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Sapne vs Everyone 2 Review: हौसलों की उड़ान या हकीकत की मार? महत्त्वाकांक्षा के दो छोरों की अधूरी दास्तां है वेब सीरीज

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : May 01, 2026 01:41 pm IST,  Updated : May 01, 2026 01:42 pm IST

'सपने वर्सेज एवरीवन 2' दिल्ली की सत्ता और मुंबई के संघर्ष के बीच सपनों की कड़वी हकीकत बयां करती है। अमरीश वर्मा और परमवीर का अभिनय शानदार है, लेकिन सीरीज की अत्यधिक डार्क टोन और सुस्त रफ्तार इसे थोड़ा बोझिल बना देती है।

sapne vs everyone
सपने वर्सेज एवरीवन। Photo: PRIME VIDEO
  • फिल्म रिव्यू: सपने वर्सेज एवरीवन
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 1/05/2026
  • डायरेक्टर: अमरीश वर्मा
  • शैली: साइकोलॉजिकल ड्रामा

टीवीएफ हमेशा से ही युवाओं की रगों में दौड़ने वाले सपनों और उनके पीछे छिपे संघर्ष को पर्दे पर उतारने के लिए जाना जाता है। 'सपने वर्सेज एवरीवन' का दूसरा सीजन इसी सिलसिले को आगे बढ़ाता है, जहां महत्वाकांक्षा के दो अलग-अलग छोर दिल्ली और मुंबई एक साथ नजर आते हैं। अमरीश वर्मा द्वारा लिखित और निर्देशित यह सीरीज इस बार केवल सपनों की बात नहीं करती, बल्कि उन सपनों को पाने के लिए चुकाई जाने वाली कीमत पर सवाल उठाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो जितनी प्रेरणादायक होने की कोशिश करती है, उतनी ही अंधेरी और उदास करने वाली भी है। दिल्ली की दबंग राजनीति और मुंबई के अनिश्चित फिल्मी गलियारों के बीच झूलती यह सीरीज वास्तविकता के बेहद करीब रहने की कोशिश करती है, लेकिन क्या यह अपनी पिछली साख को बरकरार रख पाती है? आइए जानते हैं।

कहानी 

सीजन 2 की कहानी दो समानांतर रास्तों पर चलती है। एक तरफ जिम्मी मेहता (अमरीश वर्मा) है, जो दिल्ली की फिजाओं में अपनी धाक जमाने की कोशिश कर रहा है। जिम्मी का किरदार एक ऐसे युवक का है जो मानता है कि सफलता के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब जायज है। वह रियल एस्टेट की दुनिया में खुद को सेल्स गॉड कहता है और अपने अहंकार को ही अपनी ढाल बनाता है। जिम्मी का मुख्य संघर्ष अपने चाचा कुकरेजा (विजयांत कोहली) से है। वह अपने चाचा की राजनीतिक और व्यावसायिक विरासत को ढहाने के लिए न केवल उनके घर के ठीक सामने एक इमारत खड़ी करता है, बल्कि उन्हें चिढ़ाने के लिए एक विवादित प्रतिमा भी लगा देता है। जिम्मी का पूरा जोर गुरुग्राम की राजनीति में अपना दबदबा बनाने पर है, लेकिन उसकी योजना में 'टोनी' (अभिषेक चौहान) की एंट्री सब कुछ बदल देती है। टोनी दिखने में सौम्य है, अंदर से कहीं ज्यादा प्रतिशोधी और चालाक निकलता है।

दूसरी तरफ जिम्मी का दोस्त प्रशांत (परमवीर सिंह चीमा) है, जिसका सपना अभिनय की दुनिया में नाम कमाना है। वह दिल्ली की गहमागहमी छोड़ मुंबई आता है। मुंबई का हिस्सा उन हजारों स्ट्रगलर्स की कहानी कहता है जो हर रोज एक ब्रेक की उम्मीद में ऑडिशन की कतारों में खड़े होते हैं। प्रशांत एक कास्टिंग एजेंट के साथ काम करते हुए खुद के लिए मौकों की तलाश करता है। मुंबई की इस दुनिया में पैसा और राजनीति नहीं, बल्कि उम्मीद और संघर्ष ही असल मुद्रा है, जहां जिम्मी अपनी महत्वाकांक्षा के लिए किसी को भी कुचलने को तैयार है, वहीं प्रशांत अपने आदर्शों, नैतिकता और मासूमियत को बचाने की जद्दोजहद करता है। प्लॉट इन दोनों शहरों के कंट्रास्ट को बखूबी दिखाता है, एक तरफ दिल्ली की ताकत और दूसरी तरफ मुंबई का संघर्ष।

अभिनय

अभिनय के मामले में सीरीज का पलड़ा भारी है। अमरीश वर्मा ने न केवल लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली है, बल्कि जिम्मी मेहता के किरदार में उन्होंने जान फूंक दी है। उनके अभिनय पर इमरान हाशमी की शैली का प्रभाव साफ झलकता है, फिर भी वे अपनी एक अलग छाप छोड़ने में सफल रहते हैं। जिम्मी की अकड़, उसका आत्मविश्वास और अपमान का बदला लेने की उसकी तीव्र इच्छा को अमरीश ने पर्दे पर बहुत प्रभावशाली ढंग से उतारा है। परमवीर सिंह चीमा ने प्रशांत के रूप में एक बेहतरीन संतुलन पेश किया है। एक स्ट्रगलर की हताशा, उसकी आंखों में चमकता सपना और दोस्तों के प्रति वफादारी चीमा ने इन सभी भावनाओं को बहुत ही सहजता से जिया है। उनके किरदार के माध्यम से दर्शक खुद को जोड़ पाते हैं, क्योंकि वह उन नैतिक दुविधाओं से गुजरता है जो हर आम इंसान के सामने आती हैं।

सहयोगी कलाकारों में अभिषेक चौहान ने टोनी के किरदार में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उनकी शांत प्रवृति के पीछे छिपा खतरनाक इरादा सीरीज में एक जबरदस्त ट्विस्ट लेकर आता है। वहीं प्रशांत के रूममेट्स के रूप में अखिल कायमल (अश्विन) और रजत दहिया (मनीष) ने भी सराहनीय काम किया है। खास कर मनीष का किरदार एक टैलेंटेड लेकिन एटीट्यूड के कारण पीछे छूट रहे अभिनेता की कहानी है, बहुत ही वास्तविक लगता है। चाचा के रूप में विजयांत कोहली भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करते हैं।

निर्देशन और लेखन

अमरीश वर्मा का निर्देशन इस सीजन में अधिक परिपक्व और डार्क नजर आता है। उन्होंने दिल्ली और मुंबई की वाइब को पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दिल्ली के दृश्यों में सत्ता का नशा और स्वैग दिखता है, तो मुंबई के दृश्यों में एक तरह की घुटन और निरंतर प्रतीक्षा। लेखक के तौर पर अमरीश ने कहानी को एक प्रैग्मैटिक मोड़ दिया है। वे किसी जादुई हैप्पी एंडिंग के पीछे नहीं भागते, बल्कि यह दिखाते हैं कि असल जिंदगी में जीत के साथ-साथ दिल टूटने और विश्वासघात की घटनाएं भी उतनी ही सामान्य हैं।

सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह सफलता के शॉर्टकट और आदर्शवाद के बीच के द्वंद्व को बिना किसी पक्षपात के दिखाती है। हालांकि लेखन में कहीं-कहीं दोहराव महसूस होता है। संघर्षरत अभिनेताओं की कहानियां हम पहले भी कई शो और फिल्मों में देख चुके हैं, इसलिए मुंबई वाला हिस्सा कई बार प्रेडिक्टेबल लगने लगता है। साथ ही दिल्ली के राजनीतिक दांव-पेंचों को थोड़ा और कसा जा सकता था।

सिनेमैटोग्राफी और संगीत

तकनीकी रूप से 'सपने वर्सेज एवरीवन' एक शानदार सीरीज है। सिनेमैटोग्राफी ने दोनों शहरों के अंतर को रंगों और लाइटिंग के जरिए बहुत खूबसूरती से पेश किया है। दिल्ली के दृश्यों में शार्प कलर्स और खुलापन है, जबकि मुंबई के संघर्ष को तंग गलियों और कम रोशनी वाले कमरों के जरिए महसूस कराया गया है।

बैकग्राउंड स्कोर सीरीज के मिजाज के अनुरूप है। यह कहानी की गंभीरता और तनाव को बढ़ाने में मदद करता है। एडिटिंग थोड़ी और चुस्त हो सकती थी, क्योंकि पांच कड़ियों के इस शो में कुछ सीन काफी लंबे खिंचे हुए लगते हैं, जो कहानी की गति को धीमा कर देते हैं। बावजूद इसके सीरीज का तकनीकी ढांचा इसे एक प्रीमियम अनुभव बनाता है।

कमियां

सीरीज की सबसे बड़ी कमी इसकी डार्क टोन है। यह शो कई बार इतना उदास और निराशाजनक हो जाता है कि दर्शकों के लिए इसे एक बैठक में देखना मुश्किल हो सकता है। मनोरंजन के लिहाज से इसमें हल्के पलों की भारी कमी है। इसके अलावा जिम्मी के किरदार की कुछ हरकतें इतनी अधिक नाटकीय हैं कि वे यथार्थवाद से परे लगने लगती हैं। साथ ही क्लाइमेक्स में कुछ सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं, जो शायद अगले सीजन के लिए बचाए गए हैं, लेकिन वे वर्तमान अनुभव को थोड़ा अधूरा छोड़ देते हैं।

वर्डिक्ट

'सपने वर्सेज एवरीवन' सीजन 2 एक ईमानदार लेकिन भारी सीरीज है। यह उन लोगों के लिए है जो जिंदगी की कड़वी हकीकत और संघर्ष को पर्दे पर बिना किसी बनावट के देखना पसंद करते हैं। यह शो केवल सपनों की बात नहीं करता, बल्कि उस 'प्राइस टैग' की बात करता है जो हर सपने के साथ आता है। जुनैद और प्रशांत की यात्रा यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सपने तभी मायने रखते हैं जब उन्हें पूरा करने का साधन हमारे पास हो? अभिनय और निर्देशन के मामले में यह सीजन मजबूत है, लेकिन इसकी सुस्त रफ्तार और अत्यधिक निराशावाद इसे एक 'प्योर एंटरटेनर' बनने से रोकता है। यह एक ऐसी वेब सीरीज है जो आपको प्रेरित तो करेगी, लेकिन साथ ही एक गहरी चिंता में भी छोड़ देगी।

यदि आप टीवीएफ के यथार्थवादी ड्रामा के प्रशंसक हैं और गहरे, भावनात्मक किरदारों को पसंद करते हैं तो यह सीजन आपको निराश नहीं करेगा। हालांकि अगर आप कुछ हल्का-फुल्का या खुशनुमा देखना चाहते हैं तो यह शो आपके लिए नहीं है। यह स्ट्रगल का एक कच्चा और कड़वा दस्तावेज है।

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