मुंबई: महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना की लेकर महत्वपूर्ण जानकारी निकलकर सामने आ रही है। योजना में अपात्र महिलाओं की संख्या अब 80 लाख से बढ़कर 92 लाख पहुंच गई है। योजना में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के बीड जिले से लाभार्थी महिलाएं बाहर हुई हैं। पिछले महीने मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना में अपात्र महिलाओं की संख्या 80 लाख के करीब थी। एक महीने के अंदर और 12 लाख लाभार्थी महिलाओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया है।
क्या है पूरा मामला?
जब यह योजना शुरू की गई थी, तब योजना के अंतर्गत कुल लाभार्थी महिलाओं की संख्या 2.4 करोड़ थी। जिसमें अब 38 फीसदी की गिरावट हुई है। तय समय पर E KYC पूरा नहीं करने वाले महिलाओं की संख्या में अपात्रता सूची में सबसे ज्यादा है।
किन किन वजहों लाभार्थी महिलाओं को योजना से बाहर का रास्ता दिखाया गया और उनकी संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सामने आई है।
- तय समय पर E KYC पूरा नहीं कर पाने की वजह से 62 लाख यानी 67% महिलाओं को योजना से बाहर का रास्ता दिखाया गया है।
- परिवार की सालाना इनकम 2.50 लाख से ऊपर होने के बावजूद योजना का लाभ लेने वाली महिलाओं की संख्या 16 लाख है और ये 17% है, जिन्हें योजना से बाहर किया गया है।
- सरकारी कर्मचारी के फैमिली मेंबर 4.42 लाख यानी 4.8 % है।
- अन्य सरकारी योजना का लाभ लेने वाली महिलाएं 3.6 लाख है यानी 3.9% है।
- एक ही परिवार में 2 लाभार्थी हैं, ऐसी महिलाओं की संख्या 2.50 लाख है यानी 2.7% है।
- 65 साल के ऊपर लाभार्थी महिलाओं की संख्या 1.80 लाख यानी 2% है।
- जिला स्तर पर वेरिफिकेशन करने के बाद 1.7 लाख यानी 1.8% है।
- पुरुष लाभार्थी 29 हजार हैं यानी 0.31% है।
- सरकारी कर्मचारी 8 हजार यानी 0.8% है।
योजना पर CAG ने भी जताई चिंता
एक ओर लाभार्थियों की संख्या कम हो रही है, वहीं दूसरी ओर 'कैग' ने जारी अपनी रिपोर्ट में 'लाड़की बहन योजना' को लेकर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना पर हो रहे भारी खर्च के कारण महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर बड़ा दबाव पड़ सकता है। साथ ही, योजना के तहत किए गए 3,542 करोड़ रुपये के खर्च का पर्याप्त और ठोस औचित्य उपलब्ध नहीं है, ऐसा भी रिपोर्ट में कहा गया है।
महिला कल्याण पर राज्य का खर्च वित्त वर्ष 2023-24 में केवल 261.78 करोड़ रुपये था। लेकिन 28 जून 2024 को मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना को मंजूरी मिलने के बाद, वित्त वर्ष 2024-25 में यह खर्च बढ़कर 33,514.36 करोड़ रुपये हो गया।
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