बालाजी मोहन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नई नवेली’ में एक ऐसे परिवार की कहानी दिखाई गई है, जहां हर बात पर बहस होती है। घर में नई दुल्हन आती है और उसका देवर उस पर शक करने लगता है। कहानी में हॉरर और कॉमेडी का मेल करने की कोशिश की गई है। फिल्म की शुरुआत मनोरंजक अंदाज में होती है। पारिवारिक नोकझोंक, अजीब परिस्थितियां और गलतफहमियां कहानी को आगे बढ़ाती हैं। शुरुआती हिस्से में फिल्म अपनी कॉमेडी के दम पर दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब रहती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आगे भी अपना आकर्षण बरकरार रख पाती है?
क्या है कहानी?
यामी गौतम धर ने फिल्म में मोहिनी का किरदार निभाया है, जो शादी के बाद मेरठ स्थित अपने नए घर में आती है। उसका देवर बंटू (अनुराग ठाकुर) मानता है कि मोहिनी जैसी दिखती है, असल में वैसी नहीं है। उसे अपनी भाभी पर शक होता है और इसी शक के चलते घर में कई मजेदार परिस्थितियां पैदा होती हैं। परिवार के सदस्यों की प्रतिक्रियाएं और उनके बीच होने वाली नोकझोंक फिल्म के शुरुआती हिस्से को दिलचस्प बनाती हैं। इन दृश्यों में कहानी सहज लगती है और कॉमेडी भी बेहतर तरीके से काम करती है।
बंटू के किरदार में अनुराग ठाकुर खास तौर पर प्रभावित करते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है और वह साधारण संवादों को भी मजेदार बना देते हैं। कई जगहों पर जब चुटकुले उतना असर नहीं छोड़ते, तब भी अनुराग अपने अभिनय से दृश्यों को संभाल लेते हैं। उनके किरदार को और बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता था, लेकिन सीमित भूमिका के बावजूद वह अपनी छाप छोड़ते हैं। हालांकि कहानी में जब राम और रावण की पौराणिक कथा से जुड़े काल शील नाम के पत्थर की एंट्री होती है, तब फिल्म का अंदाज बदलने लगता है। कहानी धीरे-धीरे अलौकिक घटनाओं और पौराणिक संघर्ष की तरफ बढ़ जाती है। इस बदलाव के साथ परिवार का वह ड्रामा पीछे छूटने लगता है, जो शुरुआत में फिल्म की सबसे बड़ी ताकत था। दुर्भाग्य से, पौराणिक कहानी उतनी दिलचस्प नहीं बन पाती और फिल्म का मनोरंजन वाला पक्ष कमजोर पड़ने लगता है।
लेखन और निर्देशन
पौराणिक कथाओं और कॉमेडी को एक साथ पेश करना अपने आप में गलत विचार नहीं है, लेकिन ‘नई नवेली’ में ये दोनों पहलू एक-दूसरे के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। जब परिवार के सदस्यों के बीच की नोकझोंक अपनी लय पकड़ने लगती है, तभी कहानी किसी दूसरे ट्रैक पर चली जाती है। पारिवारिक हिस्से सहज और परिचित लगते हैं, जबकि पौराणिक घटनाएं किसी दूसरी फिल्म का हिस्सा महसूस होती हैं। कहानी को गहराई देने के बजाय ये हिस्से उसकी रफ्तार को बाधित करते हैं। फिल्म में कई घटनाएं ऐसी भी हैं, जिनका आपसी संबंध स्पष्ट नहीं हो पाता। राजा सड़क के दूसरी तरफ क्यों है, किरदारों की उम्र क्या है, दशहरे से पहले दिवाली कैसे आ जाती है और हनुमान से जुड़ा प्रसंग कहानी में किस तरह फिट बैठता है, ऐसे सवाल कथा को कई जगहों पर अतार्किक बना देते हैं।
पौराणिक कहानियों को दिखाने के लिए एआई से तैयार किए गए विजुअल्स का इस्तेमाल भी निराश करता है। काजोल की ‘मां’ हो या यामी गौतम की ‘नई नवेली’, इस तरह की फिल्मों में प्राचीन कथाओं को दिखाने के लिए एआई विजुअल्स पर निर्भरता रचनात्मकता की कमी जैसी लगती है। ऐसा महसूस होता है कि वास्तविक फिल्म निर्माण की जगह केवल प्रॉम्प्ट देकर दृश्य तैयार कर लिए गए हैं। बालाजी मोहन का निर्देशन यहां निराश करता है। वह पौराणिक तत्वों को कहानी से मजबूती से जोड़ने में भी सफल नहीं हो पाते।
अभिनय
यामी गौतम धर फिल्म की केंद्रीय भूमिका में हैं, लेकिन उनके पास निभाने के लिए बहुत कुछ नहीं है। मोहिनी कहानी का सबसे अहम किरदार है, फिर भी उसका व्यक्तित्व पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाता। अलग-अलग परिस्थितियों में यामी के चेहरे के भाव भी कई जगह एक जैसे नजर आते हैं, जबकि उन दृश्यों में अलग-अलग प्रतिक्रियाओं की जरूरत थी। हालांकि इसकी पूरी जिम्मेदारी अभिनेत्री पर नहीं डाली जा सकती। पटकथा उनके किरदार को विकसित होने का पर्याप्त मौका ही नहीं देती। फिर भी, जब कहानी का बड़ा हिस्सा मोहिनी के इर्द-गिर्द घूमता है, तब उसके किरदार को अधिक प्रभावशाली और दिलचस्प बनाया जाना चाहिए था।
राजा की भूमिका निभाने वाले आदिनाथ एम. कोठारे के साथ भी पटकथा न्याय नहीं करती। भावनात्मक दृश्यों में वह अपनी अभिनय क्षमता दिखाते हैं, लेकिन कहानी उन्हें खुलकर प्रदर्शन करने का मौका नहीं देती। सुनीता राजवर और मीता वशिष्ठ परिवार के माहौल को मजबूत बनाती हैं, मगर बाकी सहायक कलाकारों को भी यादगार भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं मिलती। घर में कई किरदार होने के बावजूद उनके आपसी रिश्तों को गलतफहमियां पैदा करने से आगे विकसित नहीं किया गया है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी स्तर पर भी फिल्म कुछ खास कमाल नहीं दिखाती। कई विजुअल इफेक्ट्स कृत्रिम लगते हैं। अलौकिक दुनिया पर आधारित कहानी में ऐसे दृश्य दर्शकों को उसके माहौल में डुबोने के बजाय फिल्म के बनाए हुए दृश्य होने का एहसास कराते हैं। इससे कहानी का प्रभाव कमजोर पड़ता है।
फिल्म के गाने भी खास छाप नहीं छोड़ते। वे न तो माहौल को बेहतर बनाते हैं और न ही ऐसा कोई संगीत का पल देते हैं, जिसे फिल्म खत्म होने के बाद याद रखा जा सके। करीब 2 घंटे 18 मिनट लंबी इस फिल्म को छोटा किया जा सकता था। समस्या केवल इसकी अवधि नहीं है, बल्कि उन दृश्यों को दिया गया अतिरिक्त समय भी है, जो कहानी को आगे बढ़ाने में ज्यादा मदद नहीं करते। पारिवारिक कॉमेडी में एक बेहतर और कसी हुई फिल्म बनने की क्षमता थी, लेकिन कमजोर पटकथा बार-बार उसकी राह में बाधा बनती है।
फैसला
‘नई नवेली’ की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें मनोरंजन की संभावनाएं होने के बावजूद फिल्म उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती। पारिवारिक दृश्य अच्छे हैं और अनुराग ठाकुर फिल्म में ऊर्जा भरते हैं, लेकिन कॉमेडी और अलौकिक कहानी के बीच तालमेल नहीं बन पाता। पौराणिक घटनाओं पर ध्यान बढ़ने के साथ किरदारों और उनके रिश्तों की अहमियत कम होती जाती है।फिल्म के कुछ हिस्से देखे जा सकते हैं, खासकर वे दृश्य जिनमें बंटू मौजूद है। मगर ऐसे पल इतने कम हैं कि वे कमजोर कहानी की भरपाई नहीं कर पाते। अगर फिल्म अपनी मूल कहानी और पारिवारिक कॉमेडी पर अधिक भरोसा करती, तो यह एक मजेदार हॉरर कॉमेडी बन सकती थी। जनता से भी फिल्म को मिली जुली प्रतिक्रिया मिल रही है।