1. Hindi News
  2. भारत
  3. राष्ट्रीय
  4. EXCLUSIVE: आजादी से अब तक कितनी ताकतवर हुई भारतीय थल सेना, क्या रहे बड़े टर्निंग प्वाइंट और आगे कैसा होना चाहिए इसका स्वरूप? स्वतंत्रता दिवस पर रिटायर्ड ब्रिगेडियर से समझिए

EXCLUSIVE: आजादी से अब तक कितनी ताकतवर हुई भारतीय थल सेना, क्या रहे बड़े टर्निंग प्वाइंट और आगे कैसा होना चाहिए इसका स्वरूप? स्वतंत्रता दिवस पर रिटायर्ड ब्रिगेडियर से समझिए

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Aug 15, 2026 07:22 am IST,  Updated : Aug 15, 2026 01:53 pm IST

आजादी के 79 साल बीतने के बाद अब भारतीय सेना दुनिया की सबसे ताकतवार फौजों में शुमार है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए थल सेना ने कितनी मेहनत की और भविष्य में क्या रणनीति अपनानी चाहिए, इसको लेकर पढ़िए भारतीय सेना के ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।

Indian Army Evolution- India TV Hindi
भारतीय थल सेना के विकास की कहानी। Image Source : PTI

1947 में जब भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली, तब हमारे पास एक ऐसी आर्मी थी, जो औपनिवेशिक विरासत में मिली और जिसे अब स्वतंत्र भारत की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालनी थी। तब फौज के पास संसाधन सीमित थे लेकिन चुनौतियां बड़ी थीं और सामने पाकिस्तान जैसा ऐसा पड़ोसी था, जिससे आजादी के तुरंत बाद ही जंग शुरू हो गई। लेकिन Indian Army ने सिर्फ जंग नहीं लड़ी, हर युद्ध से सीखा भी, अपनी स्ट्रैटेजी बदली, अपनी ताकत बढ़ाई और धीरे-धीरे एक ऐसी आर्मी के तौर पर खुद को तैयार किया, जो आज विश्व की प्रमुख सैन्य ताकतों में शुमार है।

1962 में हार से लेकर 1967 के नाथू ला संघर्ष में चीन को जवाब देने तक, 1971 की निर्णायक विजय से लेकर कारगिल की जीत तक और म्यांमार बॉर्डर पर ऑपरेशन से लेकर पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक तक, भारतीय फौज की गाथा सिर्फ जीत और युद्ध की कहानी नहीं है। यह स्टोरी है सीखने और हर चुनौती के बाद खुद को पहले से और ज्यादा ताकतवर बनाने की। लेकिन आज जंग का मैदान बदल गया है। अब लड़ाई महज सैनिकों, तोपों और टैंकों से नहीं होती है। मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर से टारगेट करती हैं, ड्रोन झुंड में हमला करते हैं, Satellites युद्ध में आंख बनते हैं, Cyber Warfare दुश्मन पर बिना गोली चलाए आघात करते हैं।

तो ऐसे में प्रश्न ये है कि 2047 में जब भारत आजादी के 100 साल पूरे करेगा तब भारतीय सेना कैसी होगी? क्या हमारी फौज पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन पाएगी? और क्या Indian Army मल्टी डोमेन और Joint Warfare की ऐसी शक्ति बन पाएगी, जो जमीन, आकाश, समंदर, स्पेस और साइबर हर मोर्चे पर एक साथ लड़ सके? Indian Army की इसी ऐतिहासिक यात्रा, उसकी बदलती वार स्ट्रैटेजी, आत्मनिर्भरता की चुनौती और 2047 की मिलिट्री पावर के विजन को समझने के लिए स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इंडिया टीवी ने भारतीय सेना के ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग से एक्सक्लूसिव बात की।

सवाल: भारतीय सेना ने पिछले 79 साल में एक Colonial Force से दुनिया की सबसे मजबूत सेनाओं में से एक और आत्मनिर्भर सेना बनने तक का सफर तय किया है। इस पूरे Evolution में आप सबसे बड़े टर्निंग पॉइंट कौन से मानते हैं?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि मैं चीन के खिलाफ 1967 की लड़ाई को मानूंगा, जो जनरल सगत सिंह ने नाथू ला में हमें जिताई थी। 1962 की करारी हार के बाद 1967 में जनरल सगत सिंह ने जो कर दिखाया, वह चीनियों को एक मुंहतोड़ जवाब था। उसके बाद उनमें यह डर बैठ गया कि भारत में वह जोश है जिससे वे आसानी से जीत नहीं सकते। इसके बाद, 1971 में पाकिस्तान के मोर्चे पर तब दुश्मन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वे सोच भी नहीं सकते थे कि बांग्लादेश उनसे अलग हो जाएगा।

पूर्व ब्रिगेडियर बोले, 'हमें यह मानकर चलना होगा कि जब पाकिस्तान का जन्म हुआ था, तो PAK शब्द में उन्होंने पंजाब, अफगान इलाके और कश्मीर का नाम लिया था, लेकिन उसमें बांग्लादेश का नाम नहीं था। इसलिए 1971 में जब बांग्लादेश उनसे टूटा और भारत ने 17 दिन में वह लड़ाई खत्म की, तो वह एक बहुत बड़ी और निर्णायक जीत थी।'

अंशुमान नारंग ने आगे कहा कि मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के वक्त पाकिस्तान हमला करना चाहता था लेकिन उसके पास जवाब देने की ताकत नहीं थी। उनके पास जो 80 प्रतिशत चीनी साजो-सामान है, उसके खिलाफ भारतीय सेना ने ब्रह्मोस के जरिए मुंहतोड़ जवाब दिया। तो ये तीन-चार क्षण हैं जो बहुत बड़े रहे हैं और ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।

सवाल: 1947 का कश्मीर अभियान, 1965 और 1971 के युद्ध, कारगिल और हाल ही में गलवान घाटी का संघर्ष, इन तमाम चुनौतियों ने भारतीय सेना की Combat Doctrine और सामरिक सोच को कैसे बदला?

जवाब: अंशुमान नारंग बोले कि उस नजरिए से सोचें तो 1962 का युद्ध पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ा झटका था, जिसने यह एहसास दिलाया कि सेना को अहमियत देने की जरूरत है। उससे पहले कोशिश यही थी कि जैसा पाकिस्तान में सैन्य शासन हो रहा है, वैसा भारत में न हो। 1962 की हार भारत के लिए उभर कर आने और सैन्य तैयारियों पर काम करने के लिए एक चेतावनी थी।

1965 हो, 1971 हो या कारगिल रहा हो, इन सभी युद्धों ने हमें सिखाया कि बाहरी ताकतों, जैसे अमेरिका, पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए। अमेरिका ने ऑपरेशन सिंदूर में जानबूझकर इमेजेस देने में देरी की और कारगिल में भी सिलेक्टिव अवेलेबिलिटी एरर को लेकर समस्या पैदा की। इन सब बातों ने साफ कर दिया कि भारत को अपने पैरों पर खुद खड़ा होना पड़ेगा। आज के समय में आत्मनिर्भरता हमारी सबसे बुनियादी जरूरत है: ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग

सवाल: उरी हमले के बाद पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक और म्यांमार बॉर्डर ऑपरेशन के बाद पूरी दुनिया ने हमारी स्पेशल फोर्सेज की ताकत देखी। भविष्य के Surgical और Covert Ops के लिए इन एलीट फोर्सेज की मारक क्षमता और तकनीक को कैसे और धार दी जा रही है?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि ट्रेनिंग के लिहाज से हमारी स्पेशल फोर्सेस से बेहतर कोई नहीं है। यह मानकर चलना पड़ेगा कि हम भले ही कहीं और चूक जाएं, लेकिन हमारी स्पेशल फोर्सेस की ट्रेनिंग अव्वल दर्जे की है। चाहे इंटरनल इंसर्जेंसी के ऑपरेशंस हों या कोई और मोर्चा, उन्होंने खुद को साबित किया है।

अब जरूरी यह है कि हम सेना को मॉडर्न टेक्नोलॉजी से पूरा सपोर्ट दें। उदाहरण के लिए सेना को स्पेस और सैटेलाइट इमेजेस के लिए 5 से 15 मिनट का जो रिविजिट टाइम चाहिए, उसके लिए हमें किसी और देश पर निर्भर न रहना पड़े। वह क्षमता हमारे पास खुद की होनी चाहिए। हम उन्हें जो ड्रोन्स दें, उसके सभी पार्ट्स स्वदेशी हों, ताकि बाहरी निर्भरता न रहे। स्पेशल फोर्सेस को जो सैटेलाइट आधारित या क्वांटम कम्युनिकेशन चाहिए, उसमें हमें आत्मनिर्भर होना होगा: ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग

अंशुमान नारंग ने आगे कहा, 'थल सेना के पास जो शक्ति, ट्रेनिंग और जज्बा है, उसे विश्व में कोई नहीं हरा सकता। लेकिन जिन कुछ तकनीकों में हम पीछे हैं और बाहरी देशों पर निर्भर हैं, वह निर्भरता हमें खत्म करनी होगी। इसके साथ ही, रोबोटिक्स, स्वार्म ड्रोन्स और बायोनिक ड्रोन्स जैसी तकनीकों से हमें उन्हें और मजबूत करना होगा।'

सवाल: भारतीय सेना के पास ऐसे कौन से अचूक और खतरनाक हथियार हैं जिनका लोहा दुनिया मानती है और दुश्मन खौफ खाते हैं?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि अभी ऐसे हथियारों में मुख्य रूप से एक ब्रह्मोस है और दूसरा रूस से लिया गया एस-400 सिस्टम है। हमें इन क्षेत्रों में अभी बहुत बढ़ोतरी करने की जरूरत है और अगर मैं कहूं कि हम इनमें सबसे आगे हैं, तो यह झूठ होगा। स्पेस टेक्नोलॉजी में हम अभी पीछे हैं। पीछे होने का मतलब है कि जब हम दुनिया के शीर्ष देशों जैसे रूस, चीन और अमेरिका से अपनी तुलना करते हैं, तो हम उनसे पीछे हैं। बाकी किसी से तुलना करने का मतलब नहीं है।

उन्होंने आगे कहा, 'ब्रह्मोस बहुत अच्छी मिसाइल है, लेकिन चीन के खिलाफ 400 या 800 किलोमीटर की रेंज का ज्यादा फायदा नहीं है। हम ल्हासा में बैठकर तो हमला नहीं करेंगे। अगर हमारे कलकत्ता या उधमपुर को निशाना बनाया जाता है, तो हमें चीन के अंदर तक जवाब देने की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके लिए हमें अपनी मिसाइलों की रेंज बढ़ानी होगी।'

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस 'मिशन सुदर्शन चक्र' की शुरुआत की है, उसमें 'कुशा' जैसी प्रणालियां दुश्मन की मिसाइलों को रोकने के लिए बेहतरीन हैं। लेकिन सिर्फ बचाव काफी नहीं है। हवा में मिसाइलों को रोकना एक बहुत महंगी लड़ाई है, जैसा कि आपने ईरान-इजरायल युद्ध में देखा होगा। इंटरसेप्टर्स की एक सीमा होती है, आप एक तय संख्या से ज्यादा मिसाइलें फायर नहीं कर सकते। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जो दुश्मन मिसाइल चला रहा है, उसे उसी की मूल जगह पर निशाना बनाया जाए। 'टारगेट द आर्चर' की रणनीति अपनानी होगी। सिर्फ तीरों को रोकना काफी नहीं है, जो तीर चला रहा है, उसे खत्म करने की जरूरत है: ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग

सवाल: आत्मनिर्भर भारत के तहत डिफेंस सेक्टर में Indigenisation पर बहुत जोर दिया जा रहा है। सेना के Modernisation और Import पर निर्भरता कम करने में हमारे स्वदेशी हथियार और तकनीक कितने कारगर साबित हो रहे हैं? कौन सी ऐसी स्वदेशी तकनीक या हथियार हैं जिन पर अभी काम चल रहा है और जो भविष्य में दुश्मनों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि हमारे एयर डिफेंस सिस्टम्स में 'आकाश' एनजी आ रहा है, 'कुशा' इंटरसेप्टर्स आ रहे हैं। इसके अलावा हमारा 'पिनाका' एक बेहतरीन हथियार है। कुछ नए माउंटेड गन सिस्टम्स भी आ रहे हैं। नेवी में हम स्वदेशी शिप्स के निर्माण में काफी आगे बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे हम कई क्षेत्रों में तरक्की कर रहे हैं, जो हमारे लिए बहुत अच्छी बात है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया, स्पेस और ड्रोन तकनीक में हम अभी पीछे हैं और इसमें हमें तेजी से आगे बढ़ना होगा।

सवाल: युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए, हमारी फौज की ट्रेनिंग और सैन्य शिक्षा में भी किस तरह तेजी से बदलाव हो रहा है?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि अब पूरा फोकस 'नॉन-कॉन्टैक्ट काइनेटिक बैटल' पर है, जैसा कि हमने हाल के संघर्षों में देखा है। इसलिए अब कोशिश यह हो रही है कि एक 'कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स' या 'इंडियन रॉकेट फोर्स' बनाई जाए। 'मिशन सुदर्शन चक्र' के लक्ष्यों को जल्दी हासिल करने के लिए यह सबसे पहली जरूरत है। जैसे पाकिस्तान ने आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड बनाई है और चीन की पीएलए में रॉकेट फोर्स है, वैसे ही हमारे लिए भी ऐसी एक फोर्स बनाना बहुत जरूरी है, जिसकी ट्रेनिंग उसी स्तर की हो।

उन्होंने आगे कहा कि दूसरा, ड्रोन्स के लिए हम कई इनिशिएटिव ले रहे हैं, जैसे 'अग्निबाण' और अलग-अलग स्क्वाड्रन तैयार कर रहे हैं, ताकि हम ड्रोन तकनीक को अपनी ट्रेनिंग में अच्छे से इंटीग्रेट कर सकें। इसके बाद रॉकेट आर्टिलरी की बारी आती है, जैसे 'पिनाका'। हमें इसका ज्यादा से ज्यादा इंडक्शन करना है और इसकी ट्रेनिंग बहुत ही उच्च स्तर की करनी है।

भविष्य में हम जो भी टारगेट्स लेंगे, उसके लिए हमारी 'डिफेंस स्पेस एजेंसी' को एक 'स्पेस कमांड' के रूप में खड़ा करना होगा और उसमें डोमेन स्पेशलाइजेशन लाना होगा। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, साइबर वॉरफेयर और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर पर हमारा काफी जोर है। हमें इन तीनों चीजों को एक साथ जोड़कर अपनी पूरी तैयारी करनी होगी: ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग

सवाल: जब हम अगले 20-30 साल की बात करते हैं और भारतीय सेना 2047 में अपने 100 साल पूरे करने की ओर बढ़ेगी, तब भारतीय सेना Modernisation के मामले में दुनिया में कहां खड़ी होगी?

जवाब: अंशुमान नारंग ने कहा कि अगर 2047 तक हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में दूसरे या तीसरे स्थान पर पहुंचती है, तो कूटनीति और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ हमारी सेना को भी उसी स्तर तक ले जाना होगा। इसे DIME- Diplomatic, Information, Military, Economic से समझ सकते हैं। उस स्तर तक पहुंचने के लिए हमें खुद को इतना मजबूत बनाना होगा कि हम सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि अमेरिका जैसे देशों के स्तर की चुनौतियों का भी सामना कर सकें। जैसा कि अमेरिका धीरे-धीरे भारत को एक चुनौती के रूप में देखने लगा है, हमें अपनी सेना को उस स्तर तक पहुंचाना होगा ताकि एक सुरक्षित और विकसित भारत के लिए एक सशक्त भारतीय सेना खड़ी हो सके।

सेना को पूरी तरह से इंडीजनाइज करना बहुत जरूरी है। कोई भी बड़ा हथियार ऐसा नहीं होना चाहिए जिसके लिए हम किसी बाहरी देश पर निर्भर हों। स्वदेशीकरण के जरिए आत्मनिर्भर आधुनिकीकरण ही एकमात्र रास्ता है, इसके अलावा आगे बढ़ने का कोई और तरीका नहीं है: ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग

ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अंशुमान नारंग बोले कि संगठनात्मक सुधार भी जरूरी हैं। सेना का Theatrisation सिर्फ एक छोटा सा कदम है। असली जरूरत एक 'जॉइंट टास्क फोर्स' बनाने की है। जिस तरह ईरान का 'मोजेक वॉरफेयर' काम करता है, 31 प्रोविंस अपने आप लड़ाई लड़ सकें। वैसी जरूरत है। हमें भी एक ऐसी फोर्स की आवश्यकता है जो हर प्रकार के हमले का एकजुट होकर जवाब दे सके। इसमें अलग-अलग काम नहीं होना चाहिए कि एयरफोर्स अलग लड़ रही है, आर्मी अलग और नेवी अलग। एक जॉइंट टास्क फोर्स बनकर मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस करना ही भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत है। वहीं, पंखे वाले विमानों से सुपरसोनिक जेट तक का IAF का सफर कितना चुनौतीपूर्ण रहा, युद्धों में कैसे वायुसेना ने निर्णायक रोल निभाया? स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वायुसेना ने पूर्व अधिकारी ने विस्तार से बताया।

ये भी पढ़ें- EXCLUSIVE: भारतीय नौसेना ने कैसे तय किया ब्लू-वाटर नेवी बनने का सफर? युद्धों में कब-कब दुश्मन को चटाई धूल, भविष्य में होगी और कितनी ताकतवर? Commodore रहे अधिकारी ने समझाया

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। National से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें भारत