देहरादून: उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के संबंध में कांग्रेस और भाजपा जोखिम नहीं लेना चाहती। दोनो ही राजनीतिक दल राज्य विधानसभा में अपनी संख्या बरकरार रखना चाहते हैं। हाल ही में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दो याचिकाओं पर सुनवाई की तीथि निर्धारित की थी। जिसमें केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय की एकल पीठ के उस निर्णय को चुनौती दी जिसमें अपदस्थ मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत सिद्ध करने के लिये कहा गया था। इसी प्रकार दूसरी याचिका रावत ने दर्ज की थी, जिसमें उन्होंने विधानसभा की सदस्यता खो चुके विधायकों को भी सदन में शक्तिपरीक्षण के दौरान मतदान का अधिकार के लिए चुनौती दी है।
यहां गौरतलब बात यह है कि विधानसभा में विश्वासमत रखे जाने से एक दिन पहले 27 मार्च को उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकल पीठ ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र के निर्णय को चुनौती देने वाली हरीश रावत की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें 31 मार्च को सदन में शक्ति परीक्षण करने को कहा था। इसके साथ ही विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराये गये कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को भी मतदान मे भाग लेने की अनुमति दी थी ।
हालांकि, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ के मामले की अगली सुनवाई के लिये ह अप्रैल तय करने से एकल पीठ के आदेश पर रोक लग गई। केंद्र सरकार ने एकल पीठ के शक्ति परीक्षण के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी है कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद विधानसभा निलंबन की स्थिति में आ जाती है। ऐसे में यह आदेश नहीं दिया जा सकता। वहीं अपदस्थ मुख्यमंत्री रावत ने एकलपीठ के निर्णय के उस हिस्से की समीक्षा की जरूरत बतायी है जिसमें अयोग्य कांग्रेसी विधायकों को सदन में शक्ति परीक्षण के दौरान मतदान करने का अधिकार दिया गया है। अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी केंद्र की ओर से पक्ष रख रहे हैं जबकि रावत का प्रतिनिधित्व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्ब्ल और अभिषेक मनु सिंघवी कर रहे हैं ।