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मणिपुर में संदिग्ध उग्रवादियों ने घर में सो रहे तीन लोगों को मार डाला, 7 घरों में लगाई आग

 Edited By: Mangal Yadav @MangalyYadav
 Published : Jun 05, 2026 10:54 am IST,  Updated : Jun 05, 2026 11:04 am IST

मणिपुर के कांगपोकपी ज़िले के एक गांव में शुक्रवार सुबह-सुबह हुए हथियारबंद हमले में तीन आम नागरिकों की मौत हो गई और कई घर क्षतिग्रस्त हो गए। मृतकों की पहचान लेतखोंगम हाओकिप, टिनमेरी हाओकिप और जांगमिनलाल हाओकिप के तौर पर की गई है।

सांकेतिक तस्वीर- India TV Hindi
सांकेतिक तस्वीर Image Source : PTI

इंफालः मणिपुर के कांगपोकपी जिले के लोइबोल खुलेन गांव में शुक्रवार को संदिग्ध उग्रवादियों के हमले में तीन लोगों की मौत हो गई और सात घर जलकर राख हो गए। कुकी का प्रतिनिधित्व करने वाली मुख्य संस्था KIM के अनुसार, NSCN-IM और उसके सहयोगी संगठन ZUF (K) के भारी हथियारों से लैस सदस्यों ने सुबह करीब 4 बजे गांव पर हमला किया। संगठन ने कहा कि इस हमले में तीन आम नागरिकों की मौत हो गई, सात घर नष्ट हो गए और नागरिकों की संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा।

दोषियों के खिलाफ एक्शन की मांग

मृतकों की पहचान लेतखोंगम हाओकिप, उनकी पत्नी टिनमेरी हाओकिप और जांगमिनलाल हाओकिप के रूप में हुई है। ये सभी लोइबोल खुलेन के निवासी थे। घटना की निंदा करते हुए KIM ने इस हमले को निहत्थे नागरिकों के खिलाफ "हिंसा का बर्बर कृत्य" बताया और कहा कि निर्दोष लोगों की जानबूझकर हत्या और घरों को नष्ट करना मानवीय गरिमा और मौलिक मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। 

इसके अलावा, KSO साउथ वेस्ट सदर हिल्स ने आरोप लगाया कि VBIG, ZUF-कामसन और NSCN (IM) से जुड़े उग्रवादी हमले में शामिल थे और नागा विद्रोही समूहों पर कूकी लोगों के पुश्तैनी इलाकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया।

लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष के बीच नई हिंसा

यह घटना मणिपुर में तीन साल से अधिक समय से चल रहे जातीय तनाव और हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई है। यह संघर्ष मई 2023 में मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच झड़पों के साथ शुरू हुआ था। हिंसा तेज़ी से पूरे राज्य में फैल गई, जिससे बड़े पैमाने पर हत्याएं, आगज़नी और लोगों का विस्थापन हुआ। एक अनुमान के अनुसार, मई 2023 में अशांति शुरू होने के बाद से 250 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं। दोनों समुदायों के बहुत से लोग अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं, जबकि कई ज़िले जातीय आधार पर बंटे हुए हैं।

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