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Raakh Review: अली फजल ने उठाया एंटरटेनमेंट का बीड़ा, रंगा-बिल्ला केस की कहानी कर देगी बेचैन, दर्दनाक सच का आईना है 'राख'

 Written By: अनिंदिता मुखोपाध्याय
 Published : Jun 11, 2026 10:15 pm IST,  Updated : Jun 12, 2026 06:20 am IST

'राख' एक दमदार इंडियन इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर सीरीज है जो अब प्राइम वीडियो पर देख सकते हैं। इसकी कहानी 1978 के असल जिंदगी के रंगा-बिल्ला केस पर है। इसमें अली फजल, सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर हैं।

Ali Fazal, Rakesh Bedi
अली फजल और राकेश बेदी Photo: INSTAGRAM/@ALIFAZAL9
  • फिल्म रिव्यू: राख वेब सीरीज रिव्यू
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: जून 12, 2026
  • डायरेक्टर: प्रोसित रॉय
  • शैली: इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर

क्राइम थ्रिलर का क्रेज कभी कम नहीं होता। अच्छी तरह से दिखाई गई इन्वेस्टिगेशन में कुछ तो ऐसा होता है जो दर्शकों को बांधे रखता है, भले ही उन्हें पता हो कि कहानी का अंत कैसे होगा। जब कोई शो भारत के सबसे भयानक असली क्राइम केस पर आधारित होता है तो उम्मीदें स्वाभाविक रूप से और भी बढ़ जाती हैं।

'राख' 1978 के खूंखार रंगा और बिल्ला किडनैपिंग और मर्डर केस पर बनी है। यह उस दुखद घटना को फिर से दिखाती है, जिसने दशकों पहले देश को हिलाकर रख दिया था। ऐसी घटना को फिर से दिखाना आसान नहीं है जो आज भी लोगों की भावनाओं से जुड़ी हो, लेकिन डायरेक्टर प्रोसिट रॉय ने यही करने की कोशिश की है। सवाल यह है कि क्या यह सीरीज इस विषय के साथ न्याय कर पाती है या इसे सिर्फ एक तमाशा बनाकर छोड़ देती है।

राख: कहानी

कहानी दो बच्चों के घर से निकलने के साथ शुरू होती है। वे एक आम दिन की तरह रेडियो स्टेशन जा रहे थे, लेकिन कभी वहां पहुंच नहीं पाए। उनके परिवार में हड़कंप मच जाता है और उनके माता-पिता (सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर) मदद के लिए पुलिस के पास जाते हैं।

जांच की जिम्मेदारी SI जयप्रकाश (अली फजल) को मिलती है, जो अपना पहला केस संभाल रहे हैं। साथ ही, उन्हें अपने रिटायर्ड कॉन्स्टेबल पिता (राकेश बेदी) से भी निपटना पड़ता है। उनके पिता अक्सर मटन करी लेकर पुलिस स्टेशन पहुंच जाते हैं, इस उम्मीद में कि उनके बेटे को लोग नोटिस करें और उसकी अहमियत बनी रहे।

काफी खोजबीन के बाद, बच्चे एक पहाड़ी इलाके में मृत और लावारिस हालत में मिलते हैं। इसके बाद बाबू और रज्जो, जिन्हें रंगा और बिल्ला के नाम से जाना जाता है, उनकी तलाश शुरू होती है।

राख: डायलॉग्स

यह कोई ऐसा शो नहीं है जो यादगार वन-लाइनर्स या लंबे भाषणों पर निर्भर हो। इसके बजाय, यह खामोशी, ठहराव और तनाव पर टिका है। सीरीज के माहौल की वजह से छोटी-सी आवाज भी बहुत तेज सुनाई देती है। लिखने वाले जानते हैं कि कब चुप रहना है और यह बात शो के हक में जाती है।

राख: परफॉर्मेंस

अली फजल ने बहुत संयम के साथ शो को संभाला है। SI जयप्रकाश के तौर पर वे एक ऐसे युवा ऑफिसर की बेबसी दिखाते हैं जो एक भयानक केस सुलझाने की कोशिश कर रहा है और साथ ही अपनी अंदरूनी उलझनों से भी जूझ रहा है। उनकी एक्टिंग कभी भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं लगती और यही बात इसे और असरदार बनाती है।

लेकिन 'राख' सिर्फ एक एक्टर का शो नहीं है। सोनाली बेंद्रे एक ऐसी मां के रोल में दिल तोड़ने वाली लगती हैं, जिनकी पूरी दुनिया रातों-रात बिखर जाती है। उनके हर सीन में दर्द झलकता है। आमिर बशीर एक पिता के तौर पर उनका बखूबी साथ देते हैं जो मजबूती से बने रहने की कोशिश करते हैं, जबकि अंदर ही अंदर टूट रहे हैं।

राकेश बेदी का स्क्रीन टाइम कम है, लेकिन वे गहरी छाप छोड़ते हैं। अली फजल के साथ उनका रिश्ता इस गंभीर कहानी में थोड़ी गर्माहट लाता है। SP के रोल में दिब्येंदु भट्टाचार्य भरोसेमंद हैं और अपने हर सीन में दमदार मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

हालांकि, सबसे बड़ा सरप्राइज आकाश मखीजा और रमनदीप यादव की ओर से मिलता है, जिन्होंने रंगा और बिल्ला का रोल किया है। उनकी एक्टिंग बहुत बेचैन करने वाली है। वे कभी भी सिर्फ असर डालने के लिए किरदार नहीं निभाते। इसके बजाय, वे बहुत आसानी से उन किरदारों की डरावनी सोच में ढल जाते हैं। अगर उनकी मौजूदगी आपको असहज करती है तो समझ लीजिए कि एक्टर्स ने वही हासिल किया है जो वे करना चाहते थे।

राख: डायरेक्शन

कहानी को सनसनीखेज बनाने के लालच से बचने के लिए प्रोसित रॉय तारीफ के हकदार हैं। इसे ड्रामेटिक तमाशा बनाने के बजाय उन्होंने तथ्यों और भावनाओं को खुद अपनी बात कहने दी है। कहानी को जमीनी हकीकत से जोड़े रखा गया है और इसी वजह से कई सीन और भी ज्यादा बेचैन करने वाले लगते हैं। अक्सर क्राइम थ्रिलर में असर पैदा करने के लिए सनसनी फैलाई जाती है, लेकिन 'राख' एकदम सही सुर पकड़ती है।

राख: क्या अच्छा है

इस सीरीज की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें सिर्फ इन्वेस्टिगेशन को ग्लोरिफाई करने के बजाय क्रिमिनल्स को समझने पर भी ध्यान दिया गया है। ज्यादातर क्राइम ड्रामा में मिस्ट्री सुलझाने वाले पुलिस अफसर को ही हीरो बनाया जाता है। यहां कहानी में यह भी दिखाया गया है कि क्राइम से पहले के दिनों में रंगा और बिल्ला क्या कर रहे थे, जिससे उनकी परेशान करने वाली सोच का पता चलता है और अगर आप इसे रात में देखने का प्लान बना रहे हैं तो यकीन मानिए, स्क्रीन बंद होने के काफी देर बाद तक भी आपको नींद नहीं आएगी।

'राख' की रफ्तार भी तारीफ के काबिल है। यह न तो बहुत धीमी है और न ही बेवजह जल्दबाजी में आगे बढ़ती है। सीरीज ने ऐसा बैलेंस बनाया है कि शुरू से आखिर तक सस्पेंस बना रहता है।

राख: क्या अच्छा नहीं है

जर्नलिस्ट वाला ट्रैक कभी-कभी मुख्य कहानी से अलग-थलग लगता है और इसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था। कुछ पल ऐसे भी हैं जहां कुछ बातें ठीक से नहीं बताई गई हैं, जिससे कुछ सवाल अधूरे रह जाते हैं। ये छोटी-मोटी कमियां माजे को खराब तो नहीं करतीं, लेकिन ध्यान जरूर खींचती हैं।

राख: कैसी है

'राख' एक जबरदस्त क्राइम थ्रिलर है जो शो खत्म होने के बाद भी आपके जहन में बनी रहती है। इसके जरिए हैरान-परेशान करने वाली कहानी को बहुत ही ईमानदारी से दिखाया गया है। सभी कलाकारों खासकर अली फजल और रंगा-बिल्ला का रोल करने वाले एक्टर्स की दमदार एक्टिंग का इसे फायदा मिला है। अगर आपको इमोशनल गहराई वाले इन्वेस्टिगेटिव ड्रामा पसंद हैं तो इसे जरूर देखें।

'राख' के लिए 5 में से 3.5 स्टार।

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