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सच्चाई और हिम्मत की दिल को छू लेने वाली कहानी है 'सतलुज', दिलजीत दोसांझ के अभिनय ने फिल्म को बनाया और मजबूत | Review

 Written By: Priya Shukla
 Published : Jul 04, 2026 04:21 pm IST,  Updated : Jul 04, 2026 04:26 pm IST

'सतलुज' के जरिए, डायरेक्टर हनी त्रेहान ने जसंवत सिंह खालरा की सच्ची कहानी को ईमानदारी और सादगी के साथ पेश किया है, जिसमें दिलजीत दोसांझ ने एक बार फिर अपनी बेहतरीन अदाकारी से दर्शकों के दिल जीत लिए।

diljit dosanjh
सतलुज रिव्यू। Photo: INSTAGRAM/@DILJITDOSANJH
  • फिल्म रिव्यू: सतलुज
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: जुलाई 3, 2026
  • डायरेक्टर: हनी त्रेहान
  • शैली: बायोग्राफिकल क्राइम-ड्रामा

असली जिंदगी के हीरो पर बनी हर फिल्म को अपनी छाप छोड़ने के लिए बड़े-बड़े भाषणों या सीना ठोकने वाले दिखावे की जरूरत नहीं होती। दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' यह बात अच्छी तरह समझती है। यह फिल्म शोर-शराबे के बजाय शांति से अपनी बात कहती है। डायरेक्टर हनी त्रेहान की मंशा जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी की कहानी को एक पारंपरिक बायोपिक की तरह पेश करने की नहीं है। इसके बजाय, वे इसे धैर्य के साथ दिखाते हैं और सच्चाई को ही कहानी का भावनात्मक भार उठाने देते हैं। इस फिल्म का ऐलान 'पंजाब 95' के नाम से किया गया था, लेकिन अब 'सतलुज' के नाम से दर्शकों के बीच ये दस्तक दे चुकी है। ये फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी से प्रेरित है, जिन्होंने अपने से कहीं ज्यादा बड़े सिस्टम को चुनौती दी थी। 'सतलुज' को देखना हमेशा आसान नहीं होता और यह निश्चित रूप से उन दर्शकों के लिए नहीं है जो लगातार रोमांच की उम्मीद करते हैं। लेकिन, जब यह फिल्म अपने आखिरी पलों तक पहुंचती है, तो यह दर्शकों के मन में एक ऐसी छाप छोड़ जाती है जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।

'सतलुज' की कहानी

1990 के दशक में पंजाब सिर्फ राजनीतिक रूप से ही उथल-पुथल वाला दौर नहीं था। यह एक ऐसी जगह थी जहां गलत सवाल पूछने से आपकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती थी। फिल्म 'सतलुज' हमें उसी दुनिया में ले जाती है। यह फिल्म अमृतसर के एक बैंक मैनेजर की कहानी है, जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए कुछ परेशान करने वाली गड़बड़ियों, लोगों के गायब होने और अनसुलझे रहस्यों का सामना करता है। शुरुआत में तो यह सिर्फ उत्सुकता होती है। लेकिन, हर जवाब एक नया सवाल खड़ा करता है और जल्द ही, वह खुद को ऐसी ताकतवर संस्थाओं के खिलाफ खड़ा पाता है, जिनके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।

इस फिल्म की अच्छी बात यह है कि मुख्य किरदार दिलजीत दोसांझ कभी भी किसी सुपरहीरो नहीं लगते। उन्हें डर लगता है। वे हिचकिचाते हैं। उनका परिवार उनके लिए परेशान होता है। दोस्त उन्हें मामला छोड़ देने के लिए कहते हैं। ऐसे पल भी आते हैं जब उन्हें खुद नहीं पता होता कि आगे क्या होगा। फिर भी वे आगे बढ़ते रहते हैं क्योंकि एक समय पर, सच का सामना करने के बजाय उसे नजरअंदाज़ करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। हनी त्रेहान ने इन्वेस्टिगेटिव ड्रामा फिल्मों में अक्सर इस्तेमाल होने वाले घिसे-पिटे तरीकों से परहेज किया है। इसमें हर पंद्रह मिनट में कोई चौंकाने वाला खुलासा या कहानी में अचानक आने वाले सुविधाजनक मोड़ नहीं हैं। इसके बजाय, तनाव धीरे-धीरे बढ़ता है। एक शांत बातचीत, कोई अचानक मिला दस्तावेज या एक आम सी मुलाकात अचानक बिल्कुल अलग मतलब रखने लगती है। परिवार वाले सीन भी ज़िक्र के काबिल हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हिम्मत दिखाने की कीमत सिर्फ लड़ाई के केंद्र में खड़े व्यक्ति को ही नहीं चुकानी पड़ती।

सतलुज का लेखन और निर्देशन

हनी त्रेहान की सबसे बड़ी कामयाबी यह जानना है कि कब रुकना है। कई फिल्ममेकर स्क्रीनप्ले को इमोशनल भाषणों और तालियां बटोरने वाले पलों से भरने के लालच में पड़ जाते। 'सतलुज' इस लालच से बचती है। सबसे दमदार सीन अक्सर खामोशी में सामने आते हैं। बातचीत के बीच का ठहराव या दो किरदारों के बीच की नज़रें, कई पन्नों के डायलॉग से कहीं ज्यादा कह जाती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि स्क्रीनप्ले में कोई कमी नहीं है। फिल्म की शुरुआत ज़रूरत से ज्यादा लंबी लगती है और कुछ इन्वेस्टिगेशन वाले सीन एक ही तरह के इमोशनल एहसास को दोहराने लगते हैं। थोड़ी काट-छांट से फिल्म की गंभीरता पर असर डाले बिना इसकी रफ़्तार बनाए रखी जा सकती थी। स्क्रिप्ट यह भी मानकर चलती है कि दर्शकों को उन ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में कुछ जानकारी है जिनसे यह फिल्म प्रेरित है। जो लोग राजनीतिक बैकग्राउंड से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें कभी-कभी थोड़ा और संदर्भ जानने की इच्छा हो सकती है। फिर भी, फिल्म कभी भी उस बात से नहीं भटकती जो सबसे ज्यादा जरूरी है। असल में, यह फिल्म राजनीति के बारे में कम और सही चीज के लिए खड़े होने की कीमत के बारे में ज्यादा है।

सतलुज: तकनीकी पहलू

सतलुज वैसी ही दिखती है जैसी इस कहानी को दिखना चाहिए। इसकी सिनेमैटोग्राफी पंजाब को बहुत ज्यादा आकर्षक या हर सीन को पोस्टकार्ड जैसा सुंदर दिखाने की कोशिश नहीं करती। रंग हल्के रखे गए हैं, लाइटिंग नैचुरल लगती है और सबसे आम सीन में भी एक तरह की बेचैनी महसूस होती है। प्रोडक्शन डिजाइन को उस दौर को दोबारा दिखाने का श्रेय मिलना चाहिए, बिना उस पर बेवजह ध्यान खींचे। कुछ भी बहुत ज्यादा बनावटी या नकली नहीं लगता। बैकग्राउंड स्कोर बहुत ही संयमित और नयापन लिए हुए है। दर्शकों को लगातार यह बताने के बजाय कि उन्हें कैसा महसूस करना चाहिए, यह पीछे हट जाता है और सीन को अपने हिसाब से आगे बढ़ने देता है। फिल्म के कुछ सबसे असरदार पल बिना किसी संगीत के ही आते हैं। शायद एडिटिंग के मामले में फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे खिंचते हैं, जिससे फिल्म की लंबाई असल जरूरत से ज्यादा भारी लगती है। अगर इसे लगभग पंद्रह मिनट छोटा किया जाता, तो कहानी और भी ज्यादा दिलचस्प हो सकती थी।

कैसा है अभिनय?

दिलजीत दोसांझ ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक दी है, और इसकी वजह यह है कि उन्होंने कभी भी जरूरत से ज्यादा कोशिश नहीं की। उन्होंने तालियां बटोरने के लिए कोई बनावटी बदलाव नहीं किया। उन्होंने सब कुछ अपने अंदर ही रखा। उनके हाव-भाव ही ज्यादातर बात कह जाते हैं और इमोशनल सीन में भी वे बहुत संयमित रहते हैं। परिवार के साथ वाले सीन खास तौर पर असरदार हैं। जब डायलॉग कम होते हैं, तब भी आप उनके चेहरे पर डर, पछतावा और पक्का इरादा महसूस कर सकते हैं। यह परफॉर्मेंस बड़े पलों के बजाय छोटे-छोटे पलों से बनी है। सुविंदर विक्की एक बार फिर साबित करते हैं कि वे कितने भरोसेमंद एक्टर हैं। वे किरदार में इतनी सहजता से ढल जाते हैं कि आपको उनकी एक्टिंग का एहसास ही नहीं होता। अपना दबदबा बनाने के लिए उन्हें डराने-धमकाने की जरूरत नहीं पड़ती, उनके काम ही गहरी छाप छोड़ते हैं। आमना-सामना होने वाले सीन आपको लंबे समय तक याद रहेंगे। अर्जुन रामपाल को स्क्रीन पर कम समय मिला है, लेकिन उन्होंने उसका अच्छा इस्तेमाल किया है। उनकी शांत मौजूदगी फिल्म के संयमित अंदाज में बखूबी फिट बैठती है। सपोर्टिंग कास्ट ने भी बिना किसी फालतू ड्रामे के अपना काम किया है। इसी निरंतरता की वजह से फिल्म की दुनिया असली लगती है।

'सतलुज' में क्या कमी है?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी पहचान भी है। इसकी धीमी रफ़्तार कहानी को जमने का मौका तो देती है, लेकिन इसके लिए काफी सब्र की भी जरूरत होती है। कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब कहानी आगे बढ़ने से पहले एक ही बात के इर्द-गिर्द घूमती हुई लगती है। कुछ सहायक किरदारों को काफी उम्मीद जगाने वाले अंदाज में पेश किया जाता है, लेकिन पटकथा (स्क्रीनप्ले) में उन्हें गहराई से समझने या दिखाने के लिए कभी काफी समय नहीं दिया जाता। कुछ सीन ऐसे भी हैं जो ज्यादा जबरदस्त भावनात्मक असर डाल सकते थे। 'सतलुज' का कहानी कहने का संयमित और सूक्ष्म अंदाज तारीफ के काबिल है, लेकिन कई बार फ़िल्म इतनी ज़्यादा संयमित हो जाती है कि उन भावनाओं को भी रोक लेती है जिन्हें थोड़ा और खुलकर सामने आने की ज़रूरत थी। जो दर्शक लगातार तनाव और रोमांच से भरपूर इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, उन्हें शायद यह फिल्म बहुत ज़्यादा शांत या धीमी लग सकती है।

कैसी है सतलुज?

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनके साथ कैमरे के आगे और पीछे, दोनों ही तरफ बहुत सारी चुनौतियां जुड़ी होती हैं। 'सतलुज' के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। कानूनी पेचीदगियों और सेंसर बोर्ड के साथ लड़ाई (जो फिल्म में 127 कट लगवाना चाहता था) की वजह से हनी त्रेहान की इस फिल्म को रिलीज होने में कई साल लग गए। एक समय तो ऐसा लगा कि इसका रिलीज होना नामुमकिन हो गया है। आखिरकार इसके रिलीज होने और मेकर्स की सोची-समझी असल शक्ल में सामने आने से, इसकी रिलीज अपने आप में एक जीत जैसी लगती है। हालांकि, 'सतलुज' अपनी बात कहने के लिए शोर नहीं मचाती। यह अपने मैसेज को जोरदार बनाने के लिए ड्रामैटिक बैकग्राउंड म्यूज़िक या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हीरोपंती वाले सीन पर निर्भर नहीं रहती। इसके बजाय, यह एक शानदार सच्ची कहानी पर भरोसा करती है और उसे ईमानदारी से दिखाती है। हनी त्रेहान इस विषय को उतनी ही संवेदनशीलता से दिखाते हैं जितनी इसकी जरूरत है, वहीं दिलजीत दोसांझ ऐसी एक्टिंग करते हैं जो आपके ज़हन में बस जाती है क्योंकि यह बहुत सहज लगती है।

किस ओटीटी प्लेटफॉर्म पर देखें फिल्म?

ज्यादातर फिल्मों के उलट, जो ध्यान खींचने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर चीजें दिखाती हैं, 'सतलुज' असलियत पर टिकी रहती है। हो सकता है कि यह सभी दर्शकों को पसंद न आए, लेकिन जो लोग इसकी सादगी को अपनाएंगे, उन्हें यह दिल को छूने वाली और गहरी समझ देने वाली लगेगी। कई बार खामोशी वो बोल जाती है, जो शब्द बयां नहीं कर पाते और 'सतलुज' इस बात को दूसरों से बेहतर समझती है। इसलिए, 'सतलुज' को 5 में से 3.5 स्टार मिलने चाहिए और यह अब Zee5 पर स्ट्रीम हो रही है।

(इस फिल्म का रिव्यू साक्षी वर्मा ने किया है। वह इंडिया टीवी इंग्लिश के लिए लिखती हैं। यहां उनकी प्रोफाइल है।)

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