तिरुपति मंदिर के 'श्रीवारी लड्डू प्रसाद' के पूरे हुए 311 साल, आज भी बरकरार है वही स्वाद
तिरुपति मंदिर के 'श्रीवारी लड्डू प्रसाद' के पूरे हुए 311 साल, आज भी बरकरार है वही स्वाद
तिरुपति बालाजी मंदिर के प्रसिद्ध श्रीवारी लड्डू को आज पूरे 311 साल हो गए हैं। पहला लड्डू 2 अगस्त 1715 को पुराने किचन में मोटी बूंदी से बनाकर भगवान को चढ़ाया गया था।
Published : Aug 02, 2026 08:06 pm IST, Updated : Aug 02, 2026 08:06 pm IST
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श्रद्धा और मन में अटूट विश्वास लिए, जब कोई भक्त तिरुपति बालाजी मंदिर के दर्शन करने पहुंचता है, तो उसे सिर्फ भगवान का आशीर्वाद ही नहीं मिलता, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का वह पावन प्रसाद भी मिलता है, जिसके एक-एक दाने में इतिहास की खुशबू रची-बसी है। दुनिया के सबसे अमीर इस मंदिर के प्रसिद्ध श्रीवारी लड्डू को आज पूरे 311 साल हो गए हैं।
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पहला लड्डू 2 अगस्त 1715 को पुराने किचन में मोटी बूंदी से बनाकर भगवान को चढ़ाया गया था। तीन सौ साल बीत जाने के बाद भी इस प्रसाद का स्वाद और बनाने का तरीका आज भी वैसा ही है।
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तिरुपति मंदिर के इस खास लड्डू को प्रसादम, श्रीवारी लड्डू और नैवेद्यम तीनों रूपों में जाना जाता है। भगवान को अर्पित करने के बाद यह प्रसाद और श्रीवारी लड्डू कहलाता है, जबकि भोग के संदर्भ में इसे नैवेद्यम भी कहते हैं।
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तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के अनुसार, मंदिर में हर दिन करीब 4.08 लाख लड्डू बनाए जाते हैं। खास त्योहारों और उत्सवों के दौरान यह संख्या बढ़कर 8 से 10 लाख तक पहुंच जाती है।
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लड्डू बनाने वाले मुख्य कारीगरों और अन्य कर्मचारियों को मिलाकर किचन में कुल 600 से ज्यादा लोग काम करते हैं। लड्डू बनाते समय वैष्णव ब्राह्मण लगातार 'ॐ नमो वेंकटेशाय' का जाप और पवित्र वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं।
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यह पवित्र प्रसाद दिनभर में 20 घंटे, तीन अलग-अलग शिफ्टों में तैयार किया जाता है।
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अब लड्डू में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की शुद्धता जांचने के लिए AI मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है।
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आज भी पुराने किचन में चूल्हे पर बेसन गर्म करके ये खास खास लड्डू बनाए जाते हैं।