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दादा की संपत्ति में पोते का क्या अधिकार है, जानिए क्या कहता है देश का कानून

 Written By: Sunil Chaurasia
 Published : Jul 19, 2026 02:27 pm IST,  Updated : Jul 19, 2026 02:29 pm IST

देश में संपत्ति से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए व्यापक नियम और कानून बनाए गए हैं, जिनके आधार पर ही फैसला किया जाता है।

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सांकेतिक तस्वीर Image Source : FREEPIK

भारत में संपत्ति से जुड़े विवादों का पुराना इतिहास है, जो आज तक चलता आ रहा है। देश में संपत्ति से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए व्यापक नियम और कानून बनाए गए हैं, जिनके आधार पर ही फैसला किया जाता है। आज हम यहां आपको संपत्ति से जुड़े एक खास तरह के विवाद के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही, हम ये भी जानेंगे कि ऐसे मामले में देश का कानून क्या कहता है?

विवाद क्या है

अरविंद (काल्पनिक नाम) 19 साल का लड़का है। अरविंद के दादाजी और दादी जी की दिल्ली में अपनी प्रॉपर्टी है। दादाजी और दादीजी इस दुनिया में नहीं हैं और अरविंद के पिताजी अपनी बहनों के साथ मिलकर उस प्रॉपर्टी को बेचना चाहते हैं। अरविंद और उसकी मां इस फैसले के खिलाफ क्योंकि वे इस घर में रहते हैं और बेचना नहीं चाहते हैं। 

अब अरविंद इस मामले में अपने दादाजी की प्रॉपर्टी को बिकने से बचाने के लिए क्या कर सकता है? क्या इस मामले में वो कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले सकता है, ताकि अरविंद के पिताजी और बुआ उस घर को न बेच पाएं?

इस पूरे विवाद को लेकर लॉ फर्म सिद्धार्थ जैन एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर एडवोकेट सिद्धार्थ जैन ने कानून की बारीकियों को समझाते हुए अपनी राय दी।

कानून क्या कहता है

सिद्धार्थ जैन ने बताया, ''संबंधित संपत्ति दादाजी की स्व-अर्जित (Self-Acquired) संपत्ति थी और उनका निधन बिना वसीयत (Intestate) के हुआ। ऐसी स्थिति में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) के अनुसार, संपत्ति उनके Class-I विधिक उत्तराधिकारियों जैसे- सभी बेटों और बेटिंयों में बराबर हस्तांतरित हो जाती है। चूंकि, अरविंद के पिता जीवित हैं, इसलिए अरविंद का अपने दादाजी की संपत्ति पर कोई स्वतंत्र या जन्मसिद्ध अधिकार नहीं बनता।

इसी कारण, सिर्फ पोता होने या उक्त मकान में निवास करने के आधार पर अरविंद अपने नाम से संपत्ति की बिक्री रोकने के लिए न्यायालय से स्टे ऑर्डर (Temporary Injunction) प्राप्त करने का अधिकारी सामान्यतः नहीं होगा, क्योंकि किसी भी निषेधाज्ञा के लिए प्रथम दृष्टया विधिक अधिकार (Prima Facie Right) का होना जरूरी है। 

हालांकि, अंतिम विधिक राय देने से पूर्व संपत्ति के सभी स्वामित्व एवं उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेजों की जांच आवश्यक है। यदि जांच के दौरान ये पाया जाता है कि प्रस्तावित बिक्री में किसी प्रकार की धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों का उपयोग, सभी विधिक उत्तराधिकारियों की सहमति का अभाव, अथवा किसी व्यक्ति द्वारा अपने अधिकार से ज्यादा हिस्से की बिक्री की जा रही है, तो परिस्थितियों के अनुसार घोषणा वाद (Suit for Declaration), स्थायी एवं अस्थायी निषेधाज्ञा (Permanent/Temporary Injunction), दस्तावेज निरस्तीकरण (Cancellation of Documents) अथवा आवश्यक होने पर आपराधिक कार्यवाही जैसे उचित कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं। 

सिद्धार्थ जैन ने बताया कि मौजूदा तथ्यों के आधार पर सिर्फ अरविंद के आपत्ति करने से संपत्ति की बिक्री पर रोक लगवाना कठिन होगा। फिर भी, किसी भी कानूनी कार्रवाई से पूर्व संपत्ति के दस्तावेजों और प्रस्तावित बिक्री की प्रक्रिया की विस्तृत जांच कर ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बिक्री पूर्णतः विधिसम्मत है और किसी विधिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हो रहा है।

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