उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। चुनाव में कुछ ही महीनों का वक्त बचा है और इसी बीच योगी आदित्यनाथ के मथुरा दौरे ने राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दे दी है। अयोध्या के बाद अब मथुरा का मुद्दा चर्चा के केंद्र में है। योगी आदित्यनाथ दो दिन के मथुरा दौरे पर हैं, जहां वह जन्माष्टमी मनाएंगे और कई सौगातें भी देंगे। इसी के साथ श्री कृष्ण जन्मभूमि और वृंदावन कॉरिडोर को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। इन्हीं सब मामलों को लेकर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में चर्चा की गई। इस दौरान कार्यक्रम में शो की एंकर पीनाज़ त्यागी के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, विनोद अग्निहोत्री और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
सीएम योगी का मिशन मथुरा
राजनीतिक बहस में यह सवाल उठ रहा है कि क्या श्री राम के मुद्दे के बाद अब श्री कृष्ण का मुद्दा बीजेपी के लिए चुनावी ताकत बनेगा। योगी आदित्यनाथ की राजनीति में हिंदुत्व एक प्रमुख पहचान मानी जाती है। चर्चा में यह भी कहा गया कि योगी की सबसे बड़ी यूएसपी हिंदुत्व है और वह अपनी इस पहचान को छोड़कर केवल दूसरे मुद्दों पर नहीं जा सकते। हालांकि दूसरी तरफ यह भी साफ किया गया कि केवल मथुरा या अयोध्या के आधार पर चुनाव नहीं जीता जा सकता। विकास का मुद्दा भी साथ रखना होगा।
मथुरा को लेकर अखिलेश यादव पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चर्चा में कहा गया कि जब अखिलेश अयोध्या का मुद्दा उठाते हैं तो योगी मथुरा और श्री कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा सामने रखते हैं। अखिलेश यादव खुद को यदुवंशी कहते हैं, ऐसे में उनसे श्री कृष्ण जन्मभूमि पर अपना स्टैंड स्पष्ट करने की मांग की जा रही है।
राम मंदिर ट्रस्ट के नए सीईओ की नियुक्ति पर बहस
इसी के साथ चढ़ावा चोरी का मुद्दा भी चर्चा में है। विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठाता रहा है, लेकिन राम मंदिर ट्रस्ट के नए सीईओ की नियुक्ति ने बहस को दूसरी दिशा दे दी है। चर्चा में कहा गया कि नए सीईओ एक डेकोरेटेड अधिकारी हैं और एयरफोर्स में करीब चार दशक तक काम कर चुके हैं। सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, वीआईपी मूवमेंट और फाइनेंस मैनेजमेंट जैसे कामों का अनुभव उनके पास है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न कमांड संभालने और आदमपुर एयर बेस पर प्रधानमंत्री को रिसीव करने का भी उल्लेख किया गया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और कानून-व्यवस्था के साथ अब सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी महत्वपूर्ण होगा। चर्चा में माना गया कि योगी सरकार के सामने दस साल के कामकाज को लेकर सवाल होंगे। कानून-व्यवस्था को लेकर योगी की छवि मजबूत बताई गई, खासकर महिलाओं के बीच उनकी एक अलग स्वीकार्यता की बात सामने आई।
कांग्रेस के साथ सपा का गठबंधन लगभग तय
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर भी चर्चा जारी है। माना गया कि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं और अंततः गठबंधन की ओर बढ़ेंगे। सीटों को लेकर बयानबाजी और रस्साकशी जरूर चलेगी, लेकिन दोनों के सामने साथ आने की मजबूरी भी है। संभावित फॉर्मूले में शहरी सीटों पर कांग्रेस और ग्रामीण, सेंट्रल यूपी, ईस्टर्न यूपी और बुंदेलखंड की सीटों पर समाजवादी पार्टी की अधिक हिस्सेदारी की चर्चा हुई।
बीजेपी के सामने स्थानीय विधायकों को लेकर एंटी-इनकंबेंसी भी चुनौती है। पार्टी टिकटों में बदलाव और स्थानीय नाराजगी को ध्यान में रखकर रणनीति बना सकती है। साथ ही महिला वोटर्स और लाभार्थियों को भी बीजेपी अपनी ताकत मान रही है। जातीय समीकरण भी चुनाव में अहम रहने वाला है। विपक्ष जाति के मुद्दे को चुनावी चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश करेगा, जबकि बीजेपी की कोशिश रहेगी कि राजनीतिक डिस्कोर्स हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, कानून-व्यवस्था और विकास के आसपास रहे।
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युवाओं के मुद्दे पर भी हुई बात
युवाओं का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। चर्चा में साफ कहा गया कि युवाओं की सबसे बड़ी आकांक्षा रोजगार और पढ़ाई है। स्कूलों में सुधार को लेकर प्रदर्शन और सरकार की ओर से अधिकारियों को व्यवस्था सुधारने के निर्देश भी चर्चा का हिस्सा बने। ऐसे में यूपी चुनाव में धार्मिक मुद्दों के साथ विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था, महिला वोट और स्थानीय नाराजगी भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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