नई दिल्ली: जाति-पाति, छुआछूत, लैंगिक और सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए शिक्षा से अचूक हथियार शायद कोई नहीं है। लेकिन शिक्षा के मंदिर में ही अगर बच्चों को जात-पात के पाठ पढ़ाए जा रहे हों, तो इसको आप क्या कहेंगे। बताया जाता है कि तमिलनाडु के तिरुनेलवल्ली जिले के सरकारी स्कूलों में कुछ ऐसा ही हो रहा है।
यहां बच्चों के यूनिफॉर्म उनकी एकरूपता नहीं, बल्कि उनकी जाति दर्शाती है। यहां के छात्र अपनी कलाई, माथे, गर्दन और कमीज पर अलग-अलग रंगों के पट्टे लगाते हैं जो हर एक अलग जाति का निशान हैं। यह बात जिले के शिक्षा अधिकारियों की जानकारी में पिछले कई सालों से है।
कुछ साल पहले जब दलित समुदाय के कुछ विद्यार्थियों ने इसका विरोध किया, तो उन्हें स्कूल छोड़ने पर मजबूर किया गया। इस भेदभाव पर प्रतिबंध इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि छात्रों ने कई तरह के गुप्त कोड बना लिए हैं। कलाई पर बंधने वाले पूजा के धागे से माथे पर लगने वाले तिलक तक में जाति के रंग का ध्यान रखा जाता है।
कई तरह के कोड
जाति रंग
थेवर (ओबीसी) पीला-लाल
नादर (ओबीसी) नीला-पीला
यादव (ओबीसी) भगवा
पल्लर (दलित) लाल-हरा
तिरूनेलवेली के पास ही स्थित एक स्कूल के प्रिंसिपल ने अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्स्प्रेस को बताया कि 'शहर के स्कूलों में अलग हाउस होते हैं, जैसे कि हरा घर, पीला घर। यहां बच्चे रंगीन पट्टे पहनते हैं। हम हर चीज़ पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते, स्कूली बच्चे किस रंग का पट्टा पहन लें, इसपर तो बिल्कुल प्रतिबंध नहीं लगा सकते। ये पट्टे तथाकथित रूप से बास्केटबॉल के एक खेल में जाति के आधार पर आसानी से टीम बांटने में काम आते हैं। इन स्कूलों में एक गाना भी कई बार छात्रों के बीच जातिगत तनाव भड़का सकता है।
यहां के जिला कलेक्टर एम.करुणाकरन ने बताया कि एक पुलिस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि अलग-अलग जातियों के लिए तय रंगों के पट्टे के कारण विद्यार्थियों की जाति की आसानी से पहचान हो जाती है और इसलिए छात्रों के बीच जातिगत हिंसा के मामले काफी बढ़ रहे हैं।
करुणाकरन ने बताया कि इसके बाद ही उन्होंने इन पट्टों और इस तरह की अन्य चीजें, जिनसे जाति की पहचान होती है, पर प्रतिबंध लगा दिया था। पुलिस ने भी इस मामले में जिला प्रशासन से मदद मांगी थी। करुणाकरन ने बताया, 'न केवल स्कूल, बल्कि कॉलेज प्रशासन के अधिकारियों को भी हमने उस मीटिंग में बुलाया था, जहां हमने इस प्रतिबंध के बारे में फैसला सुनाया।'