गुवाहाटी: सत्ता विरोधी लहर और अपनी ढलती उम्र के चलते असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई इस बार विधानसभा चुनाव में अपने व्यक्तित्व का जादू चलाने में विफल रहे और पिछले चुनाव तक हैट्रिक जमाने वाले कद्दावर कांग्रेसी नेता इस बार चौका नहीं जड़ पाए। कांग्रेस के भीतर ही अपने दोस्तों के दुश्मनों में बदल जाने के कारण 80 वर्षीय वरिष्ठ नेता ने विधानसभा चुनाव में पार्टी की वैतरणी पार लगाने की सारी जिम्मेदारी अकेले ही अपने कंधों पर ढोई लेकिन कांग्रेस की ओर बढ़ते तूफान का रूख मोड़ पाने में विफल रहे।
दुर्दांत उग्रवादी संगठन उल्फा को सुलह समझौते की मेज तक लाने, असम को दीवालियेपन के कगार से खींच कर इसे फिर से तरक्की की पटरी पर ले जाने का श्रेय गोगोई को जाता है । 80 वर्षीय गोगोई के बतौर मुख्यमंत्री तीसरे कार्यकाल में विरोध के स्वर उभरने लगे थे। विरोध के इन स्वरों में आग में घी डालने का काम किसी समय गोगोई की आंखों का तारा रहे शक्तिशाली नेता हिमंता बिस्वा शर्मा ने किया। प्रदेश की कमान हासिल करने का सपना दिल में लिए हुए शर्मा ने पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेसी विधायकों के एक धड़े को लेकर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया लेकिन संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के भरोसेमंद गोगोई मंत्रिमंडल में फेरबदल कर अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रहे ।
शर्मा ने नौ पार्टी विधायकों के साथ भाजपा का दामन थामने से पहले मंत्री पद, पार्टी और साथ ही विधानसभा से इस्तीफा दे दिया । इन विधायकों को हालांकि बाद में अयोग्य घोषित कर दिया गया और इससे गोगोई तथा कांग्रेस दोनों को तगड़ा झटका लगा । इस झटके ने पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर भी पलीता लगा दिया। गोगोई दो दूसरे और तीसरे कार्यकाल में कांग्रेस की सहयोगी रही बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट : बीपीएफ : भी तीसरे कार्यकाल के अंतिम चरण में गठबंधन से नाता तोड़ कर चली गयी जिससे बोडो बहुल इलाकों में पार्टी की संभावनाओं पर असर पड़ा। उन्होंने बीपीएफ की विरोधी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी : यूपीपी : के साथ विधानसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले हाथ मिलाया था। शांत सौम्य व्यक्तित्व और स्पष्टवादी गोगोई दो बार केंद्र में मंत्री रहने के साथ ही छह बार लोकसभा सदस्य रहे हैं ।
गोगोई के 15 साल के कार्यकाल की उपलब्धियों पर गौर किया जाए तो प्रतिबंधित उल्फा समेत कई उग्रवादी संगठनों को वार्ता की मेज तक लेकर आना, राज्य सरकार की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के जरिए राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लाना रही हैं । एनडीएफबी : एस : और बीटीएडी इलाकों में बोडो मुस्लिम संघर्ष की छुटपुट घटनाओं को छोड़कर गोगोई का तीसरा कार्यकाल कुल मिलाकर हिंसा मुक्त रहा। मुख्यमंत्री स्वयं यह दावा करते रहे हैं कि उनके शासनकाल में राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ और इसे अपने तीन कार्यकाल की वह एकमात्र सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
गोगोई ने 17 मई 2001 को पहली बार असम गण परिषद से सत्ता की कमान संभाली थी जहां उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य को उग्रवादी हिंसा से बाहर निकालने और प्रदेश में वित्तीय स्थिरता बहाल करना थी। उस समय सरकार पर कर्ज का भारी बोझ था और कर्मचारियों को वेतन भी समय पर नहीं मिल रहा था। दूसरे कार्यकाल में कुछ उतार चढ़ाव देखने के बाद तीसरे कार्यकाल में गोगोई के स्वास्थ्य ने उनका साथ नहीं दिया। उन्हें अपने दिल के तीन बड़े और पेचीदा आपरेशन करवाने पड़े । 2011 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें पेसमेकर बदलवाने के लिए सर्जरी करानी पड़ी थी। लेकिन बहुत जल्द स्वस्थ हो वह पूरे जोशखरोश के साथ चुनाव प्रचार में जुट गए थे ।