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Mazagon Dock में सरकार घटाएगी 4.83% तक हिस्सेदारी, इतने रुपये प्रति शेयर तय किया है फ्लोर प्राइस

 Published : Apr 04, 2025 06:52 am IST,  Updated : Apr 04, 2025 07:13 am IST

ऑफर फॉर सेल शुक्रवार को संस्थागत निवेशकों के लिए खुल रहा है। सरकार 1. 14 करोड़ इक्विटी शेयर बेच रही है, जिसमें अतिरिक्त 80.67 लाख शेयर बेचने का ग्रीन शू विकल्प है।

4.83 प्रतिशत तक शेयर बेचने से सरकारी खजाने को लगभग 5,000 करोड़ रुपये मिलेंगे।- India TV Hindi
4.83 प्रतिशत तक शेयर बेचने से सरकारी खजाने को लगभग 5,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। Image Source : MAZAGON DOCK की वेबसाइट

सरकार मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) में 4. 83 तक प्रतिशत हिस्सेदारी कम करने जा रही है। इसके लिए सरकार ने 2,525 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया गया है। मझगांव डॉक में बिक्री के लिए प्रस्ताव आज खुल जाएगा। पीटीआई की खबर के मुताबिक, खुदरा निवेशक 7 अप्रैल को बोली लगा सकते हैं। डीआईपीएएम सचिव अरुणीश चावला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि सरकार 2. 83 प्रतिशत इक्विटी और अतिरिक्त 2 प्रतिशत ग्रीन शू विकल्प के रूप में बेचेगी।

सरकारी खजाने को लगभग 5,000 करोड़ रुपये मिलेंगे

खबर के मुताबिक,ऑफर फॉर सेल शुक्रवार को संस्थागत निवेशकों के लिए खुलेगा। सरकार 1. 14 करोड़ इक्विटी शेयर बेच रही है, जिसमें अतिरिक्त 80.67 लाख शेयर बेचने का ग्रीन शू विकल्प है। 2,525 रुपये प्रति शेयर के फ्लोर प्राइस पर 4.83 प्रतिशत तक शेयर बेचने से सरकारी खजाने को लगभग 5,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। बीएसई पर मझगांव डॉक का शेयर पिछले बंद भाव से 5.05 प्रतिशत बढ़कर 2,735.45 रुपये पर बंद हुआ।

युद्धपोत बनाती है कंपनी

मझगांव डॉक का मुख्यालय मुंबई में है। यह कंपनी भारत के रक्षा क्षेत्र की आधारशिला है। यह राष्ट्र के लिए जहाज निर्माता के तौर पर जानी जाती है। रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करते हुए, यह  कंपनी विध्वंसक, फ्रिगेट और कोरवेट जैसे युद्धपोत बनाती है। 1960 से, नवरत्न कंपनी ने 25 युद्धपोतों और 3 पनडुब्बियों सहित 800 से अधिक जहाजों की डिलीवरी की है, जिसकी वर्तमान ऑर्डर बुक ₹54,000 करोड़ से अधिक है।

सरकार की कुल 84.83% हिस्सेदारी है

मौजूदा समय में मझगांव डॉक में सरकार की कुल 84.83% हिस्सेदारी है, जबकि आम लोगों के पास 15.17% हिस्सेदारी है। सरकार कंपनी की हिस्सेदारी को 80% तक कम कर सकती है, जो कई उद्देश्यों से मेल खाती है। यह बिक्री भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी कम करने की व्यापक नीति को दर्शाती है, बावजूद रक्षा जैसी रणनीतिक संपत्तियों पर नियंत्रण बनाए रखती है।

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