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95% एनिमल स्टडीज इंसानी ट्रायल में हो जाती हैं फेल, लैब में क्यों झोंके जा रहे बेजुबान? PETA की अंजना अग्रवाल ने उठाए सवाल

 Written By: Niraj Kumar
 Published : Nov 02, 2026 06:54 pm IST,  Updated : Nov 02, 2026 07:02 pm IST

PETA में साइंटिस्ट एंड रिसर्च पॉलिसी एडवाइजर अंजना अग्रवाल ने सरकार के प्रस्तावित ड्राफ्ट में कई खामियां गिनाई। उन्होंने सरकार से ड्राफ्ट को मंजूरी नहीं देने की अपील की।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश भर में लैब्स में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर नए नियमों का प्रस्ताव रखा है। इस संबंध में एक ड्राफ्ट 6 अक्टूबर को जारी किया गया। इसमें कुछ ऐसे बदलाव शामिल हैं जिसे लेकर विवाद हो रहा है। सरकार इसे साइंस रिसर्च में तेजी लाने वाला सुधार बता रही है। जबकि पशु अधिकार संगठन  इसे जानवरों की सुरक्षा और इंडिपेंडेंट मॉनिटरिंग को कमजोर करने वाला कदम बता रहे हैं। यही वजह है कि इस प्रस्ताव पर देश भर में बहस छिड़ी हुई है। इस मुद्दे पर इंडिया टीवी ने अंजना अग्रवाल से बात की जो PETA में साइंटिस्ट एंड रिसर्च पॉलिसी एडवाइजर हैं। उन्होंने प्रस्तावित नियमों की कई खामियां गिनाते हुए सरकार से ड्राफ्ट को मंजूरी नहीं देने की अपील की। उन्होंने एक रिसर्च का हवाला देते हुए कहा कि करीब 95 प्रतिशत स्टडीज इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के स्तर तक पहुंचने पर सफल नहीं हो पातीं। केवल 5 प्रतिशत ही सफल हो पाते हैं।

अंजना अग्रवाल से जब यह सवाल किया गया कि लैब एनिमल्स रूल्स को लेकर प्रस्तावित ड्राफ्ट को लेकर हमें क्यों फिक्र करनी चाहिए? अंजना ने कहा कि अगर यह ड्राफ्ट नोटिफाइड हो गया तो जो भी प्रोटेक्टिव वाइल्ड लाइफ स्पीशीज हैं, जिनको हम डेली देखते हैं, उन्हें एक्सपेरिमेंट्स के उद्देश्य से उठा लिया जाएगा। जितने भी इंस्टीट्यूट रिसर्च करेंगे उनपर कोई रोक-टोक नहीं होगी। वे सेल्फ अप्रूव करेंगे और सेल्फ पुलिसिंग करेंगे। किसी तरह की कोई स्क्रूटनी नहीं होगी।  उन्होंने कहा कि इन जानवरों की मेडिकल हिस्ट्री और पहले से मौजूद स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की जानकारी नहीं होती। ऐसे में इन पर किए गए प्रयोगों से मिलने वाले आंकड़ों की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि इन जानवरों की मेडिकल हिस्ट्री और पहले से मौजूद स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की जानकारी नहीं होती। ऐसे में इन पर किए गए प्रयोगों से मिलने वाले आंकड़ों की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है।

जानवरों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ता है असर

PETA की साइंटिस्ट ने बताया कि लैबोरेटरीज में जानवरों को छोटे पिंजरों में रखा जाता है, जहां उनके प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक व्यवहार की जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। इससे उनमें तनाव, बेचैनी और अवसाद जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर लैबोरेटरीज में रखना उनके लिए बेहद तनावपूर्ण हो सकता है। कई बार जानवर पिंजरों में चक्कर लगाते हैं, खुद को नुकसान पहुंचाते हैं और बाहर निकलने की कोशिश करते हैं।

अंजना के मुताबिक, लैब्स में रोशनी के समय और प्राकृतिक दिन-रात के चक्र में बदलाव से भी जानवरों की सर्केडियन रिदम प्रभावित होती है। इसके अलावा दूसरे जानवरों के साथ सामाजिक संपर्क नहीं होने से उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

प्रयोग के बाद क्या होता है जानवरों का?

अंजना अग्रवाल ने बताया कि कई बार लैबोरेटरी में एक्सपेरिमेंट के दौरान ही मर जाते हैं, जबकि कुछ को एक्सपेरिमेंट खत्म होने के बाद इच्छामृत्यु दे दी जाती है। हालांकि, भारत में नियमों के मुताबिक एक्सपेरिमेंट के बाद जानवरों की देखभाल, पुनर्वास और जहां संभव हो, गोद देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश में इस व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। केंद्रीय पशु प्रयोग नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण समिति (CCSEA) की जिम्मेदारी है कि वह इस संबंध में आंकड़े और जानकारी उपलब्ध कराए, लेकिन ऐसा डेटाबेस सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

इंसानों के लिए कितने उपयोगी हैं जानवरों पर किए गए एक्सपेरिमेंट?

अंजना अग्रवाल ने जानवरों पर होने वाले प्रयोगों की वैज्ञानिक उपयोगिता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने 2024 में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस का हवाला देते हुए दावा किया कि जानवरों पर किए गए प्रयोगों से जुड़ी करीब 95 प्रतिशत स्टडीज इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के स्तर तक पहुंचने पर सफल नहीं हो पातीं। केवल 5 प्रतिशत ही सफल हो पाते हैं।

उन्होंने कहा-'2004 में एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में एक स्टडी पब्लिश हुई थी जिसमें जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि आखिर ऐसे क्या सबूत हैं जो साबित करते हैं कि जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोग इंसानों के लिए फायदेमंद साबित होते हैं। इसके अलावा, साल 2024 में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस में 100 से अधिक स्टडीज का विश्लेषण किया गया। इसमें दावा किया गया कि जानवरों पर किए गए प्रयोगों में से करीब 95 फीसदी स्टडीज मानव क्लीनिकल ट्रायल के चरण तक पहुंचने पर सफल नहीं हो पातीं। यानी केवल करीब 5 फीसदी ही नियामक मंजूरी हासिल करने में सफल होती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जानवरों पर होने वाले प्रयोगों के नतीजे इंसानों के इलाज में अपेक्षित सफलता नहीं दिला पा रहे हैं, तो आखिर अब भी इन प्रयोगों पर निर्भरता क्यों बनी हुई है?'

अंजना ने कहा कि जानवरों और इंसानों की जैविक संरचना में अंतर होने के कारण किसी दवा का जानवरों पर असर इंसानों पर भी वैसा ही होगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि प्रयोग के दौरान जानवरों को होने वाला तनाव भी रिसर्च के आंकड़ों को प्रभावित कर सकता है। 

एनिमल टेस्टिंग के कई विकल्प मौजूद

PETA की साइंटिस्ट अंजना ने कहा कि अब साइंस और टोक्नोलॉजी में इतनी तरक्की हो चुकी है कि कई तरह के एक्सपेरिमेंट्स के लिए जानवरों पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसके लिए ऑर्गन-ऑन-चिप, ऑर्गेनॉइड्स, कंप्यूटेशनल मॉडल, सॉफ्टवेयर सिमुलेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अपने देश में भी कई संस्थानों में नॉन-एनिमल मेथड्स पर काम हो रहा है। मेडिकल एजुकेशन और ट्रेनिंग के क्षेत्र में भी सिमुलेशन मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है। अंजना के मुताबिक, इन तकनीकों को बढ़ावा देकर साइंटिस्ट रिसर्च को जारी रखा जा सकता है और जानवरों को प्रयोगों से बचाया जा सकता है।

दुनिया के कई देश एनिमल टेस्टिंग से दूर जा रहे

अंजना अग्रवाल ने कहा कि भारत ने 2014 में कॉस्मेटिक टेस्टिंग के लिए जानवरों के इस्तेमाल पर बैन लगाकर अच्छी पहल की थी, लेकिन इसके बाद नॉन-एनिमल रिसर्च के क्षेत्र में जो प्रोग्रेस होना चाहिए था वह नहीं पाया। उन्होंने अमेरिका और यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देश अब जानवरों पर प्रयोग की निर्भरता खत्म करने की दिशा में काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने 2035 तक केमिकल टेस्टिंग में स्तनधारी जानवरों के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने कहा कि भारत को भी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना चाहिए। 

अंजना से जब यह पूछा गया कि प्रस्तावित ड्राफ्ट में अगर तीन अहम बदलाव करने को कहा जाए तो वो कौन से तीन बदलाव वो करना चाहेंगी? इस पर अंजना ने कहा- PETA इंडिया चाहता है कि इस ड्राफ्ट को अप्रूव ही नहीं किया जाए। बेहतर होगा कि इसका एक स्ट्रांगर वर्जन बनाया जाए जिसमें हम और उनकी प्रोटेक्शंस को बढ़ा सकें और ज्यादा से ज्यादा नॉन एनिमल मेथड को प्रमोट कर सकें। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रस्ताव में निगरानी की जिम्मेदारी केंद्रीय स्तर की संस्था से हटाकर संस्थागत एनिमल एथिक्स कमेटियों को देने की बात है। इससे संस्थानों के खुद ही अपने प्रयोगों को मंजूरी देने और उनकी निगरानी करने की व्यवस्था बन सकती है। उनके मुताबिक, इससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर पड़ने और मंजूरी की प्रक्रिया महज औपचारिकता बन जाने का खतरा है।

नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

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