नई दिल्ली: सियाचिन में मौत को मात देकर लौटे हनुमंथप्पा आखिर जिंदगी की जंग हार गए। दिल्ली के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में हनुमंथप्पा का निधन हो गया। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। सीटी स्कैन से पता चला था कि उनके मस्तिष्क को ऑक्सीजन की सप्लाई पर गहरा असर पड़ा है। उनके शरीर के तमाम अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। हनुमंथप्पा 6 दिन तक बर्फ में दबे रहे थे जबकि उनके बाकी 9 साथियों को बचाया नहीं जा सका था।
हनुमानथप्पा छह दिन तक सियाचिन ग्लेशियर में बर्फ के नीचे दबे रहे थे। 150 से ज्यादा सैनिकों और दो खोजी श्वानों- डॉट तथा मीशा के दल ने कोप्पाड को 20,500 फुट की उंचाई पर सियाचिन ग्लेशियर में बर्फ के नीचे से निकाला गया था। उन्हें वायु सेना के एक विमान द्वारा यहां लाया गया था जिसके साथ वायु सेना के एक गहन चिकित्सा विशेषज्ञ और सियाचिन आधार शिविर के एक चिकित्सक भी थे। पहले अधिकारियों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था। दिल्ली के आर्मी अस्पताल में उनका इलाज किया जा रहा था। उनके दोनों फेफड़ों में न्यूमोनिया का संक्रमण था। शरीर के कई अंग सही तरीके से काम नहीं कर रहे थे। तमाम कोशिशों और दवाओं के बावजूद हनुमंथप्पा अलविदा कह गए। हनुमंथप्पा की सलामती के लिए पूरे देश ने अपने-अपने तरीके से दुआएं की थीं।
प्रधानमंत्री मोदी ने शोक जताया
हनुमनथप्पा की मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि हनुमनथप्पा हमें उदास और व्यथित छोड़ गए हैं। मोदी ने ट्वीट किया, वह हमें उदास और व्यथित छोड़ गए हैं। लांस नायक हनुमनथप्पा की आत्मा को शांति मिले। आपके अंदर जो सैनिक था वह अमर है। हमें गर्व है कि आप जैसे शहीदों ने भारत की सेवा की। 19 बटालियन के मद्रास रेजिमेंट के 33 वर्षीय सैनिक अपने पीछे पत्नी महादेवी अशोक बिलेबल और दो वर्षीय बेटी नेत्रा कोप्पड़ को छोड़ गए हैं। कर्नाटक के धरवाड़ जिला में बेतादुर गांव के रहने वाले हनुमनथप्पा 13 साल पहले सेना में शामिल हुए थे।