फिल्म जगत में ज्यादातर फिल्में एक्शन सीक्वेंस, तेज रफ्तार भागती हुई थ्रिलिंग कहानियां और चौंकाने वाले ट्विस्ट से दर्शकों को लुभाती हैं, लेकिन इस फास्ट पेस सिनेमा के दौर में कुछ फिल्में ऐसी भी रिलीज होती हैं जो अलग और स्लो रास्ता चुनती हैं। 'द नर्मदा स्टोरी'ऐसी ही फिल्म है। ये फिल्म न तो हद से ज्यादा मसाला और ड्राम दिखाती है और न ही ओर ड्रैमेटिक सस्पेंस से लोगों को खींचने की कोशिश करती है। ये समाज के एक गंभीर मुद्दे को सादगी और ईमानदारी के साथ पर्दे पर लाने की कोशिश करती है। अगर आप यह सोचकर थिएटर जा रहे हैं कि फिल्म में हर दस मिनट में कोई बड़ा ट्विस्ट आएगा या जबरदस्त एक्शन देखने को मिलेगा तो शायद यह फिल्म आपकी उम्मीदों पर खरी न उतरे, लेकिन अगर आप ऐसी कहानियां पसंद करते हैं, जो समाज आईना होती हैं तो ये फिल्म सिर्फ आपके लिए ही है। फिल्म की कहानी में गहराई है, किरदारों ने अपनी एक्टिंग में एफर्ट्स डाले हैं, जो इसकी यूएसपी है।
कहानी की सबसे बड़ी ताकत
फिल्म की सबसे खास बात इसकी सादगी भरी कहानी ही है। यह बिना किसी ड्रामे या बनावटीपन के अपनी बात कहती है। कहानी ऐसे सिस्टम के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई के पर बुनी गई है जो लंबे समय से भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार है। कहानी नर्मदा अंचल में घटित होने वाली रहस्यमयी घटनाओं और उनके पीछे छिपे सच के इर्द-गिर्द घूमती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, कहानी नई परतें खोलती जाती है। पुलिस और आम जनता के बीच विश्वास, डर और संघर्ष का जो ताना-बाना फिल्म में बुना गया है, वह इसे एक साधारण क्राइम-थ्रिलर से अलग पहचान देता है। फिल्म कई जगह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर सच और अफवाह के बीच की रेखा कितनी पतली होती है।
कैसा है निर्देशन, लेखन में रह गई थोड़ी कमी
हालांकि फिल्म का विषय मजबूत है, लेकिन इसकी स्क्रिप्ट कुछ जगहों पर थोड़ी कमजोर महसूस होती है। कई सीन ऐसे लगते हैं, जहां कहानी को और गहराई से दिखाया जा सकता था। कुछ संवाद सीधे-सादे हैं और कई बार ऐसा लगता है कि किरदार अपनी भावनाओं को पूरी तरह दर्शक तक नहीं पहुंचा पा रहे। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी थोड़ा धीमा है। कुछ हिस्सों में कहानी जरूरत से ज्यादा लंबी लगती है और वहां थोड़ी कसावट होती तो फिल्म और असरदार बन सकती थी। हालांकि यह कमी इतनी बड़ी नहीं है कि फिल्म का पूरा अनुभव खराब कर दे, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
कलाकारों ने संभाल ली फिल्म
कलाकार अपनी दमदार एक्टिंग से फिल्म को संभाल लेते हैं। सभी कलाकार अपने किरदारों में काफी सहज नजर आते हैं। खास बात यह है कि कोई भी अभिनय ओवरड्रामैटिक नहीं लगता। रघुबीर यादव और मुकेश तिवारी अपने अनुभव का पूरा असर छोड़ते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं सिमाला प्रसाद। एक पुलिस अधिकारी के किरदार में उनका आत्मविश्वास, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं। सिमाला कई दृश्यों में फिल्म की धुरी बनकर उभरती हैं और साबित करती हैं कि वह सिर्फ खूबसूरत चेहरा नहीं बल्कि एक सशक्त अभिनेत्री भी हैं।
फिल्म का सबसे चौंकाने वाला पहलू इश्तियाक खान और सदानंद पाटिल का किन्नर अवतार है। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों में ऐसी जीवंतता भरी है कि वे लंबे समय तक याद रहते हैं। खासतौर पर इश्तियाक खान को किन्नर ‘निशा’ के रूप में देखना कई दृश्यों में डर और बेचैनी पैदा करता है। उनका मेकअप, बॉडी लैंग्वेज और आंखों के भाव किरदार को बेहद प्रभावी बनाते हैं। अश्विनी कालसेकर, अंजलि पाटिल और जरीना वहाब अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं। शरद सिंह और हसन पीरजादा भी सीमित स्क्रीन स्पेस में प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं। दोनों कलाकार कहानी के महत्वपूर्ण हिस्सों को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं और फिल्म के यथार्थवादी माहौल को मजबूत बनाते हैं।
तकनीकी पहलू
तकनीकी रूप से भी फिल्म प्रभावित करती है। नर्मदा क्षेत्र की वास्तविक लोकेशंस कहानी को प्रामाणिकता देती हैं। सिनेमैटोग्राफी वातावरण में मौजूद रहस्य और तनाव को खूबसूरती से उभारती है, जबकि बैकग्राउंड म्यूजिक कई दृश्यों को और प्रभावशाली बना देता है। संपादन भी कसा हुआ है, जिससे फिल्म अपनी गति बनाए रखती है। जैगम इमाम की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने बिना किसी फर्जी ड्रामे या मसालेबाजी के एक ऐसी क्राइम-थ्रिलर बनाई है जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज और कानून व्यवस्था से जुड़े कई सवाल भी उठाती है। फिल्म का क्लाइमैक्स रोंगटे खड़े कर देने वाला है और दर्शकों को अंत तक अनुमान लगाने पर मजबूर रखता है।
वर्डिक्ट
कुल मिलाकर 'द नर्मदा स्टोरी' एक ईमानदार और जमीन से जुड़ी फिल्म है। इसमें कुछ कमियां जरूर हैं, खासकर इसकी स्क्रिप्ट और कहानी की रफ्तार में, लेकिन इसके बावजूद फिल्म अपने मजबूत विषय और कलाकारों के शानदार अभिनय की वजह से दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है। यह फिल्म बताती है कि किसी भी बदलाव की शुरुआत आम लोगों से हो सकती है और जब लोग एकजुट होकर खड़े होते हैं तो बड़े से बड़ा सिस्टम भी चुनौती के घेरे में आ जाता है। यही संदेश फिल्म को खास बनाता है। अगर आप हल्की-फुल्की मसाला फिल्म की जगह एक ऐसी कहानी देखना चाहते हैं, जो समाज के एक गंभीर पहलू को सामने लाती है और जिसके किरदार लंबे समय तक याद रह जाते हैं तो 'द नर्मदा स्टोरी' को एक मौका जरूर दिया जा सकता है