Middle East में जारी जंग की वजह से जहां पूरी दुनिया ईंधन की सप्लाई बाधित होने या उसकी कमी से जूझ रही है तो वहीं कच्चा तेल एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। विश्लेषकों ने अनुमान जताया है कि बड़ी तेल कंपनियां इस क्वार्टर में भारी-भरकम प्रॉफिट कमा लेंगी। इसका कारण यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने पेट्रोलियम की सप्लाई को बाधित किया है, विश्व भर के कंज्यूमर्स को ईंधन के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। इस आर्टिकल में समझिए कि कैसे ऑयल एक्सपोर्ट कंपनियां मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के दौरान भारी मुनाफा कमाने में कामयाब रही हैं।
होर्मुज ब्लॉक होने के कारण तेजी से बढ़े कच्चे तेल के दाम
दरअसल अब अपने छठे माह में पहुंच गए इस संघर्ष की वजह से Strait of Hormuz से होने वाली ज्यादातर समुद्री आवाजाही ठप हो गई। इस संकरे जलमार्ग से संघर्ष शुरू होने के पहले विश्व के कुल तेल और प्राकृतिक गैस का करीब 20 फीसदी निकलता था। लेकिन अब ग्लोबल क्रूड सप्लाई सीमित होने से अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मार्च, अप्रैल और मई के ज्यादातर वक्त 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रही और एक समय तो यह 126 डॉलर प्रति बैरल तक हो गई थी।
तेल कंपनियों ने ऊंची कीमत पर बेचा क्रूड ऑयल
इसका परिणाम यह हुआ कि विश्व की कुछ सबसे बड़ी पब्लिकली ट्रेडेड तेल कंपनियों का प्रॉफिट बढ़ गया, क्योंकि वे पेट्रोलियम ऊंची कीमतों पर बेचने में कामयाब रहीं। अमेरिका की बड़ी तेल और गैस कंपनियां Exxon Mobil और Chevron जल्दी ही दूसरे क्वार्टर के वित्तीय नतीजे घोषित करने वाली हैं। दरअसल, संघर्ष के दौरान पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन के दाम में बढ़ोतरी हुई, जिससे सड़क पर वाहन चलाने और हवाई यात्रा का खर्च भी बढ़ गया। कुछ देशों में पेट्रोलियम की सप्लाई इतनी कम हो गई कि ऑस्ट्रेलिया में तो बीच-बीच में ईंधन के लिए राशनिंग करनी पड़ी, जबकि नेपाल और श्रीलंका में तो सरकारी दफ्तरों को बंद करना पड़ा।
तेल कंपनियों ने कमाया 43 फीसदी ज्यादा मुनाफा
पर्यावरण संबंधी मुद्दों की जांच करने वाले नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन Global Witness के मुताबिक, यूरोप की 6 सबसे बड़ी ऑयल कंपनियों ने पहले क्वार्टर में कुल 22 अरब अमेरिकी डॉलर यानी 2 लाख 9 हजार करोड़ भारतीय रुपये से ज्यादा का लाभ कमा लिया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 43 प्रतिशत ज्यादा था।
विश्व में कुछ ऐसे सेक्टर हैं जिनके लिए यह संकट बहुत फायदेमंद साबित हुआ है और ऑयल प्रॉड्यूसिंग कंपनियां उनमें से एक हैं। इसकी तुलना जब आप उन करोड़ों लोगों से करते हैं जो लगातार बिजली कटौती, राशनिंग, उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा और भोजन के लिए लंबी कतारों जैसी समस्याओं से परेशान रहे हैं, जिसका प्रभाव खाने के सामानों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, तो हमें नहीं लगता कि पूरे विश्व के लिए यह कीमत चुकाना उचित है: ग्लोबल विटनेस में जीवाश्म ईंधन के मामलों के प्रमुख Patrick Galey
जंग के दौरान हुए अतिरिक्त मुनाफे पर टैक्स का प्रस्ताव
जान लें कि एक्सॉन और शेवरॉन जैसी एनर्जी कंपनियां अमेरिका में क्रूड ऑयल का दाम तय नहीं करतीं। दरअसल, कीमतें डिमांड और सप्लाई के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर करती हैं कि बिजनेसमैन, रिफाइनरियां और अन्य खरीदार इसके लिए कितना भुगतान करने को तैयार हैं। इसी वजह से दूसरे क्वार्टर के दौरान, अमेरिकी क्रूड ऑयल की कीमत 68 डॉलर से बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
तेल कंपनियों के मुनाफे पर टैक्स वाला बिल लाए डेमोक्रेट
इसके बावजूद, अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट पार्टी के सांसदों ने मार्च में ऐसे बिल पेश किए, जिनमें प्रपोजल दिया गया कि 2026 से आगे बड़ी तेल कंपनियों की तरफ से कमाए गए अतिरिक्त मुनाफे पर टैक्स लगाया जाए और उससे मिलने वाला राजस्व कंज्यूमर्स में बांटा जाए। रोड आईलैंड से डेमोक्रेट सीनेटर Sheldon Whitehouse, जिन्होंने सीनेट में इस बिल पेश किया, ने कहा, "बच्चों के फूड प्रोग्राम में कटौती करने की जगह असाधारण रूप से कमाए गए अतिरिक्त मुनाफे पर 'विंडफॉल प्रॉफिट टैक्स' लगाना कहीं ज्यादा न्यायसंगत है।'' उधर, खाड़ी देश इस प्लान पर काम कर रहे हैं कि ईरान के होर्मुज बंद करने के बावजूद तेल नहीं रुके, वह पाइपलाइन के जरिए स्ट्रेट को बाईपास करने की योजना बना रहे हैं।
(इनपुट- AP)