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Mirai Review: तेजा सज्जा की जोरदार वापसी, 'मिराई' में 'हनुमान' वाली मास अपील, गूंज उठा जय त्रिया

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Sep 11, 2025 10:58 pm IST,  Updated : Sep 11, 2025 11:12 pm IST

तेजा सज्जा एक बार फिर 'मिराई' के साथ सिनेमाघरों में वापसी किए हैं और उनकी इस अपकमिंग फिल्म में पूरी तरह से मास अपील है। ये फिल्म एक बार राम नाम के जयकारे लगाने पर दर्शकों को मजबूर कर देगी। फिल्म कैसी है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

mirai
मिराई में तेजा सज्जा। Photo: PRESS KIT
  • फिल्म रिव्यू: मिराई
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 12 सितंबर 2025
  • डायरेक्टर: कार्तिक गट्टामनेनी
  • शैली: माइथोलॉजिकल फैंटेसी

कुछ फिल्में सिर्फ एक कहानी नहीं होतीं, वे एक ऐसा अनुभव होती हैं जो दर्शकों को भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर छू जाती हैं। निर्देशक कार्तिक गट्टामनेनी की 'मिराई' ऐसी ही एक सिनेमाई कृति है, जो पौराणिकता, फैंटेसी और आधुनिक विज्ञान को मिलाकर एक ऐसी दुनिया रचती है जो कल्पनाओं से भी आगे की लगती है। फिल्म सिनेमाघरों में 12 सितंबर को रिलीज हो रही है। रिलीज से पहले ही अगर आप जानना चाहते हैं कि ये कहानी देखने लायक है या नहीं तो ये रिव्यू आपके लिए है। तेजा सज्जा की परफॉर्मेंस से लेकर स्क्रीनप्ले, निर्देशन और वीएफएक्स कैसा है, ये जानने के लिए नीचे तक पढ़ें।

कहानी की गहराई और संरचना

'मिराई' की कथा एक काल्पनिक दुनिया में रची गई है, लेकिन इसकी जड़ें भारत की समृद्ध पौराणिक परंपरा में गहराई से धंसी हुई हैं। कहानी की शुरुआत होती है सम्राट अशोक से, जो एक युद्धशील राजा से शांति की ओर अग्रसर होते हैं और अपनी शक्तियों को नौ महाग्रंथों में विभाजित कर देते हैं। ये ग्रंथ नौ अलग-अलग योद्धाओं को सौंपे जाते हैं, जो उनकी पीढ़ियों से रक्षा करते आ रहे हैं।

दूसरी ओर है महाबीर लामा (मनोज मांचू), एक शक्तिशाली काला जादूगर, जो इन ग्रंथों को हासिल कर अमरत्व और भगवान बनने की चाह रखता है। इस बुराई को रोकने की जिम्मेदारी उठाती है अंबिका (श्रिया सरन), जो अपने बेटे वेदा (तेजा सज्जा) को दुनिया की रक्षा के लिए त्याग देती है।

वेदा की यात्रा एक सामान्य युवक से लेकर नियति द्वारा चुने गए रक्षक तक की है। उसे नौवां महाग्रंथ सौंपा जाता है, जिसकी रक्षा के लिए उसे महाबीर लामा जैसे ताकतवर दुश्मन से भिड़ना होता है। कहानी का यह संघर्ष, पौराणिकता और फैंटेसी के ताने-बाने में बुना गया है, जिसमें 'मिराई' नामक एक दिव्य अस्त्र का भी समावेश है, जो भगवान राम के काल में गढ़ा गया था।

किरदारों का प्रभावशाली चित्रण

तेजा सज्जा एक बार फिर अपने शानदार अभिनय से दिल जीतते हैं। 'हनुमान' के बाद 'मिराई' में उनका किरदार और भी ज्यादा परिपक्व और प्रभावशाली नजर आता है। वेदा के रूप में उनका किरदार साहस, मासूमियत और दृढ़ता का प्रतीक है। मनोज मांचू का महाबीर लामा के रूप में अभिनय सराहनीय है। उनका लुक, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस डर और रहस्य को बड़ी खूबी से प्रस्तुत करता है।

श्रिया सरन अंबिका के रूप में बेहद प्रभावी रही हैं। उनका किरदार भले ही स्क्रीन पर ज्यादा देर तक न रहा हो, लेकिन उनकी भावनात्मक मजबूती और आत्मबल दर्शकों को छू जाता है। उनका त्याग, खासकर एक माँ के रूप में, फिल्म का सबसे इमोशनल मोमेंट बन जाता है।

जगपति बाबू, रितिका नायक और जयराम सुब्रमण्यम जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों को अच्छे से निभाया है। रितिका नायक की उपस्थिति फ्रेशनेस लाती है, जबकि राणा का रहस्यमयी किरदार फिल्म को रोमांच से भर देता है। राणा दग्गुबाती का कैमियो एक नई उम्मीद के साथ छोड़ता है।

तकनीकी पक्ष, निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी

'मिराई' का सबसे बड़ा यूएसपी है इसका भव्य दृश्य प्रभाव (VFX) और शानदार सिनेमैटोग्राफी। रामजी डॉट और मुथु सुब्बैया के VFX ने एक फैंटेसी वर्ल्ड को इतने वास्तविक ढंग से दर्शाया है कि हर फ्रेम किसी पेंटिंग की तरह लगता है। चाहे वो चलती ट्रेन का सीक्वेंस हो या देवताओं जैसा युद्ध, हर सीन दमदार है।

कार्तिक गट्टामनेनी की सिनेमैटोग्राफी पौराणिक भव्यता और विज्ञान की आधुनिकता को संतुलित करती है। कुछ फ्रेम इतने प्रभावशाली हैं कि उन्हें देखकर दर्शक स्तब्ध रह जाता है। फिल्म के एक्शन सीन्स को कोरियोग्राफ किया है केचा खम्पाक्डी और टीम ने। एक्शन सीन्स ज़रूरत से ज्यादा नहीं हैं, लेकिन जब आते हैं, तो दर्शक सीट से चिपक जाता है।

संवाद बेहद शक्तिशाली और प्रेरणादायक हैं। विशेष रूप से वे संवाद जो भगवान राम की विरासत, धर्म की रक्षा और बलिदान पर केंद्रित हैं, वे दिल को छू जाते हैं। गौरा हरि का बैकग्राउंड स्कोर युद्ध और भावनाओं के दृश्यों में जान फूंकता है। वहीं, श्रीकर प्रसाद का संपादन फिल्म को गति देता है और कहानी कहीं भी धीमी नहीं पड़ती।

फर्स्ट हाफ बनाम सैकेंड हाफ

हालांकि फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ी अस्थिरता का शिकार है, कुछ घटनाएं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ती हैं, जिसमें आंखें गड़ाकर देखना मजबूरी बन जाता है, जहां लगता है कि काफी कम वक्त में ज्यादा बातें कहने की कोशिश की जा रही है। ज्यादा कुछ स्थापित करने के चलते पहला हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ है, जिसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था। लेकिन जैसे ही इंटरवल होता है, फिल्म एकदम नई ऊंचाई पर पहुंच जाती है। सैकेंड हाफ में दर्शकों को वे सब भावनाएं मिलती हैं जिनकी वे अपेक्षा रखते हैं, रोमांच, प्रेरणा और अध्यात्म।

तेजा सज्जा का युद्ध के लिए खड़े होना, बार-बार गिरकर उठना और भगवान राम के नाम से ऊर्जा लेना, दर्शकों में एक अलग ही जोश भर देता है। फिल्म जैसे-जैसे अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है, ये एक धार्मिक उत्सव जैसा रूप ले लेती है।

भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रभाव

'मिराई' सिर्फ एक मनोरंजन नहीं है, ये एक सांस्कृतिक अनुभव है। फिल्म में 'राम' तत्व बहुत गहराई से जुड़ा है। दर्शकों को यह फिल्म प्रभु श्रीराम की भक्ति, उनके सिद्धांतों और धर्म के प्रति आदर की भावना से जोड़ देती है। फिल्म का अंत होते-होते, थिएटर में 'जय श्री राम' के नारे गूंज सकते हैं, यह फिल्म की भावना को दर्शाता है।

निष्कर्ष: क्या देखें या छोड़ें?

अगर आप पौराणिकता, विज्ञान, एक्शन और आध्यात्म की सिनेमाई अभिव्यक्ति देखना चाहते हैं, तो 'मिराई' एक परफेक्ट फिल्म है। इसमें एक सशक्त कहानी है, दमदार अभिनय है, भव्य दृश्य हैं और गहरी भावनाएं हैं। हालांकि फिल्म में कुछ छोटी कमियां हैं, लेकिन इसकी भव्यता और कथानक इन कमियों को छिपा देता है।

यह फिल्म उन दर्शकों को जरूर देखनी चाहिए जो 'हनुमान', 'ब्रह्मास्त्र' और ‘कल्कि’ जैसी फिल्मों को पसंद करते हैं। यह फिल्म बच्चों, युवाओं, और वरिष्ठ दर्शकों सभी के लिए समान रूप से आकर्षक है। इस फिल्म के साथ जय श्रीराम ही नहीं बल्कि जय त्रिया भी गूंजने वाला है।

कुछ फिल्में सिर्फ एक कहानी नहीं होतीं, वे एक ऐसा अनुभव होती हैं जो दर्शकों को भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर छू जाती हैं। निर्देशक कार्तिक गट्टामनेनी की "मिराई" ऐसी ही एक सिनेमाई कृति है, जो पौराणिकता, फैंटेसी और आधुनिक विज्ञान को मिलाकर एक ऐसी दुनिया रचती है जो कल्पनाओं से भी आगे की लगती है।

कहानी की गहराई और संरचना

"मिराई" की कथा एक काल्पनिक दुनिया में रची गई है, लेकिन इसकी जड़ें भारत की समृद्ध पौराणिक परंपरा में गहराई से धंसी हुई हैं। कहानी की शुरुआत होती है सम्राट अशोक से, जो एक युद्धशील राजा से शांति की ओर अग्रसर होते हैं और अपनी शक्तियों को नौ महाग्रंथों में विभाजित कर देते हैं। ये ग्रंथ नौ अलग-अलग योद्धाओं को सौंपे जाते हैं, जो उनकी पीढ़ियों से रक्षा करते आ रहे हैं।

दूसरी ओर है महाबीर लामा (मनोज मांचू), एक शक्तिशाली काला जादूगर, जो इन ग्रंथों को हासिल कर अमरत्व और भगवान बनने की चाह रखता है। इस बुराई को रोकने की जिम्मेदारी उठाती है अंबिका (श्रिया सरन), जो अपने बेटे वेदा (तेजा सज्जा) को दुनिया की रक्षा के लिए त्याग देती है।

वेदा की यात्रा एक सामान्य युवक से लेकर नियति द्वारा चुने गए रक्षक तक की है। उसे नौवां महाग्रंथ सौंपा जाता है, जिसकी रक्षा के लिए उसे महाबीर लामा जैसे ताकतवर दुश्मन से भिड़ना होता है। कहानी का यह संघर्ष, पौराणिकता और फैंटेसी के ताने-बाने में बुना गया है, जिसमें "मिराई" नामक एक दिव्य अस्त्र का भी समावेश है, जो भगवान राम के काल में गढ़ा गया था।

किरदारों का प्रभावशाली चित्रण

तेजा सज्जा एक बार फिर अपने शानदार अभिनय से दिल जीतते हैं। 'हनुमान' के बाद 'मिराई' में उनका किरदार और भी ज्यादा परिपक्व और प्रभावशाली नजर आता है। वेदा के रूप में उनका किरदार साहस, मासूमियत और दृढ़ता का प्रतीक है। मनोज मांचू का महाबीर लामा के रूप में अभिनय सराहनीय है। उनका लुक, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस डर और रहस्य को बड़ी खूबी से प्रस्तुत करता है।

श्रिया सरन अंबिका के रूप में बेहद प्रभावी रही हैं। उनका किरदार भले ही स्क्रीन पर ज्यादा देर तक न रहा हो, लेकिन उनकी भावनात्मक मजबूती और आत्मबल दर्शकों को छू जाता है। उनका त्याग, खासकर एक माँ के रूप में, फिल्म का सबसे इमोशनल मोमेंट बन जाता है।

जगपति बाबू, रितिका नायक और जयराम सुब्रमण्यम जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों को अच्छे से निभाया है। रितिका नायक की उपस्थिति फ्रेशनेस लाती है, जबकि राणा का रहस्यमयी किरदार फिल्म को रोमांच से भर देता है। राणा दग्गुबाती का कैमियो एक नई उम्मीद के साथ छोड़ता है।

तकनीकी पक्ष, निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी

'मिराई' का सबसे बड़ा यूएसपी है इसका भव्य दृश्य प्रभाव (VFX) और शानदार सिनेमैटोग्राफी। रामजी डॉट और मुथु सुब्बैया के VFX ने एक फैंटेसी वर्ल्ड को इतने वास्तविक ढंग से दर्शाया है कि हर फ्रेम किसी पेंटिंग की तरह लगता है। चाहे वो चलती ट्रेन का सीक्वेंस हो या देवताओं जैसा युद्ध, हर सीन दमदार है।

कार्तिक गट्टामनेनी की सिनेमैटोग्राफी पौराणिक भव्यता और विज्ञान की आधुनिकता को संतुलित करती है। कुछ फ्रेम इतने प्रभावशाली हैं कि उन्हें देखकर दर्शक स्तब्ध रह जाता है। फिल्म के एक्शन सीन्स को कोरियोग्राफ किया है केचा खम्पाक्डी और टीम ने। एक्शन सीन्स ज़रूरत से ज्यादा नहीं हैं, लेकिन जब आते हैं, तो दर्शक सीट से चिपक जाता है।

संवाद बेहद शक्तिशाली और प्रेरणादायक हैं। विशेष रूप से वे संवाद जो भगवान राम की विरासत, धर्म की रक्षा और बलिदान पर केंद्रित हैं, वे दिल को छू जाते हैं। गौरा हरि का बैकग्राउंड स्कोर युद्ध और भावनाओं के दृश्यों में जान फूंकता है। वहीं, श्रीकर प्रसाद का संपादन फिल्म को गति देता है और कहानी कहीं भी धीमी नहीं पड़ती।

फर्स्ट हाफ बनाम सैकेंड हाफ

हालांकि फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ी अस्थिरता का शिकार है, कुछ घटनाएं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ती हैं, जिसमें आंखें गड़ाकर देखना मजबूरी बन जाता है, जहां लगता है कि काफी कम वक्त में ज्यादा बातें कहने की कोशिश की जा रही है। ज्यादा कुछ स्थापित करने के चलते पहला हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ है, जिसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था। लेकिन जैसे ही इंटरवल होता है, फिल्म एकदम नई ऊंचाई पर पहुंच जाती है। सैकेंड हाफ में दर्शकों को वे सब भावनाएं मिलती हैं जिनकी वे अपेक्षा रखते हैं, रोमांच, प्रेरणा और अध्यात्म।

तेजा सज्जा का युद्ध के लिए खड़े होना, बार-बार गिरकर उठना, और भगवान राम के नाम से ऊर्जा लेना, दर्शकों में एक अलग ही जोश भर देता है। फिल्म जैसे-जैसे अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है, ये एक धार्मिक उत्सव जैसा रूप ले लेती है।

भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रभाव

'मिराई' सिर्फ एक मनोरंजन नहीं है, ये एक सांस्कृतिक अनुभव है। फिल्म में 'राम' तत्व बहुत गहराई से जुड़ा है। दर्शकों को यह फिल्म प्रभु श्रीराम की भक्ति, उनके सिद्धांतों और धर्म के प्रति आदर की भावना से जोड़ देती है। फिल्म का अंत होते-होते, थिएटर में 'जय श्री राम' के नारे गूंज सकते हैं, यह फिल्म की गूंज और भावना दोनों को दर्शाता है।

क्या देखें या छोड़ें?

अगर आप पौराणिकता, विज्ञान, एक्शन और आध्यात्म की सिनेमाई अभिव्यक्ति देखना चाहते हैं, तो "मिराई" एक परफेक्ट फिल्म है। इसमें एक सशक्त कहानी है, दमदार अभिनय है, भव्य दृश्य हैं और गहरी भावनाएं हैं। हालांकि फिल्म में कुछ छोटी कमियां हैं, लेकिन इसकी भव्यता और कथानक इन कमियों को छिपा देता है।

यह फिल्म उन दर्शकों को जरूर देखनी चाहिए जो 'हनुमान', 'ब्रह्मास्त्र' और ‘कल्कि’ जैसी फिल्मों को पसंद करते हैं। यह फिल्म बच्चों, युवाओं, और वरिष्ठ दर्शकों सभी के लिए समान रूप से आकर्षक है। इस फिल्म के साथ जय श्रीराम ही नहीं बल्कि जय त्रिया भी गूंजने वाला है।

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