नई दिल्ली: “हाथ में किताब देख अब मज़हब बता रहे हैं लोग, नफरत में न जाने औरों को क्या क्या सिखा रहे हैं लोग।” देश में बीते दिनों असहिष्णुता पर लंबी चौड़ी बहस हो चुकी है, तमाम तर्क-कुतर्क के बाद एक व्यक्ति को मुजरिम (मीडिया में) भी ठहरा दिया गया, और वजह ज़ाहिर है उसका मज़हब था। सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहस भले ही टीवी न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों में हो लेकिन इसका जनमानस पर क्या असर पड़ता है ये बानगी हम आजकल रोज़ाना देख-सुन रहे हैं। ये बातें हमें चौंकाती हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है Perception is stronger than reality यानी सच्चाई पर सोच भारी। यह हमारे समाज की एक ऐसी हक़ीक़त है जो कई समस्याओं की जड़ है। हम आपको हाल ही की दो ऐसी घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जिसे पढ़ और देखकर आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि हमें क्या हो रहा है।
पहली घटना:
अपनी फ़ेसबुक पोस्ट पर सोमाया नाम की एक लड़की ने पोस्ट कर बताया कि उसके एक दोस्त को मेट्रो में सिर्फ इसलिए पाकिस्तानी बता दिया गया क्योंकि उसके हाथ में जश्न-ए-रेख़्ता यानी उर्दू की एक किताब थी। हाथ में उर्दू की किताब थामें एक लड़के के बारे में जिस पैमाने पर लोगों ने उसके मजहब का आंकलन कर लिया वो हैरान करने वाला है। हो सकता है कि ऐसी घटनाएं अक्सर होती हों लेकिन वो सामने नहीं आती। मगर इसे किसी लिहाज से सही नहीं कहा जा सकता है।
दूसरी घटना:
बुधवार को भारत और बांग्लादेश के बीच एशिया कप के पहले मैच की कमेंट्री एफ़एम रेडियो पर चल रही थी। भारत ने एक ख़राब स्थिति से उबरते हुए 166 रन का लक्ष्य रख दिया। इस अंतराल के दौरान रेडियो जॉकी देश भर से आ रहे कॉल्स ले रहा था और उनसे टीम इंडिया की जीत की संभावना पर राय जान रहा था। इसी बीच श्रीनगर से मुश्ताक अहमद नाम के एक एक शख़्स का फ़ोन आया जिसने अपने परिचय देने के बाद कहा ‘’भारत बहुत अच्छा खेला, इंशाअल्लाह जीतेगा भी। दिलचस्प बात ये है कि इस एंकर ने पहले तो कहा कि आपका नाम से एक पाकिस्तानी खिलाड़ी का नाम याद आता है। यहां तक तो फिर भी ठीक था...चलो मौक़ा क्रिकेट का है और अगर कोई ऐसा नाम आ जाए तो बरबस किसी अन्य देश के खिलाड़ी का नाम ज़हन में आ जाना लाज़मी है। लेकिन हद तो तब हो गई जब इस एंकर ने अगला सवाल किया कि जब भारत जीतता है तो आपको कैसा लगता है? ये मुख़तसिर से बातचीत तो मुश्ताक़ के इस जवाब से ख़त्म हो गई कि ‘’जी, बहुत ख़ुशी होती है” लेकिन एक सवाल था जो पूरे मैच के दौरान ज़हन में दस्तक देता रहा कि आख़िर इस सवाल का औचित्य था....?