Highlights
- 124 पूर्व IAS, IFS और अन्य अधिकारियों ने चुनाव आयोग का समर्थन कर SIR को जरूरी बताया।
- बिहार में SIR के दौरान 22 लाख मृत मतदाताओं और सात लाख दोहरी प्रविष्टियों की पहचान का दावा।
- 'सवाल करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन आरोप साबित करने की जिम्मेदारी आरोप लगाने वाले की है।'
नई दिल्ली: चुनाव में धांधली और वोटों की गड़बड़ी के आरोपों के बीच 124 पूर्व IAS, IFS और अन्य सेवाओं के अधिकारियों ने चुनाव आयोग का समर्थन किया है। इन पूर्व अफसरों ने खुला पत्र जारी कर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव में गड़बड़ी के आरोप ठोस सबूतों के आधार पर लगाए जाने चाहिए। पत्र में बिहार विधानसभा चुनाव 2025, मतदाता सूची में सुधार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए किए गए उपायों का भी जिक्र किया गया है। बता दें कि इसके पहले 42 पूर्व जजों ने भी एक ओपेन लेटर लिखा था।
पूर्व अफसरों ने चुनाव आयोग के समर्थन में क्या कहा?
नई दिल्ली में जारी इस ओपेन लेटर में 124 पूर्व अधिकारियों ने भारतीय निर्वाचन आयोग यानी कि ECI का बचाव करते हुए कहा कि देश की चुनावी व्यवस्था में समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। पहले बूथों पर कब्जा, मतपेटियों में फर्जी वोट डालने और चुनाव के दौरान हिंसा जैसी समस्याएं देखने को मिलती थीं। अब चुनाव प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए कई इंतजाम किए गए हैं। पूर्व अधिकारियों ने कहा कि मतदान केंद्रों पर उम्मीदवारों के एजेंटों की मौजूदगी, EVM को सील करना, स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और VVPAT से पर्चियों का सत्यापन जैसे उपाय चुनावी प्रक्रिया की निगरानी में मदद करते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव का दिया हवाला
पत्र में पूर्व अधिकारियों ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया। उन्होंने दावा किया कि इन चुनावों में किसी भी सीट पर दोबारा मतदान कराने की जरूरत नहीं पड़ी और 1951 के बाद सबसे ज्यादा मतदान दर्ज किया गया। अधिकारियों के मुताबिक, यह चुनाव प्रबंधन में सुधार और संस्थागत सुरक्षा उपायों की मजबूती को दिखाता है। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया का मूल्यांकन तथ्यों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर।
जीतने पर व्यवस्था ईमानदार और हारने पर धांधली?
पूर्व अधिकारियों ने अपने पत्र में लिखा,
'कोई व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती जो आपके जीतने पर ईमानदार हो और हारने पर धांधली वाली बन जाए।'
उन्होंने कहा कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी इसी चुनाव आयोग के तहत कई विधानसभा चुनाव हार चुकी है। पत्र में 2024 के लोकसभा चुनाव का भी जिक्र किया गया। अधिकारियों ने कहा कि उस चुनाव में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी थी। उनके मुताबिक, इन उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए चुनावी धांधली के आरोपों पर ठोस सबूतों के साथ चर्चा होनी चाहिए।
SIR को क्यों जरूरी बता रहे हैं पूर्व अधिकारी?
पूर्व अफसरों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को जरूरी प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना है। इसके तहत मृत मतदाताओं के नाम, एक से ज्यादा जगह दर्ज नाम और स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों की जानकारी की जांच की जाती है। चिट्ठी के मुताबिक, मतदाता सूची में गलतियां रहने से किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर वोट डालने यानी फर्जी पहचान के इस्तेमाल की आशंका बढ़ सकती है। इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसलिए अधिकारियों ने मतदाता सूची की नियमित जांच और सुधार को जरूरी बताया।
बिहार में 22 लाख मृत मतदाताओं के पहचान का दावा
पत्र में बिहार की मतदाता सूची के पुनरीक्षण के आंकड़े भी दिए गए। पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में करीब 22 लाख मृत मतदाताओं और सात लाख डुप्लीकेट यानी दोहरी प्रविष्टियों की पहचान की गई। इसके साथ ही लगभग 21.5 लाख नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए। अधिकारियों ने इन आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त रखना जरूरी है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हटने की आशंका को दूर करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
नाम हटाए जाने की आशंका से निपटने के लिए कई प्रावधान
पूर्व अधिकारियों ने कहा कि SIR प्रक्रिया में गलत तरीके से नाम हटाए जाने की आशंका से निपटने के लिए कई प्रावधान हैं। इनमें मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित करना, लोगों को दावा और आपत्ति दर्ज कराने का मौका देना, सुनवाई करना और अपील की व्यवस्था शामिल है। उनके मुताबिक, इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र मतदाताओं को अपने मताधिकार से वंचित न होना पड़े। अधिकारियों ने कहा कि चुनाव सुधारों या प्रशासनिक गलतियों को लेकर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन इनकी जांच तय कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।
'सबूत देना आरोप लगाने वाले की जिम्मेदारी'
पत्र में पूर्व अधिकारियों ने चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को लेकर कहा कि ऐसे दावों के समर्थन में सत्यापित किए जा सकने वाले सबूत होने चाहिए। उन्होंने मतदाता सूची पर आपत्ति दर्ज कराने और हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करने जैसे कानूनी रास्तों का जिक्र किया। उन्होंने कहा,
'सवाल करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन आरोप को साबित करना आरोप लगाने वाले की जिम्मेदारी है।'
अधिकारियों ने चेतावनी दी कि बिना सबूत के लगाए गए आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया में लोगों का भरोसा कमजोर कर सकते हैं।
मतदाता सूची में अपना नाम जांचने की अपील
पूर्व अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की कि वे मतदाता सूची में अपना नाम जरूर जांचें। उन्होंने कहा कि लोग अपने परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों और दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों को भी मतदाता सूची में नाम की पुष्टि करने में मदद करें। पत्र में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) और दूसरे चुनाव कर्मचारियों की भूमिका की भी सराहना की गई। ये अधिकारी मतदाता सूची को अपडेट रखने और जरूरी बदलाव करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
चुनावी संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने की अपील
पूर्व सिविल सेवकों ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करना जरूरी है। चुनाव सुधारों और प्रशासनिक गलतियों की जांच उचित प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि व्यापक और बिना सबूत वाले आरोप चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर कर सकते हैं। पत्र के अंत में अधिकारियों ने राजनीतिक दलों और नागरिकों से चुनावी निष्पक्षता पर तथ्यों के आधार पर बहस करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। (ANI से इनपुट्स के साथ)
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