुरुआत में जो फैमिली ड्रामा लगती है, वो क्लाइमैक्स तक आते-आते साइंस-फिक्शन लगने लगती है और कई चीजें इमोशन-लेस हैं। 'जना नायकन' देखकर लगता है कि अगर विजय 'लियो' को अपनी आखिरी फिल्म घोषित करते तो वो ज्यादा बेहतर होता।
म्यूजिक
विजय के अलावा इस फिल्म को बांधे रखने में अगर कुछ मदद करता है तो वो है इसका म्यूजिक। अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत इस फिल्म की सबसे अहम और मजबूत कड़ी है। बैकग्राउंड म्यूजिक कई दृश्यों में जान डाल देता है। खासतौर पर विजय की एंट्री और एक्शन सीन्स में संगीत ही है, जो इसे और ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।
फाइनल वर्डिक्ट
'जन नायकन' विजय की आखिरी फिल्म है, जिसके चलते दर्शकों को इससे खासी उम्मीदें थीं। दर्शकों को उम्मीद थी कि ये विजय की अन्य फिल्मों से कई गुना बेहतर होगी और विजय को यादगार विदाई देगी, लेकिन ये फिल्म अपने मकसद में चूक जाती है। जन नायकन न तो पूरी तरह फैमिली ड्रामा है और न ही पॉलिटिकल ड्रामा बन पाती है। और तो और ये विजय को फेयरवेल देने में भी सफल नहीं हो पाई। फिल्म में विजय के लिए तो तालियां बजाने वाले कई पल आते हैं, लेकिन कमजोर कहानी, निर्देशन और स्क्रीनप्ले निराश करती हैं। कुल मिलाकर 3 घंटे 3 मिनट का सफर थकाऊ लगने लगता है। अगर ये कहें कि विजय इससे ज्यादा मजबूत कहानी और विदाई के हकदार हैं तो गलत नहीं होगा। थलापति विजय की फिल्म को 5 में से 2.5 स्टार दिए गए हैं।
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