सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT भारत में मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों (जैसे NSE और BSE) पर ट्रेड होने वाली सिक्योरिटीज की वैल्यू पर लगने वाला एक सरकारी टैक्स है। यह टैक्स सिक्योरिटी के प्रकार और ट्रांजैक्शन के आधार पर अलग-अलग दरों पर लागू होता है। सिक्योरिटी के प्रकार के तौर पर इक्विटी शेयर्स (डिलीवरी बेस्ड), इक्विटी फ्यूचर्स और इक्विटी ऑप्शंस पर यह अलग-अलग लागू है। बजट 2026 में फ्यूचर और ऑप्शंस सेगमेंट पर STT में बढ़ोतरी की गई है, जिससे डेरिवेटिव ट्रेडिंग महंगी हो गई है। इसका मकसद अत्यधिक सट्टेबाजी को रोकना और सरकारी राजस्व बढ़ाना है। रविवार को बजट में हुई इसी बढ़ोतरी की घोषणा के चलते घरेलू शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई।
इसे ऐसे भी समझें कि सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स, एक ऐसा टैक्स है जो भारत सरकार उन ट्रांजैक्शन पर लगाती है जिनमें मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सिक्योरिटीज शामिल होती हैं, जैसे कि स्टॉक, डेरिवेटिव्स (फ्यूचर्स और ऑप्शंस) और इक्विटी म्यूचुअल फंड। इस टैक्स की शुरुआक साल 2004 में हुई थी।
बजट में एसटीटी कितना बढ़ा
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में फ्यूचर्स पर STT को मौजूदा 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत करने का प्रस्ताव किया है। ऑप्शंस प्रीमियम और ऑप्शंस के एक्सरसाइज पर STT दोनों को मौजूदा दर 0.1 प्रतिशत और 0.125 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.15 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है।
STT कब और कैसे लगता है?
सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स देश के मान्यता प्राप्त घरेलू शेयर बाजारों में सूचीबद्ध शेयरों की हर खरीद और बिक्री पर लगाया जाता है। इस टैक्स की दरें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं। STT अधिनियम के तहत शेयर बाजार में होने वाले सभी लेन-देन कर के दायरे में आते हैं। इसमें इक्विटी शेयरों के साथ-साथ इक्विटी डेरिवेटिव्स जैसे फ्यूचर्स और ऑप्शंस में किए गए सौदे भी शामिल हैं।
जैसे ही किसी शेयर या डेरिवेटिव का लेन-देन पूरा होता है, उसी समय STT वसूल लिया जाता है। इसी वजह से यह टैक्स प्रणाली तेज, पारदर्शी और प्रभावी मानी जाती है। लेन-देन के साथ टैक्स कटने से टैक्स भुगतान में गड़बड़ी, देरी या चोरी की संभावनाएं बेहद कम हो जाती हैं। हालांकि, इसका सीधा असर यह पड़ता है कि निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए कुल लेन-देन की लागत कुछ बढ़ जाती है।






































