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‘लव लॉटरी’ रिव्यू: रिश्तों, शक और कानून की उलझी गुत्थी, अक्षय ओबेरॉय ने संभाला मोर्चा

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Sep 24, 2026 01:47 pm IST,  Updated : Sep 24, 2026 01:47 pm IST

‘लव लॉटरी’ रिश्तों, शक और कानून के बीच उलझी मर्डर मिस्ट्री है। अक्षय ओबेरॉय का संयमित अभिनय फिल्म की बड़ी ताकत है, हालांकि धीमी रफ्तार और कुछ अधूरे सामाजिक सवाल कहानी का असर कम करते हैं।

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लव लॉटरी। Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: लव लॉटरी
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 24/09/2026
  • डायरेक्टर: अरविंद पांडे
  • शैली: सस्पेंस, मर्डर मिस्ट्री, कोर्टरूम ड्रामा

किसी रिश्ते में भरोसा जितना जरूरी होता है, शक उतना ही खतरनाक। खासकर तब, जब पति-पत्नी के बीच पहले से ही कुछ अनकही बातें और मतभेद मौजूद हों। ‘लव लॉटरी’ इसी भरोसे और शक के बीच की महीन रेखा को एक क्राइम स्टोरी के जरिए तलाशने की कोशिश करती है। अरविंद पांडे के निर्देशन में बनी यह फिल्म शुरुआत में एक रिश्ते की कहानी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता जाता है। वैवाहिक तनाव, पुलिस की जांच और अदालत की कार्यवाही कहानी के अलग-अलग पड़ाव बनते हैं। फिल्म का प्रयास है कि दर्शक लगातार अनुमान लगाता रहे कि पर्दे पर सामने आ रही परिस्थितियों को किस नजरिए से देखा जाए। फिल्म की कहानी के बारे में ज्यादा कुछ बताना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसका मजा इसी बात में है कि घटनाएं किस दिशा में जाती हैं, यह पहले से पता न हो। इतना जरूर कहा जा सकता है कि कहानी का केंद्र कार्तिक सक्सेना है, जिसकी जिंदगी उस समय पूरी तरह बदल जाती है, जब उसकी पत्नी भरनी से जुड़ी एक गंभीर घटना सामने आती है।

इसके बाद सवाल सिर्फ इतना नहीं रह जाता कि घटना के पीछे कौन है। रिश्ते का अतीत, पति-पत्नी के बीच के मतभेद और परिस्थितियां कहानी को कई दिशाओं में ले जाती हैं। पुलिस की जांच आगे बढ़ती है तो कार्तिक के आसपास मौजूद चीजें और उसके बयान दोनों ही सवालों के घेरे में आने लगते हैं। यहीं से ‘लव लॉटरी’ अपनी असली मर्डर मिस्ट्री वाली जमीन तैयार करती है। फिल्म दर्शक को किसी एक जवाब पर तुरंत पहुंचने नहीं देती और बीच-बीच में ऐसे संकेत देती है, जो पिछली धारणा को बदलने के लिए काफी होते हैं। विस्तार से पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

कहानी में रिश्ते और कानून दोनों का एंगल

‘लव लॉटरी’ को सिर्फ हत्या की गुत्थी वाली फिल्म मानना इसके विषय को थोड़ा सीमित कर देगा। कहानी में वैवाहिक रिश्ते से जुड़े विवादों और कानूनी प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण जगह दी गई है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि जब निजी रिश्ते का मामला कानूनी विवाद में बदलता है, तो परिस्थितियां कितनी जटिल हो सकती हैं। आरोप लगने के बाद किसी व्यक्ति को सिर्फ जांच एजेंसियों के सवालों का सामना नहीं करना पड़ता, बल्कि उसके आसपास की सामाजिक धारणा भी बदल सकती है। फिल्म पुरुषों के अधिकार और महिला-केंद्रित कानूनों के संभावित गलत इस्तेमाल जैसे मुद्दों को भी कहानी में शामिल करती है। हालांकि, इन मुद्दों को जिस तरह से पेश किया गया है, वह दर्शकों को सहमत करने के बजाय बहस की गुंजाइश छोड़ता है। यही फिल्म की दिलचस्प बात भी है और कुछ जगह इसकी सीमा भी। कहानी का कोर्टरूम हिस्सा इसी वजह से महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां व्यक्तिगत रिश्तों से जुड़े सवाल कानूनी तर्कों के साथ टकराते हैं। हालांकि फिल्म अगर इन पहलुओं को थोड़ा और गहराई से विकसित करती तो इसका प्रभाव ज्यादा मजबूत हो सकता था।

अक्षय ओबेरॉय की परफॉर्मेंस सबसे बड़ा प्लस

फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा अक्षय ओबेरॉय का अभिनय है। कार्तिक के किरदार में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभानी है, जिसके बारे में दर्शक शुरुआत से ही पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाता। अक्षय इस अनिश्चितता को बहुत ज्यादा एक्सप्रेशन या नाटकीयता के सहारे नहीं निभाते। उनके अभिनय में एक तरह का संयम है, जो किरदार को ज्यादा विश्वसनीय बनाता है। कई दृश्यों में उनके चेहरे और बॉडी लैंग्वेज से यह समझना मुश्किल होता है कि वह परिस्थितियों से टूटे हुए हैं या उनके भीतर कुछ और चल रहा है। यही एंबीग्विटी फिल्म को आगे बढ़ाने में मदद करती है। कार्तिक के किरदार के साथ दर्शक जितना जुड़ता है, उतने ही सवाल भी उसके सामने खड़े होते जाते हैं।

हेली दारूवाला ने भरनी के किरदार को जरूरी रहस्य और भावनात्मक परत देने की कोशिश की है। उनका किरदार कहानी में सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी मिस्ट्री को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनता है। कबीर दुहन सिंह पुलिस अधिकारी की भूमिका में प्रभावी हैं। जांच के दौरान उनका सख्त रवैया और सवाल पूछने का तरीका कहानी के क्राइम एंगल को मजबूती देता है। विक्रम शर्मा कोर्टरूम वाले हिस्सों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, जबकि विजयंत कोहली और अग्नि अग्यारी सहित बाकी कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं के मुताबिक काम किया है।

निर्देशन में कोशिश अच्छी, लेकिन रफ्तार हर जगह बराबर नहीं

निर्देशक अरविंद पांडे ने फिल्म को सीधे-सीधे मर्डर मिस्ट्री बनाने के बजाय रिश्तों और कानूनी विवाद के साथ जोड़ने की कोशिश की है। यह तरीका कहानी को एक अलग आधार देता है। फिल्म की अच्छी बात यह है कि निर्देशक शुरुआत में ही सारे पत्ते नहीं खोलते। जांच आगे बढ़ने के साथ कहानी में नए सवाल जुड़ते रहते हैं। कोर्टरूम और पुलिस इन्वेस्टिगेशन वाले हिस्सों के बीच फिल्म का टोन भी बहुत ज्यादा नहीं बदलता, लेकिन कुछ जगह स्क्रीनप्ले को और चुस्त होने की जरूरत महसूस होती है। कुछ दृश्यों में घटनाएं आगे बढ़ने की बजाय एक ही भाव या जानकारी को दोहराती हुई लगती हैं। खासकर फिल्म के बीच के हिस्से में गति थोड़ी धीमी पड़ती है। फिल्म अगर अपने कुछ संवाद और सीन छोटे कर देती तो 2 घंटे 21 मिनट की अवधि ज्यादा सहज महसूस हो सकती थी। इसके बावजूद निर्देशक फिल्म को पूरी तरह भटकने नहीं देते और केंद्रीय रहस्य को लगातार कहानी के केंद्र में बनाए रखते हैं।

तकनीकी पक्ष में क्या खास है?

‘लव लॉटरी’ का तकनीकी पक्ष कहानी के मूड के अनुरूप है। नवीन वी मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी खासकर उत्तराखंड की लोकेशंस को खूबसूरती से इस्तेमाल करती है। पहाड़ी लोकेशन फिल्म को एक अलग दृश्यात्मक माहौल देती हैं और कहानी के तनाव के साथ अच्छी तरह मेल खाती हैं। संगीत की बात करें तो अरविंद पांडे और वरुण मिश्रा का काम कहानी के इमोशनल हिस्सों को सपोर्ट करता है। ‘नजर लग जाएगी’ और ‘बेवफा’ जैसे गाने कहानी से पूरी तरह अलग नहीं लगते, बल्कि उनके इस्तेमाल का उद्देश्य कथा के भावनात्मक हिस्से को आगे बढ़ाना है। प्रकाश झा की एडिटिंग इन्वेस्टिगेशन और कोर्टरूम वाले हिस्सों में फिल्म को गति देने की कोशिश करती है। हालांकि, यही एडिटिंग अगर बीच के कुछ हिस्सों को थोड़ा और टाइट करती तो फिल्म का प्रभाव बेहतर हो सकता था।

क्या काम नहीं करता?

फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसकी गति है। शुरुआत में कहानी जिस तरह सवाल खड़े करती है, उससे उम्मीद बनती है कि आगे की घटनाएं और तेज होंगी। लेकिन बीच में कुछ हिस्से उस ऊर्जा को बनाए नहीं रख पाते। दूसरी समस्या यह है कि फिल्म जिन सामाजिक और कानूनी मुद्दों को उठाना चाहती है, उन्हें कई जगह और ज्यादा गहराई की जरूरत महसूस होती है। पुरुषों के अधिकार, वैवाहिक विवाद और कानून के संभावित दुरुपयोग जैसे विषय अपने आप में काफी व्यापक हैं। फिल्म इन्हें छूती जरूर है, लेकिन हर पहलू को पर्याप्त विस्तार नहीं मिल पाता।

कुछ संवाद भी थोड़े सीधे लगते हैं, जबकि यही बातें अगर कहानी के घटनाक्रम के जरिए सामने आतीं तो उनका असर ज्यादा होता। कोर्टरूम ड्रामा के हिस्सों में भी कुछ जगह और धार लाई जा सकती थी। फिर भी फिल्म का सबसे अहम फायदा यह है कि यह अपने रहस्य को पूरी तरह कमजोर नहीं होने देती। दर्शक के मन में सवाल बना रहता है और यही चीज उसे अंत तक जोड़े रखती है।

अंतिम फैसला

‘लव लॉटरी’ एक ऐसी सस्पेंस फिल्म है जो हत्या की कहानी के साथ रिश्तों, शक और कानूनी लड़ाई को जोड़ने की कोशिश करती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय और अक्षय ओबेरॉय का नियंत्रित अभिनय है। निर्देशक अरविंद पांडे ने कहानी को लगातार रहस्य के दायरे में रखने की अच्छी कोशिश की है। हालांकि फिल्म की रफ्तार कुछ जगह कमजोर पड़ती है और इसके सामाजिक-कानूनी मुद्दों को और गहराई मिलती तो कहानी ज्यादा प्रभावी बन सकती थी। बावजूद इसके फिल्म में इतना सस्पेंस जरूर है कि दर्शक कहानी के अगले मोड़ को जानने के लिए जुड़ा रहता है। अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जिनमें मर्डर मिस्ट्री के साथ रिश्तों की उलझन, पुलिस जांच और कोर्टरूम ड्रामा भी देखने को मिले, तो ‘लव लॉटरी’ आपके लिए एक बार देखने लायक विकल्प हो सकती है। यह परफेक्ट मर्डर मिस्ट्री नहीं है, लेकिन अक्षय ओबेरॉय की परफॉर्मेंस और फिल्म का केंद्रीय रहस्य इसे औसत से ऊपर ले जाने में कामयाब होते हैं।

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