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Vibe Movie Review: कॉमेडी और स्पाई-थ्रिल के बीच फंसी कुणाल खेमू की फिल्म, हंसी आती है लेकिन पूरी तरह नहीं जमती ‘वाइब’

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Sep 18, 2026 01:59 pm IST,  Updated : Sep 18, 2026 01:59 pm IST

कुणाल खेमू की ‘वाइब’ कॉमेडी और स्पाई-थ्रिलर का मिश्रण है। पहला हाफ हंसाता है, लेकिन दूसरे हाफ की खिंची कहानी, कमजोर संगीत और जरूरत से ज्यादा एक्शन फिल्म का मजा कम कर देते हैं।

kunal khemmu sparsh
कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव। Photo: PRESS KIT
  • फिल्म रिव्यू: वाइब
  • स्टार रेटिंग 2.5/5
  • पर्दे पर: 18/09/2026
  • डायरेक्टर: कुणाल खेमू
  • शैली: स्पाई थ्रिलर और कॉमेडी

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें इसलिए बंध जाती हैं, क्योंकि उनके पीछे पहले से एक ऐसा काम मौजूद होता है जिसने दर्शकों को खूब हंसाया हो। कुणाल खेमू की नई फिल्म ‘वाइब’ भी कुछ ऐसी ही उम्मीद लेकर आती है। फिल्म का माहौल शुरू से हल्का-फुल्का रखा गया है और इसमें कॉमेडी के साथ स्पाई-थ्रिलर का तड़का लगाया गया है। शुरुआती हिस्से में इसकी अजीबोगरीब दुनिया और किरदार ध्यान खींचते हैं। कई जगह हंसी भी आती है और लगता है कि फिल्म अपने अलग अंदाज में आगे बढ़ेगी। लेकिन जैसे-जैसे कहानी बड़े दायरे में जाने लगती है, इसकी पकड़ कमजोर पड़ती जाती है। नतीजा यह कि ‘वाइब’ में मनोरंजन के पल तो हैं, लेकिन यह लगातार उसी स्तर की कॉमेडी नहीं दे पाती, जिसकी उम्मीद कुणाल खेमू से होती है। पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

कहानी और प्लॉट

फिल्म की कहानी हार्दिक के इर्द-गिर्द घूमती है। हार्दिक एक ऐसा शख्स है जिसकी जिंदगी में गंभीरता की जगह लापरवाही और अजीबोगरीब परिस्थितियों ने ले रखी है। उसका अंदाज कुछ ऐसा है कि वह किसी भी सामान्य स्थिति को भी हास्यास्पद बना देता है। उसकी जिंदगी में उसका दोस्त भागीरथ यानी बग्स भी है, जो उससे बिल्कुल अलग व्यक्तित्व रखता है और कई मामलों में उसका सबसे बड़ा सहारा बनकर सामने आता है। हार्दिक की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आता है जब उसे अपनी पुरानी आदतों से बाहर निकलकर सामान्य जिंदगी की ओर लौटना पड़ता है। इसी दौरान उसकी मुलाकात करीना से होती है और कहानी एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी की दिशा में बढ़ती नजर आती है। लेकिन फिल्म यहीं रुकने वाली नहीं है।

एक ऐसी घटना हार्दिक की पूरी जिंदगी का रास्ता बदल देती है, जिसके बाद वह एक खुफिया एजेंसी के संपर्क में आ जाता है। एजेंसी की कमान मैडम एच के हाथों में है। इसके बाद बग्स भी इस पूरे मामले का हिस्सा बन जाता है और दोनों ऐसे मिशन में फंस जाते हैं, जिसके बारे में उन्होंने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा। फिल्म का शुरुआती हिस्सा इसी अजीब जोड़ी और उनकी परिस्थितियों से कॉमेडी निकालता है। हार्दिक और बग्स को एक्शन और जासूसी की दुनिया में डालना फिल्म का दिलचस्प विचार है। समस्या तब शुरू होती है जब कहानी अपनी छोटी और मजेदार दुनिया से निकलकर बहुत बड़े स्तर की राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साजिशों तक पहुंच जाती है। यहीं फिल्म की कहानी थोड़ी बिखरने लगती है। जो चीज पहले सहज और मजेदार लग रही थी, वह बाद में जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस होती है। फिल्म कई आइडिया एक साथ इस्तेमाल करना चाहती है, लेकिन हर आइडिया को पर्याप्त जगह नहीं मिलती।

पहले हाफ में ज्यादा मजा

‘वाइब’ का पहला हाफ फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। यहां कहानी का अंदाज हल्का है और दर्शक किरदारों के साथ आसानी से जुड़ता है। हार्दिक की हरकतें, बग्स की प्रतिक्रियाएं और दोनों के बीच की केमिस्ट्री कई जगह फिल्म को मजेदार बनाती है। फिल्म की कॉमेडी हमेशा जोरदार नहीं है, लेकिन इसकी कोशिश साफ दिखाई देती है। छोटे-छोटे रेफरेंस, पुराने लोकप्रिय फिल्मों और सितारों के नामों का इस्तेमाल और कुछ वन-लाइनर्स माहौल को हल्का बनाए रखते हैं। कई जगह फिल्म खुद अपनी कहानी की बेवकूफी को स्वीकार करती हुई नजर आती है और यही इसका आकर्षण भी है। हार्दिक का किरदार भी शुरुआत में दिलचस्प लगता है। वह कोई पारंपरिक हीरो नहीं है, बल्कि ऐसा इंसान है जो परिस्थितियों से लड़ने के बजाय कई बार उनसे बचने की कोशिश करता है। इसी वजह से जब वह जासूसी की दुनिया में पहुंचता है तो उसके रिएक्शन कॉमेडी पैदा करते हैं।

दूसरे हाफ में बिगड़ता संतुलन

फिल्म की असली समस्या इंटरवल के बाद शुरू होती है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसमें नए मोड़, बड़े खतरे और एक्शन बढ़ता जाता है। एक समय तक यह बदलाव दिलचस्प लगता है, लेकिन जल्द ही फिल्म पर जरूरत से ज्यादा चीजें डालने का असर दिखने लगता है। स्पाई मिशन के साथ आतंकवाद, तकनीक, AI और अंतरराष्ट्रीय स्तर की साजिशों को जोड़ने की कोशिश की गई है। विचार के स्तर पर यह सब एक कॉमेडी स्पाई-थ्रिलर को बड़ा बनाने का तरीका हो सकता था, लेकिन यहां कई चीजें सतही लगती हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि उसे अपनी कॉमेडी पर भरोसा करना है या एक बड़े स्तर की एक्शन फिल्म बनना है। दूसरे हाफ में कहानी ज्यादा गंभीर और बड़े पैमाने की होने लगती है, जबकि दर्शक अब तक इसके मजेदार और बेतुके अंदाज के साथ सहज हो चुका होता है। थाइलैंड वाला हिस्सा भी फिल्म की गति को प्रभावित करता है। कहानी को अंतरराष्ट्रीय लोकेशन और बड़े मिशन का स्केल तो मिल जाता है, लेकिन मनोरंजन की रफ्तार पहले जैसी नहीं रहती। कई सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा लंबे महसूस होते हैं।

कुणाल खेमू का निर्देशन

निर्देशक के तौर पर कुणाल खेमू के पास आइडिया की कमी नहीं है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में उनका विजन साफ नजर आता है। वह ऐसे किरदारों और परिस्थितियों से कॉमेडी निकालना चाहते हैं, जिनमें खुद एक तरह की अजीबता है। ओपनिंग से लेकर किरदारों के परिचय तक फिल्म का ट्रीटमेंट दर्शाता है कि खेमू ने इसे पारंपरिक कॉमेडी बनाने की कोशिश नहीं की है। उनकी कहानी में पॉप कल्चर रेफरेंस हैं, व्यंग्य है और जानबूझकर रखा गया बेतुकापन भी है, लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी कमी यही है कि खेमू फिल्म को नियंत्रित नहीं रख पाते। कहानी में कई विचार एक साथ आते जाते हैं और फिल्म का टोन बार-बार बदलता है। एक तरफ यह खुद को हल्के अंदाज में पेश करती है, वहीं दूसरी तरफ बड़े एक्शन और स्पाई ड्रामा का भार उठाने लगती है। क्लाइमेक्स की ओर बढ़ते हुए यह बदलाव और ज्यादा साफ दिखाई देता है। एक्शन को बड़ा और हीरो को ज्यादा प्रभावशाली दिखाने की कोशिश में फिल्म अपनी शुरुआती सहजता खो देती है। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा भव्य और लंबे लगते हैं। अगर निर्देशक कहानी के हास्य पक्ष पर ज्यादा भरोसा रखते और दूसरे हाफ को थोड़ा छोटा रखते तो फिल्म का असर बेहतर हो सकता था।

कुणाल खेमू ने संभाली कमान

अभिनेता के तौर पर कुणाल खेमू फिल्म का सबसे भरोसेमंद हिस्सा हैं। हार्दिक के किरदार में वह उस तरह की कॉमिक टाइमिंग लेकर आते हैं, जो उनके पिछले कामों में भी देखने को मिली है। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन, डायलॉग बोलने का अंदाज और परिस्थितियों में फंसने के बाद उनकी प्रतिक्रियाएं फिल्म को कई बार बचा लेती हैं। हालांकि समस्या यह भी है कि उनकी कुछ हरकतें और कॉमिक अंदाज नए नहीं लगते। दर्शक को उनके पुराने किरदारों की झलक महसूस होती रहती है। फिर भी फिल्म को अंत तक खींचने में खेमू का बड़ा योगदान है।

स्पर्श श्रीवास्तव ने छोड़ी छाप

बग्स के किरदार में स्पर्श श्रीवास्तव फिल्म के सरप्राइज पैकेज हैं। उनका किरदार शुरुआत में जितना साधारण दिखाई देता है, स्पर्श श्रीवास्तव अपनी बॉडी लैंग्वेज और छोटे-छोटे रिएक्शंस से उसे मजेदार बना देते हैं। कई बार सीन में कोई खास कॉमेडी नहीं होती, लेकिन Sparsh का रिएक्शन ही मुस्कान ले आता है। कुनाल के मुकाबले उनका अभिनय कम बनावटी महसूस होता है और दोनों की जोड़ी फिल्म को जरूरी कॉमिक बैलेंस देती है।

प्रीति जिंटा और बाकी कलाकार

प्रीति जिंटा को मैडम एच के रूप में एक अलग तरह का किरदार मिला है। वह सख्त और प्रभावशाली स्पाई बॉस के अंदाज में नजर आती हैं और उन्हें कुछ ऐसे पल भी मिलते हैं जहां वह फिल्म की ऊर्जा बढ़ाती हैं। उनका एक्शन सीक्वेंस भी फिल्म के बेहतर हिस्सों में शामिल है, लेकिन कहीं-कहीं वो ओवरडू करती नजर आई हैं। हालांकि उनके किरदार को लेकर लिखा गया कुछ हास्य और महिला सशक्तिकरण से जुड़े संकेत बहुत गहरे नहीं उतरते। थाइलैंड वाला हिस्सा भी उनके किरदार के साथ कुछ ज्यादा प्रभावशाली नहीं बन पाया। वंशिका धिर फिल्म में ग्लैमर और रोमांटिक एंगल को संभालती हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है, लेकिन किरदार में अभिनय की गुंजाइश सीमित रखी गई है। उनका उच्चारण भी कई जगह स्वाभाविक नहीं लगता। यशपाल सिंह और दिनेश लाल यादव यानी निरहुआ अपनी-अपनी भूमिकाओं में ठीक हैं। शर्मिला टैगोर की छोटी-सी मौजूदगी फिल्म में एक प्यारा सरप्राइज देती है, लेकिन उनका किरदार बहुत कम समय के लिए आता है।

क्या नहीं किया काम?

‘वाइब’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबाई और दूसरे हाफ की खिंचावट है। फिल्म जब अपनी कॉमेडी वाली दुनिया में रहती है, तब यह ज्यादा सहज लगती है। जैसे ही यह खुद को बड़े स्पाई-एक्शन ड्रामा में बदलने लगती है, कहानी की गति और हास्य दोनों कमजोर पड़ते हैं। रोमांटिक ट्रैक भी कुछ जगह कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय रोकता हुआ महसूस होता है। गाने फिल्म की रफ्तार को खास सहारा नहीं देते। कुछ म्यूजिक नंबर ऐसे लगते हैं जिन्हें कहानी में जगह देने की बजाय सिर्फ माहौल बनाने के लिए जोड़ा गया है। एक्शन सीक्वेंस बड़े जरूर हैं, लेकिन हर जगह कहानी की जरूरत के मुताबिक नहीं लगते। खासकर अंतिम हिस्से में फिल्म का जरूरत से ज्यादा मसाला उसकी शुरुआती कॉमेडी को पीछे छोड़ देता है। फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन और लोकेशन अच्छे हैं। सिनेमैटोग्राफी भी ठीक काम करती है। लेकिन अच्छी लोकेशन और बड़ा स्केल कहानी की कमजोरियों को पूरी तरह नहीं ढक पाते। एडिटिंग में भी दूसरे हाफ में कसावट की कमी महसूस होती है।

फाइनल वर्डिक्ट

‘वाइब’ में एक अच्छी कॉमेडी स्पाई-फिल्म बनने का आइडिया जरूर है। कुणाल खेमू का कॉमिक अंदाज, स्पर्श श्रीवास्तव की सहज एक्टिंग और प्रीति जिंटा के कुछ मजेदार पल फिल्म को पूरी तरह निराशाजनक नहीं बनने देते। शुरुआत में फिल्म हल्की-फुल्की मस्ती के साथ दर्शकों को जोड़ भी लेती है, लेकिन फिल्म का दूसरा हिस्सा उसकी सबसे बड़ी परेशानी बन जाता है। कहानी जरूरत से ज्यादा बड़ी होने की कोशिश करती है और इसी चक्कर में वह उस चीज को खो देती है, जो इसे सबसे अलग बना सकती थी- इसका बेतुका और बेफिक्र हास्य। अगर आप कुणाल खेमू की कॉमेडी और हल्की-फुल्की टाइमपास फिल्मों के प्रशंसक हैं तो ‘वाइब’ में कुछ अच्छे पल मिल सकते हैं। लेकिन अगर आप लगातार मजबूत कॉमेडी और टाइट स्पाई-थ्रिलर की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो फिल्म उतना असर नहीं छोड़ती। कुल मिलाकर ‘वाइब’ में हंसाने की कोशिश भरपूर है, कुछ जगह हंसी भी आती है, लेकिन पूरी फिल्म का मजेदार मूड कायम नहीं रह पाता। अच्छे आइडिया और कलाकारों के बावजूद बिखरी हुई कहानी और खिंचा हुआ दूसरा हाफ इसे औसत से ऊपर नहीं जाने देते।

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