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क्या है पीएम मोदी की सफलता का मूलमंत्र'

 Written By: IANS
 Published : Jun 01, 2015 01:00 pm IST,  Updated : Jun 01, 2015 01:02 pm IST

नई दिल्ली: पिछले एक साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की कार्यशैली में भारी बदलाव लाए हैं। उन्होंने काइजेन की प्रैक्टिस को लागू कर कार्य संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया है। काइजेन

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क्या है पीएम मोदी की सफलता का मूलमंत्र?

नई दिल्ली: पिछले एक साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की कार्यशैली में भारी बदलाव लाए हैं। उन्होंने काइजेन की प्रैक्टिस को लागू कर कार्य संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया है। काइजेन एक जापानी प्रैक्टिस है जिसमें क्वॉलिटी, तकनीक, प्रक्रिया, कार्य संस्कृति, प्रॉडक्टिविटी, क्षमता और नेतृत्व में सतत सुधार पर जोर दिया जाता है। वैसे काइजेन शब्द का मतलब है सतत सुधार। यह दो जापानी शब्दों काई और जेन से मिलकर बना है जिसमें काई का मतलब होता है 'परिवर्तन' या 'सही करना' और जेन का मतलब होता है 'अच्छा'।

मोदी ने प्रधानमंत्री से जुड़े सभी विभागों में नियमित सुधार पर जोर देते हुए क्वॉलिटी मैनेजमेंट सिस्टम की अन्य जापानी प्रैक्टिस पर अमल करने की भी कोशिश की है। इससे लाल फीताशाही कम होती है और कार्यालय प्रभावी, उत्तरदायी एवं सक्षम बनता है।

काइजेन का जो सिद्धांत है उसके दायरे में पीएमओ के सभी अधिकारी-प्रधान सचिव एवं सभी आईएफएस, आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से लेकर अधीनस्थ कर्मचारी तक आते हैं। पीएमओ में प्रधानमंत्री ने हर किसी को छोटे और साधारण सुधारों पर सुझाव देने के लिए प्रोत्साहित किया है। ऐसा नहीं है कि इस पर महीने में एक बार या साल में एक बार अमल किया जाता है बल्कि नियमित रूप से इस पर अमल किया जाता है।

इसका परिणाम यह हुआ की उनको अपनी टीम के सदस्यों से भारी संख्या में सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन विचारों को लिखा जाता है, साझा किया जाता है और इस पर चर्चा भी होती है। अगर इन विचारों को मूल्यवान और व्यावहारिक पाया जाता है तो इनको पीएमओ द्वारा क्रियान्वित किया जाता है।

बहुत से मामलो में इन सुझावों के आधार पर भारी परिवर्तन तो नहीं किए जा सकते हैं लेकिन मोदी समय और खर्च की बर्बादी को रोकते हुए प्रॉडक्टिविटी, सुरक्षा और सक्षमता में सुधार के लिए नियमित रूप से बदलाव करने में विश्वास रखते हैं।

पीएमओ में जो स्टाफ हैं उनसे अपने सुझावों को किसी खास सरकारी क्षेत्र तक सीमित नहीं रखने के लिए कहा गया है। उनको जहां भी आवश्यक और संभव हो सुधार के लिए परिवर्तन के प्रस्ताव और विचारों के साथ आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

पश्चिमी दुनिया काम से जुड़े इस सिद्धांत को मानती है कि 'अगर यह टूटा नहीं तो इसे सही मत करो' जबकि मोदी के दर्शन में सुशासन का मतलब 'अगर यह टूटा नहीं है फिर भी इसमें सुधार किया जाए क्योंकि अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे नहीं निकल पाएंगे। प्रधानमंत्री का यह विचार सामाजिक गतिविधियों तक भी फैला है। वह इन नियमों को अपने जीवन में भी लागू करते हैं।

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