शेयर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के दौर में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या एकमुश्त (Lumpsum) निवेश बेहतर है या हर महीने थोड़ी-थोड़ी राशि लगाने वाली SIP रणनीति? दोनों तरीकों के अपने फायदे और जोखिम हैं, लेकिन वोलाटाइल मार्केट में इनका असर अलग-अलग दिखता है।
SIP क्यों मानी जाती है सुरक्षित?
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में निवेशक हर महीने तय राशि निवेश करता है। इसका सबसे बड़ा फायदा रुपी कॉस्ट एवरेजिंग है। यानी जब बाजार गिरता है तो उतनी ही रकम में ज्यादा यूनिट मिलती हैं, और जब बाजार चढ़ता है तो कम यूनिट। लंबे समय में यह औसत खरीद मूल्य को संतुलित करता है। उदाहरण, मान लीजिए कोई निवेशक 1.2 लाख रुपये सालभर में निवेश करना चाहता है। अगर वह हर महीने 10,000 रुपये SIP के जरिए लगाता है और बाजार कभी 10% गिरता है तो उसे अधिक यूनिट मिलेंगी। साल के अंत में बाजार यदि रिकवर कर 12% रिटर्न दे देता है, तो SIP निवेशक को औसतन बेहतर एंट्री प्राइस मिल सकता है।
Lumpsum कब बेहतर?
दूसरी ओर, अगर बाजार पहले ही नीचे स्तर पर है और आगे तेजी की संभावना है, तो एकमुश्त निवेश ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। मान लीजिए बाजार 15% गिर चुका है और उसके बाद लगातार रिकवरी आती है। ऐसे में शुरुआत में लगाया गया Lumpsum पूरे रिबाउंड का फायदा उठाता है, जबकि SIP में पैसा धीरे-धीरे लगता है और शुरुआती तेजी का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। उदाहरण, मान लीजिए किसी निवेशक ने बाजार गिरावट के दौरान ₹1 लाख एकमुश्त निवेश किए और अगले 12 महीनों में बाजार 20% चढ़ गया, तो उसका निवेश ₹1.2 लाख हो जाएगा।
वोलाटाइल मार्केट में कौन बेहतर?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर बाजार की दिशा स्पष्ट नहीं है और उतार-चढ़ाव ज्यादा है, तो SIP रिस्क को फैलाने में मदद करती है। वहीं, अगर बाजार में बड़ी गिरावट के बाद मजबूत रिकवरी के संकेत हों, तो Lumpsum ज्यादा फायदा दे सकता है।



































