पिता और बेटे का रिश्ता जितना करीब होता है, उतना ही उलझा हुआ भी हो सकता है। प्यार के साथ उम्मीदें, उम्मीदों के साथ शिकायतें और शिकायतों के पीछे छिपा अपनापन कई परिवारों में देखने को मिलता है। हिंदी सिनेमा ने इस रिश्ते को अलग-अलग रंगों में कई बार पर्दे पर उतारा है। ‘ओम का हरि’ भी इसी परिचित भावनात्मक दुनिया में प्रवेश करती है, लेकिन इसकी कहानी को वाराणसी की गलियों और एक खास समय-सीमा के साथ आगे बढ़ाया गया है। फिल्म में कुछ ऐसे पल हैं जो रिश्तों की सच्चाई को छूते हैं, खासकर जब बात माता-पिता की अपेक्षाओं और बच्चों की अपनी जिंदगी जीने की इच्छा की आती है। हालांकि, अच्छे इरादों के बावजूद फिल्म हर जगह उतनी गहराई नहीं ला पाती, जितनी इसकी कहानी में संभावनाएं थीं। पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
कहानी और प्लॉट
‘ओम का हरि’ की कहानी हरि प्रसाद शर्मा और उनके बेटे ओम के इर्द-गिर्द घूमती है। हरि उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा परिवार और अपनी सोच के मुताबिक बच्चों का भविष्य तय करने में लगा दिया है। वह सेवानिवृत्त ज्योतिषी हैं और चीजों को अपनी समझ और अनुभव के हिसाब से देखने के आदी हैं। एक दिन उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आता है, जिसके बाद उन्हें लगता है कि उनके पास ज्यादा समय नहीं बचा है। उन्हें विश्वास हो जाता है कि जिंदगी के आखिरी कुछ दिन उन्हें वाराणसी में बिताने चाहिए। वह अपने बेटे ओम को भी इस यात्रा में साथ ले जाना चाहते हैं। ओम और हरि के बीच रिश्ता सामान्य पिता-पुत्र जैसा नहीं है। दोनों के बीच वर्षों की नाराजगी और अनकही शिकायतें जमा हैं। हरि को लगता है कि उनका बेटा अपनी जिंदगी में वह हासिल नहीं कर पाया, जो उसे करना चाहिए था। वहीं ओम को महसूस होता है कि उसके पिता ने कभी उसकी पसंद और उसकी जिंदगी को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
ओम ने अपनी राह चुनी है, लेकिन हरि के लिए वह राह उतनी सम्मानजनक नहीं है जितनी वह अपने बेटे के लिए चाहते थे। नौकरी, करियर और समाज की नजरों में सफलता को लेकर दोनों की सोच बिल्कुल अलग है। इसी अंतर ने उनके बीच दूरी पैदा कर दी है। इसके बावजूद जब हरि वाराणसी जाने की बात करते हैं, ओम उन्हें अकेला नहीं छोड़ता। यहीं से फिल्म का असली सफर शुरू होता है। यह सफर केवल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने का नहीं है। दोनों के बीच जो बातें सालों से नहीं हुईं, वे धीरे-धीरे सामने आने लगती हैं। पुरानी नाराजगी, पिता की सख्ती, बेटे की चोट और परिवार के भीतर दबे हुए कई भाव इस यात्रा के दौरान खुलने लगते हैं। फिल्म इन भावनाओं को किसी बहुत बड़े मोड़ या नाटकीय घटनाक्रम के बजाय बातचीत, खामोशी और छोटे-छोटे पलों के जरिए दिखाने की कोशिश करती है। यही इसका सबसे मानवीय हिस्सा है।
रिश्ते की कहानी में कितनी गहराई?
फिल्म की कहानी का सबसे अच्छा पहलू यह है कि यह पिता को पूरी तरह गलत और बेटे को पूरी तरह सही साबित करने की कोशिश नहीं करती। हरि का रवैया कई बार परेशान करता है, लेकिन उनकी नीयत हमेशा खराब नहीं होती। वह अपने तरीके से बेटे के लिए अच्छा चाहते हैं, बस प्यार जताने का उनका तरीका कठोर है। वहीं ओम भी कोई आदर्श बेटा नहीं है। वह पिता की बातों से आहत है, उनसे नाराज है और अपनी जिंदगी के फैसलों को लेकर लगातार खुद को साबित करना चाहता है। लेकिन इसके बावजूद पिता के प्रति उसका लगाव खत्म नहीं हुआ है। फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि क्या हर पिता अपने बच्चे के लिए सही फैसला लेने की कोशिश करते-करते उसकी पसंद को दबा देता है? और क्या हर बेटा पिता की सख्ती के पीछे छिपे प्यार को समझ पाता है? इन सवालों के जवाब फिल्म सीधे भाषणों में नहीं देती, बल्कि घटनाओं और रिश्ते के उतार-चढ़ाव के जरिए तलाशती है।
पहला हाफ थोड़ा धीमा
फिल्म का पहला हिस्सा अपने किरदारों की दुनिया स्थापित करने में काफी समय लेता है। हरि और ओम के बीच तनाव समझ में आता है, लेकिन पटकथा कई जगह उसी तरह की रोजमर्रा की बहसों और मतभेदों को दोहराती हुई महसूस होती है। दर्शक समझ जाता है कि पिता और बेटे के बीच समस्या क्या है, लेकिन फिल्म उस मूल चोट तक जल्दी नहीं पहुंचती जिसने दोनों को भावनात्मक रूप से इतना दूर किया है। इसके बावजूद पहले हाफ में परिवार और पिता की सोच से जुड़े कुछ दृश्य प्रभाव छोड़ते हैं। खासकर हरि का अपने बेटे के करियर और भविष्य को लेकर नजरिया भारतीय परिवारों में मौजूद एक परिचित मानसिकता की याद दिलाता है। दूसरे हाफ में फिल्म ज्यादा सहज हो जाती है। वाराणसी की यात्रा शुरू होने के बाद कहानी अपने मूल भाव पर लौटती है और पिता-पुत्र के रिश्ते को ज्यादा जगह मिलती है।
निर्देशन में ईमानदारी, लेकिन कसावट की कमी
हरीश व्यास ने फिल्म को बहुत ज्यादा चमकदार बनाने के बजाय रिश्तों और किरदारों के करीब रखने की कोशिश की है। उनका निर्देशन कई जगह शांत और सहज है। फिल्म अपने भावनात्मक पलों को जरूरत से ज्यादा भव्य बनाने की कोशिश नहीं करती। वाराणसी का इस्तेमाल भी सिर्फ खूबसूरत लोकेशन के तौर पर नहीं, बल्कि कहानी के भावनात्मक माहौल के हिस्से के रूप में किया गया है। यात्रा के साथ दोनों किरदारों के बीच बदलता समीकरण फिल्म को आगे बढ़ाता है, लेकिन निर्देशन के स्तर पर सबसे बड़ी कमी फिल्म की गति है। कई दृश्य थोड़े छोटे किए जा सकते थे। कुछ बातचीत ऐसी हैं जिनका उद्देश्य पहले ही स्पष्ट हो जाता है, फिर भी कहानी उन्हें आगे खींचती रहती है। फिल्म में कुछ साइड ट्रैक भी हैं, जो मुख्य कहानी को विस्तार देने की कोशिश करते हैं, लेकिन पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। इस वजह से पटकथा का फोकस कभी-कभी टूटता है। निर्देशक के पास एक मजबूत भावनात्मक कहानी थी, लेकिन उसे और कसावट के साथ पेश किया जाता तो असर ज्यादा गहरा हो सकता था।
रघुवीर यादव फिल्म की जान
हरि प्रसाद शर्मा के किरदार में रघुवीर यादव फिल्म को अपने कंधों पर संभालते हैं। उनका अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। हरि को उन्होंने सिर्फ एक गुस्सैल और पुराने विचारों वाले पिता के रूप में नहीं निभाया। उनके किरदार में अहंकार भी है, चिंता भी, जिद भी और कहीं गहराई में छिपा हुआ डर भी। यही वजह है कि दर्शक उनसे नाराज होने के बावजूद उन्हें पूरी तरह खारिज नहीं कर पाता। यादव की सबसे अच्छी बात यह है कि वह बड़े संवादों के बजाय छोटे हावभाव से भावनाएं व्यक्त करते हैं। कई बार उनकी चुप्पी ही बताती है कि किरदार के भीतर क्या चल रहा है। हास्य और भावनाओं के बीच उनका संतुलन भी अच्छा है। उनके अनुभव का फायदा साफ दिखाई देता है।
अंशुमान झा ने दिया ईमानदार साथ
ओम के किरदार में अंशुमान झा का प्रदर्शन भी अच्छा है, हालांकि कुछ भावनात्मक दृश्यों में वह रघुवीर यादव के सामने थोड़ा कमजोर नजर आते हैं। उनका किरदार भीतर से टूटा हुआ है, लेकिन वह हर समय अपनी नाराजगी जाहिर नहीं करता। झा ने इस दबे हुए गुस्से और पिता के प्रति बचे हुए लगाव को कई शांत दृश्यों में अच्छी तरह पकड़ा है। सबसे अच्छी बात यह है कि ओम अचानक से पिता की हर बात मानने वाला बेटा नहीं बन जाता। रिश्ते में बदलाव धीरे-धीरे आता है और झा उस बदलाव को विश्वसनीय बनाए रखते हैं।
सोनी राजदान और बाकी कलाकार
सोनी राजदान फिल्म में परिवार के एक ऐसे हिस्से को सामने लाती हैं, जो अक्सर पिता-पुत्र के संघर्ष में पीछे छूट जाता है। उनके किरदार के जरिए यह दिखाने की कोशिश होती है कि घर में मौजूद दूसरे सदस्य किस तरह लंबे समय तक इन तनावों को संभालते रहते हैं। कुछ जगह उनके संवाद और भावनात्मक प्रस्तुति पूरी तरह सहज नहीं लगती, लेकिन कुल मिलाकर उनका काम ठीक है। समता सुदीक्षा और शिवानी टैंकसाले अपनी भूमिकाओं में सहज हैं। आयशा कपूर से उम्मीदें ज्यादा थीं, लेकिन उनके हिस्से में ऐसा किरदार नहीं आया जो लंबे समय तक याद रहे। जगत रावत की मौजूदगी कहानी को एक अलग दृष्टिकोण देती है। उनका किरदार पिता होने और बच्चों के लिए फैसले लेने की अलग सोच सामने लाता है। हालांकि यह ट्रैक मुख्य कहानी जितना प्रभावी नहीं बन पाता।
क्या नहीं किया काम?
‘ओम का हरि’ की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसकी कहानी का मूल भाव काफी परिचित है। पिता की अपेक्षाएं और बेटे की अपनी जिंदगी जीने की चाहत हिंदी फिल्मों में पहले भी दिखाई जा चुकी है। ऐसे में फिल्म को अलग पहचान देने के लिए पटकथा में ज्यादा गहराई और मौलिकता की जरूरत थी। पहला हाफ धीमा है और कई जगह कहानी अपने ही भाव को दोहराती है। कुछ साइड स्टोरीज भी मुख्य कहानी के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पातीं। फिल्म का संगीत भी ऐसा नहीं है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद लंबे समय तक याद रहे। गाने कहानी के भावनात्मक असर को बहुत ज्यादा बढ़ाने में कामयाब नहीं होते। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और वाराणसी की लोकेशन फिल्म को एक खूबसूरत पृष्ठभूमि देती है। संपादन सामान्य है, लेकिन कुछ हिस्सों में ज्यादा कसावट की जरूरत महसूस होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिल्म में भावनाएं मौजूद हैं, लेकिन हर भावनात्मक पल उतना असरदार नहीं बन पाता। जहां फिल्म सहज रहती है, वहां ज्यादा अच्छी लगती है, जब यह अपने संदेश को ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझाने की कोशिश करती है, तो थोड़ी बनावटी महसूस होती है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘ओम का हरि’ एक ऐसे पिता और बेटे की कहानी है, जो एक-दूसरे से नाराज जरूर हैं, लेकिन एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हो पाए हैं। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह रिश्ते को काले-सफेद रंग में नहीं दिखाती। रघुवीर यादव का शानदार अभिनय, अंशुमान झा की ईमानदार मौजूदगी और वाराणसी की पृष्ठभूमि फिल्म को देखने लायक बनाती है। दूसरे हाफ में कहानी भी भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत होती है और कुछ दृश्य दिल को छूते हैं, लेकिन धीमा पहला हाफ, कुछ अधूरे साइड ट्रैक, सीमित संगीत और परिचित कहानी इसे एक यादगार पारिवारिक ड्रामा बनने से रोकते हैं। फिल्म जिस भावनात्मक गहराई तक पहुंच सकती थी, वहां तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती। कुल मिलाकर ‘ओम का हरि’ में दिल है, अच्छे कलाकार हैं और रिश्ते की एक सच्ची भावना भी है, लेकिन इसे और ज्यादा कसावट और गहराई की जरूरत थी। रघुवीर यादव के अभिनय के लिए फिल्म देखी जा सकती है, मगर यह ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखने के बाद लंबे समय तक याद रखा जाए।