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देवीधुरा में हर साल रक्षा बंधन पर होता है बग्वाल युद्ध

 Written By: Nahid Khan
 Published : Aug 30, 2015 05:45 pm IST,  Updated : Aug 30, 2015 05:46 pm IST

चम्पावत:  उत्तराखंड के चम्पावत ज़िले के देवीधुरा में खेला जाने वाला पाषाण युद्ध ( पत्थर युद्ध ) इस बार फलों के साथ पत्थरो से भी खेला गया ,देवीधूरा के मॉ बाराही धाम में प्रतिवर्ष रक्षा बंधन के पर्व पर बग्वाल युद्

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देवीधुरा में हर साल रक्षा बंधन पर होता है बग्वाल युद्ध

चम्पावत:  उत्तराखंड के चम्पावत ज़िले के देवीधुरा में खेला जाने वाला पाषाण युद्ध ( पत्थर युद्ध ) इस बार फलों के साथ पत्थरो से भी खेला गया ,देवीधूरा के मॉ बाराही धाम में प्रतिवर्ष रक्षा बंधन के पर्व पर बग्वाल युद्ध होता है।सदियों से चली आ रही इस परम्परा को आम सहमति से दो साल पहले पत्थरो के स्थान पर बदल कर फलो से किया गया था। इस बार बग्वाल फलो के साथ पत्थरो से भी संपन्न हुआ।

बग्वाल 9 मिनट तक चला। इस रोमांचक और अनोखी परम्परा को देखने लाखो के संख्या में दर्शको ने आनंद लिया।  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत विशेष रूप से इस बग्वाल में शिरकत करने आये थे। पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने इस बग्वाल को देखा है। पोराणिक रूप से यह माना जाता है है कि आज ही के दिन चार खामों योद्धा बाराही मां के पूजा के बाद युद्ध के लिए मैदान में उतरते है,इन योद्धाओ के रक्त बहने से माँ बाराही प्रसन्न होती है होती है।

इस युद्ध को देखने के लिए देशभर से हज़ारो श्रद्धालु यहाँ पहुँचते है। इस पाषाण युद्ध के बारे में कहा जाता है कि सदियों पहले हर साल एक व्यक्ति की बलि दी जाती थी। लेकिन जब एक विघवा स्त्री के इकलौते पुत्र के बलि देने की बारी आई तो उसने अपने पुत्र की बलि पर मां बाराही के दरबार में गुहार लगाई कि उसके इकलौते पुत्र के प्राणों को बक्शा जाये। इसके बाद मां ने उसके इकलौते पुत्र को अभय दान तो दे दिया। लेकिन एक शर्त ये रख दी कि अगर चारों खाम एक व्यक्ति के बराबर खून बहायेगें तो उसकी ये मुराद पूरी हो सकती है। तभी से यह परम्परा चली आ रही है।  

देवीधूरा के मॉ बाराही धाम में प्रतिवर्ष रक्षा बंधन के पर्व पर बग्वाल पाषाण युद्ध होता है। मंदिर परिसर में चार खामों और सात थोकों के योद्धा भाग लेने पहुँचते हैं, जो एक दूसरे को पत्थर से मार कर रक्त बहाते थे। मान्यताओं के अनुसार योद्धा तब तक लड़ते है, जब तक उन सबके शरीर से एक व्यक्ति के बराबर खून नहीं निकल जाता। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को आम सहमति के बदल तो दिया गया है, जिससे यहाँ पहुंचे योद्धाओं को ज्यादा नुक्सान न हो लेकिन फिर भी पत्थर चल ही जाते है। 

युद्ध में चार खाम वाली, चमियाल, गडवाल और बिष्ट खाम होते है, जो समीप के क्षेत्र से यहाँ पहुँचते हैं। इस बार भी पचास से ज़्यादा योद्धा बग्वाल में चोटिल हुए। जिनका उपचार किया गया। हालांकि योद्धा अपने बचाव के लिए बॉक्स से बने सुरक्षा कवच का इस्तेमाल करते है,फिर भी पथरो की बौछार से छोटे लग ही जाती है। इस चोटो का श्रद्धा के सामने कोई दर्द नहीं होता सिर्फ माँ बाराही देवी के जयकारे लगते है। 

 

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