बोमन ईरानी के बेटे कायोज ईरानी का निर्देशन डेब्यू सरजमीन एक एंबीशियस प्रयास है, जो युद्ध, परिवार और रहस्य के बीच एक गहरी लेकिन थोड़ी असंतुलित कहानी कहता है। फिल्म की पृष्ठभूमि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव से भरी सीमा पर सेट की गई है, लेकिन इसका असली फोकस एक सैनिक और उसके परिवार के रिश्तों पर है। एक ऐसा भावनात्मक केंद्र जिसमें बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन कहानी का एग्जीक्यूशन उसे पूरी तरह भुना नहीं पाता। ये फिल्म आज ओटीटी प्लेटफॉर्म जियो हॉटस्टार पर रिलीज हो गई है। इसमें क्या खास है और क्या काम नहीं किया है, ये जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
कैसी है कहानी?
'सरजमीन' की शुरुआत होती है मेजर विजय मेनन (पृथ्वीराज सुकुमारन) से, जो सेना में अपने सफल अभियान के बाद एक हीरो बन चुके हैं। देश की सेवा में उनका समर्पण बेमिसाल है, लेकिन अपने परिवार के लिए उनकी भावनाएं कहीं धुंधली सी हैं। विजय की पत्नी मेहर (काजोल) और उनका छोटा बेटा हरमन इस नए माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करते हैं। एक समारोह में जब मेहर अपने बेटे से बोलने के लिए कहती हैं तो वह कुछ शब्द बोलने के बाद हकलाता है और चुप हो जाता है। यह दृश्य विजय को विचलित कर देता है और घर में असहजता की शुरुआत यहीं से होती है। इसी दौरान सीमा पार के आतंकी विजय को एक कठिन चुनाव के सामने खड़ा कर देते हैं या तो अपने बेटे को बचाओ या देश के लिए एक बड़ा खतरा टालो। विजय एक सच्चे सैनिक की तरह, देश को प्राथमिकता देता है और अपने बेटे को खो बैठता है। यहीं से कहानी में गहराई आती है। कर्तव्य के नाम पर किया गया त्याग और उसका पारिवारिक मूल्य, दोनों कहानी में देखने को मिलता है।
वक्त का फासला और नए सवाल
आठ साल बाद कहानी फिर एक मोड़ लेती है। एक राहत अभियान के दौरान विजय अपने खोए हुए बेटे से मिलता है, जो अब बड़ा हो चुका है। युवा हरमन की भूमिका निभाई है इब्राहिम अली खान ने, जो इस फिल्म से बॉलीवुड में अपनी शुरुआत कर रहे हैं। यह पुनर्मिलन शुरुआत में सुखद प्रतीत होता है, लेकिन धीरे-धीरे विजय के मन में शक पैदा होता है, क्या यह वही बच्चा है जिसे उसने खोया था? यहीं से फिल्म रहस्य की ओर मुड़ती है। हरमन के व्यवहार, उसकी स्मृतियां और बॉडी लैंग्वेज विजय को परेशान करते हैं। दूसरी तरफ एक सबस्टोरी भी सामने आती है जिसमें सीमा पार से एक रहस्यमयी व्यक्ति भारतीय सेना की मदद कर रहा है। फिल्म इन दोनों पटरियों पर चलती है, एक पारिवारिक ड्रामा और दूसरी जासूसी थ्रिलर, लेकिन दोनों को एक साथ जोड़ने में थोड़ी मुश्किल महसूस होती है।
काजोल का प्रभाव, पृथ्वीराज फीके
काजोल इस फिल्म की जान हैं। एक मां के रूप में जो अपने टूटते परिवार को जोड़ने की कोशिश करती है, उनका अभिनय हर दृश्य में सधा हुआ और प्रभावशाली है। उनके चेहरे पर उभरती पीड़ा, डर और आशा फिल्म को भावनात्मक गहराई देती है। पृथ्वीराज सुकुमारन, इस तरह के गंभीर किरदारों में पहले भी नजर आ चुके हैं, यहां उनका प्रभाव थोड़ा सीमित प्रतीत होते है। उनका आंतरिक संघर्ष, एक पिता के रूप में पछतावा और एक सैनिक के रूप में गर्व ज्यादा प्रभावशाली हो सकता था अगर पटकथा उसे थोड़ा और विस्तार देती।
कैसा है इब्राहिम का काम?
इब्राहिम अली खान का काम मिला-जुला है। एक गुस्सैल युवक के रूप में वे काबिल कोशिश करते हैं, लेकिन कई दृश्यों में उनका प्रदर्शन अटपटा लगता है। हालांकि जब उन्हें एक मासूम, खोए हुए बच्चे की छवि पेश करनी होती है तो वे प्रभाव छोड़ते हैं। साफ है कि उनमें संभावना है और बेहतर लेखन व निर्देशन से वह और निखर सकते हैं। वैसे पहली फिल्म 'नादानियां' की तुलना में इस बार उन्होंने नादानी नहीं की है। इस बार उनके काम में काफी सुधार देखने को मिला है। उनका स्क्रीन टाइम भी पृथ्वीराज और काजोल की तुलना में आधा ही है। वो लगभग एक घंटे की फिल्म बीतने के बाद नजर आते हैं। इसके बाद उनके हाथ चंद डायलॉग ही आए हैं। शायद यही उनके लिए सेवियर साबित हुआ है। कम डायलॉग्स में वो संतुलित दिखे हैं। बात करें, एक्शन सीन्स की तो उसमें पृथ्वीराज के सामने इब्राहिम फीके हैं।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष: कुछ हिट, कुछ मिस
कायोज ईरानी का निर्देशन संतुलित है, लेकिन कहीं-कहीं अनुभवहीनता झलकती है। फिल्म का पहला हिस्सा धीमा है और दर्शक कथानक में गहराई से जुड़ने से पहले ही अनुमान लगाने लगते हैं कि आगे क्या होगा। फिल्म का सबसे बड़ा मोड़ एकदम अचानक आता है, कोई पूर्व संकेत नहीं दिए जाते, जिससे दर्शक चौंक तो जाते हैं, लेकिन उससे जुड़ नहीं पाते। सिनेमैटोग्राफी सुंदर है और कुछ लोकेशंस बहुत प्रभावशाली ढंग से फिल्माए गए हैं, खासकर सीमा क्षेत्रों के दृश्य। संगीत मिश्रित प्रभाव डालता है, कुछ जगहों पर यह भावनाओं को उभारने में सहायक है, लेकिन कई बार यह कहानी की लय को बाधित भी करता है। काजोल को लेकर अंत में होने वाले खुलासे में ये साफ ही नहीं हो पाता कि वो फिल्म में विलेन थीं या हीरो, इसके अलावा ये भी साफ नहीं होता कि वो किस मकसद से भारत आई थीं, क्या वो भारत आने के बाद अपने मकसद को अंजाम दे सकीं, पृथ्वीराज से उनकी मुलाकात कैसे हुई, ये सब अधूरा रह जाता है और इसी के चलते कहानी को गहराई नहीं मिल पाती। एक बाद ये भी खटकती है कि एक फौजी के घर में सालों से आतंकी पल रहा है और उसे इसका इल्म भी नहीं होता। ये बात हजम नहीं होती है।
लेखन और पटकथा: अधूरी संभावनाएं
'सरजमीन' एक मजबूत अवधारणा पर आधारित फिल्म है, एक ऐसा सैनिक जो देश के लिए अपने बच्चे की कुर्बानी देता है, और फिर उस फैसले के साथ जीने की कोशिश करता है। लेकिन लेखन इस विचार की पूरी परिपक्वता तक नहीं पहुंच पाता। कुछ उपकथानक जैसे विजय के अपने पिता से रिश्ते या सीमा पार के व्यक्ति की भूमिका अधूरी लगती हैं। सबसे बड़ी कमी यह है कि दर्शक भावनात्मक स्तर पर उस गहराई को महसूस नहीं कर पाते, जिसकी यह कहानी मांग करती है। कहानी में जो रहस्य है, वह दिलचस्प हो सकता था अगर सुराग और तनाव बेहतर तरीके से बुने गए होते।
निष्कर्ष: एक ईमानदार लेकिन अधूरा प्रयास
'सरजमीन' एक ऐसी फिल्म है जो कुछ नया कहने की कोशिश करती है। यह युद्ध के इर्द-गिर्द बनी कहानियों से हटकर, सैनिक के व्यक्तिगत जीवन पर ध्यान देती है। ये एक साहसी प्रयास है, जिसमें नयापन है। फिल्म में कुछ प्रभावशाली दृश्य, अच्छा अभिनय (विशेषकर काजोल का) और संभावनाओं से भरा विषय है, लेकिन ये सब बातें एक ठोस, मनमोहक अनुभव में नहीं बदलतीं। पटकथा की ढीली पकड़, भावनात्मक गहराई की कमी और रहस्य का अधूरा उपयोग इस फिल्म को औसत बना देता है। 'सरजमीन' को एक बार देखा जा सकता है, खासकर उनके लिए जो पारिवारिक ड्रामा और राष्ट्रभक्ति के मेल को पसंद करते हैं।