Shani Pradosh Vrat Katha: शनि प्रदोष व्रत फरवरी के माह में 14 तारीख को रखा जाएगा। भगवान शिव के परम भक्त शनि के वार के दिन प्रदोष व्रत होने से इस दिन व्रत और पूजन करने से बेहद शुभ फलों की प्राप्ति आपको ही सकती है। इसके साथ ही व्रत रखने वालों को इस दिन शिव जी की पूजा के साथ ही व्रत कथा का पाठ भी अवश्य करना चाहिए। शनि प्रदोष व्रत की कथा क्या है आइए विस्तार से जानते हैं।
शनि प्रदोष व्रत कथा (Shani Pradosh Vrat Katha)
प्राचीन काल में एक निर्धन ब्राह्मण की पत्नी बेहद कठिन परिस्थितियों में अपने परिवार का लालन-पालन कर रहा था। एक समय का भोजन करने के लिए भी परिवार के पास पर्याप्त धन नहीं था। आर्थिक संकट इतना गंभीर था की ब्राह्मण पत्नी अपने पुत्रों के साथ दर-दर की ठोकरें खा रही थी। एक दिन अपने हालत को बताने के लिए ब्राह्मण परिवार ऋषि शाण्डिल्य के पास पहुंचा। ऋषि ने ब्राह्मण की पत्नी से उनकी पीड़ा और व्याकुलता का कारण पूछा। तब ब्राह्मण की पत्नी ने अपने जीवन के कष्टों के बारे में ऋषि को बताया। ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि को यह भी बताया कि मेरा बड़ा पुत्र राजकुमार है जिसका नाम धर्म है। परंतु पिता का राज्य छिन जाने के कारण यह मेरे साथ दरिद्रता का जीवन बिता रहा है। फिर ब्राह्मण की पत्नी ने कहा कि मेरा छोटा पुत्र शुचिव्रत धर्मनिष्ठ है। इसके बाद दरिद्रता को दूर करने के लिए ब्राह्मण पत्नी ने ऋषि से उपाय पूछा।
ब्राह्मण पत्नी से ऋषि शाण्डिल्य ने कहा, ' हे देवी आप शनि प्रदोष व्रत का नियमपूर्वक पालन करें इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखने से आपके जीवन में सुख-समृद्धि आएगी।' ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि के शब्दों का पालन किया और शनि प्रदोष व्रत विधिपूर्वक रखना शुरू किया। इस व्रत के चमत्कार से एक दिन छोटे पुत्र शुचिव्रत को गांव के पास के एक कुएं के समीप सोने के सिक्कों से भरा एक कलश प्राप्त हुआ। इस कलश को पाकर उनके घर की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा। ब्राह्मण की पत्नी ने सोने के सिक्कों को दोनों पुत्रों के बीच बांटने की बात कही लेकिन बड़े पुत्र धर्म ने कहा कि भगवान शिव समय पर मेरा भी उद्धार करेंगे।
कुछ समय के पश्चात बड़े पुत्र धर्म की मुलाकात एक सौंदर्यवान कन्या अंशुमति से हुई। यह कन्या गंधर्व पुत्री थी और बेहद गुणवान थी। इस कन्या के पिता विद्रविक एक प्रतिष्ठित गंधर्व थे। अंशुमति और धर्म की जब मुलाकात हुई तो दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए। अंशुमति ने एक बार वार्तालाप के दौरान धर्म को बताया कि वो भगवान शिव की भक्त है और प्रदोष व्रत रखती है। धर्म ने भी भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था की बात बताई।
इसके बाद एक दिन विद्रविक को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए और शिव जी ने गंधर्व को आदेश दिया कि वो अपनी पुत्री अंशुमति का विवाह धर्म से कर दें। भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुए विद्रविक ने धर्म से अपनी पुत्री का विवाह संपन्न करवा दिया। विवाह के बाद धर्म को अपना राजपाठ फिर से प्राप्त हो गया और उसके जीवन में सुख-समृद्धि लौट आयी। इस तरह शनि प्रदोष व्रत का श्रद्धा पूर्वक पालन करने से ब्राह्मण पत्नी और उसके परिवार को सुख-समृद्धि प्राप्त हुई। इसी तरह जो भी व्यक्ति शनि प्रदोष व्रत का पालन करते है उसके दुख-दर्दों को भी भगवान शिव दूर कर देते हैं।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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