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अखिलेश-आजम की मुलाकात UP चुनाव 2027 के मद्देनजर कितनी अहम? ओवैसी का दबाव भी कर रहा काम! समझिए सपा की रणनीति

 Written By: Ruchi Kumar
 Published : Oct 22, 2026 08:02 pm IST,  Updated : Oct 22, 2026 09:01 pm IST

UP Assembly Election 2027 से पहले आजम खान और अखिलेश यादव की मुलाकात पर सभी की नजरें रहीं। अनुमान लगाया जा रहा है कि मुस्लिमों को इकट्ठा करने के लिए ये दांव कितना कारगर साबित होगा। क्या इस मुलाकात को कराने में ओवैसी फैक्टर ने भी काम किया है। समझिए मुस्लिम वोटों की गोलबंदी के लिए आजम खान क्यों अहम हैं।

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अखिलेश यादव और आजम खान की मुलाकात के सियासी मायने क्या हैं। Image Source : PTI

यूपी के रामपुर में जेल के बाहर अखिलेश यादव ने आज (गुरुवार को) कहा कि  "जो आजम थे, वो आजम हैं, वो आजम रहेंगे।" अखिलेश यादव ने ये बयान रामपुर जेल में बंद समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता रहे आजम खान से मुलाकात के बाद दिया। वो आज आजम खान से मिलने रामपुर पहुंचे थे। आजम से उनकी ये मुलाकात करीब एक साल बाद हुई। आजम खान पिछले साल 17 नवंबर से जेल में बंद हैं। जेल जाने के 10 दिन पहले 7 नवंबर को वो लखनऊ में अखिलेश यादव से मिले थे। करीब एक साल बाद हुई इस मुलाकात के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। यूपी में 2027 में विधानसभा चुनाव है। अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले में A यानी अल्पसंख्यक, जो यादव के साथ समाजवादी पार्टी के कोर वोटर हैं। इनके समर्थन के बिना सत्ता में वापसी मुश्किल है।

पश्चिमी यूपी से रुहेलखंड तक है आजम खान का प्रभाव

दरअसल, पिछले दिनों आजम खान खेमे में इस बात को लेकर नाराजगी थी कि समाजवादी पार्टी आजम का साथ नहीं दे रही है। आजम खान समाजवादी पार्टी के फाउंडर मेंबर रहे हैं और सपा का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा भी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 20 जिलों की 100 विधानसभा सीटों पर 22 फीसदी मुस्लिम वोट हैं। रुहेलखंड की मुरादाबाद विधानसभा सीट पर 47.12 फीसदी, रामपुर में 50.57 फीसदी, संभल में 45 फीसदी और अमरोहा में 38 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड की कई सीटों पर आजम खान का काफी प्रभाव है। पिछले दिनों अखिलेश यादव ने कहा भी था कि वो अब पार्टी से रूठे पुराने नेताओं को मनाएंगे। अखिलेश यादव कह चुके हैं कि इतना अन्याय किसी परिवार के ऊपर नहीं हुआ होगा, जितना आजम खान के परिवार पर हुआ।

आजम से दूरी पर ओवैसी उठा चुके हैं सवाल

अखिलेश यादव की आज की मुलाकात को AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले दिनों ओवैसी ने भी इस मुद्दे को लेकर रामपुर में अखिलेश को घेरा था। ओवैसी कानपुर ,श्रावस्ती, आजमगढ़ और रामपुर में मुस्लिम बहुल इलाकों में रैली कर सपा पर हमले कर चुके हैं। ओवैसी कह रहे हैं कि “अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा।'' ओवैसी की  25 अक्टूबर को कैराना और 14 नवंबर को मेरठ में भी सभा होनी है।

सपा का खेल बिगाड़ने में पहले भी कामयाब हो चुके हैं ओवैसी

हालांकि, पिछले चुनावों में यूपी में ओवैसी को कोई कामयाबी नहीं मिली। 2017 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा और लगभग सभी पर जमानत जब्त हो गई थी। 2022 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 96 उम्मीदवार उतारे लेकिन सब हार गए। पार्टी को सिर्फ 0.43 फीसदी वोट ही मिले। कामयाबी भले ही ना मिली हो लेकिन कुछ सीटों पर ओवैसी ने सपा के गठबंधन को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। जौनपुर की शाहगंज सीट पर 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के शैलेंद्र यादव ललई केवल 719 वोट से निषाद पार्टी के रमेश सिंह से हार गए थे। यहां एआईएमआईएम के नायब अहमद को 8 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। इसी तरह, बाराबंकी की कुर्सी सीट पर सपा के राकेश कुमार वर्मा केवल 217 वोट से बीजेपी से हार गए थे और यहां ओवैसी के उम्मीदवार को करीब साढ़े 8 हजार वोट मिले थे।

2024 की तरह मुस्लिमों का एकतरफा वोट चाहते हैं अखिलेश

एक सर्वे के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 79 फीसदी मुसलमानों ने सपा को वोट किया था और 2024 के लोकसभा चुनाव में 92 फीसदी मुसलमानों ने इंडिया गठबंधन को वोट दिए थे। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में भी अखिलेश यादव यही प्रदर्शन दोहराने की कोशिश में हैं।

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