बागपत: बागपत के बड़ौत से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो संघर्ष, सफलता, संस्कार और आध्यात्मिक त्याग की अद्भुत मिसाल है। कभी परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए दूध बेचा, आइसक्रीम की रिक्शा चलाई, मेहनत-मजदूरी करके अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर अपनी काबिलियत के दम पर शिक्षक से कॉलेज के प्रिंसिपल तक का सफर तय किया। ये कहानी है वकील चंद जैन की, जिन्होंने जिंदगी में मेहनत से मुकाम हासिल किया, परिवार बसाया, बच्चों की जिम्मेदारियां निभाईं और सैकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य संवारा लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उनकी मंजिल अब सांसारिक सुख-सुविधाएं, पद और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना है।
जैन धर्म में मुनि दीक्षा केवल घर-परिवार छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि मोह-माया, इच्छाओं और परिग्रह का त्याग कर आत्मा की शुद्धि के मार्ग पर चलने का संकल्प है। दिगंबर जैन मुनियों का जीवन कठोर अनुशासन, अहिंसा, अपरिग्रह, संयम, सीमित आहार और पैदल विहार की तपस्या से जुड़ा होता है। जहां आज इंसान सुविधाएं जुटाने की दौड़ में लगा है, वहीं वकील चंद जैन जीवन की उपलब्धियों को पीछे छोड़कर त्याग और वैराग्य की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। आखिर एक सफल शिक्षक और प्रधानाचार्य के मन में वैराग्य का भाव कैसे जागा? क्या है उनके इस आध्यात्मिक निर्णय के पीछे की प्रेरणा? संघर्ष से शिखर और शिखर से संन्यास की ओर बढ़ते इस अनूठे सफर की कहानी आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगी।
दूध बेचने से शुरू हुआ संघर्ष का सफर
जीवन में कुछ लोग अपनी मेहनत से सफलता की ऐसी इबारत लिखते हैं, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाती है। बागपत के बड़ौत निवासी वकील चंद जैन का जीवन भी संघर्ष, संकल्प, शिक्षा और आध्यात्मिक साधना की ऐसी ही कहानी है। बचपन में परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए दूध बेचने से लेकर खाट बुनने, सिलाई का काम करने और आइसक्रीम की रिक्शा चलाने तक उन्होंने मेहनत की।
कभी अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाया, तो छोटे भाइयों की शिक्षा में भी सहयोग किया। जीवन में आगे बढ़ने की इसी जिद ने उन्हें शिक्षक बनाया और फिर कॉलेज के प्रिंसिपल पद तक पहुंचाया। अब वह सांसारिक उपलब्धियों को पीछे छोड़कर जैन मुनि जीवन की कठिन साधना के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।
मेहनत की कमाई से पूरी की पढ़ाई
31 मार्च 1964 को बड़ौत में जन्मे वकील चंद जैन के पिता जय प्रकाश जैन दूध निकालकर घर-घर पहुंचाने का काम करते थे। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच वकील चंद जैन ने भी बचपन से काम करना शुरू कर दिया। पढ़ाई के साथ मेहनत और परिवार की मदद उनके जीवन का हिस्सा रही। उन्होंने 12वीं के बाद मोदीनगर से एमकॉम की पढ़ाई पूरी की। संघर्ष के उस दौर में उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपनी मंजिल के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
साबुन की एजेंसी से कॉलेज में शिक्षक तक
एमकॉम की पढ़ाई के दौरान बने मित्र राजीव के माध्यम से उन्हें चेतक साबुन की एजेंसी मिली। बड़ौत में कारोबार शुरू किया। इसी दौरान दिगंबर जैन इंटर कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल शिखर चंद जैन से मुलाकात ने उनके जीवन को नई दिशा दी। उनकी योग्यता को देखते हुए अप्रैल 1986 में उन्हें कॉमर्स विषय में शिक्षण का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी ऑनर्स में एमए की डिग्री और बीएड भी किया। आगे चलकर वह अंग्रेजी के लेक्चरर बने। वर्ष 1996 में एनसीसी से जुड़े और कर्नल पद तक पहुंचे। वर्ष 2015 में उन्हें प्रिंसिपल का पद मिला और 2025 तक उन्होंने इसी पद पर सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने सेवानिवृत्ति ले ली।
गुरु सान्निध्य में जागे वैराग्य के भाव
शिक्षा और करियर में सफलता हासिल करने के बावजूद उनके भीतर आध्यात्मिक जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ता गया। जीवन परिचय के अनुसार, वर्ष 2014 में विमर्श सागर जी महाराज के चातुर्मास के दौरान उनके मन में मुनि बनने की भावना जागी। वर्ष 2023 में गुरु विशुद्ध सागर जी महाराज के ससंघ के चातुर्मास में उन्हें आशीर्वाद मिला और उनके भविष्य के वैराग्य जीवन की घोषणा हुई। अंततः 9 जून 2025 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उन्होंने गृह-त्याग कर मुनि संघ का मार्ग अपना लिया।
पिता की अंतिम इच्छा बनी प्रेरणा
वकील चंद जैन के आध्यात्मिक झुकाव के पीछे उनके परिवार के संस्कारों की भी अहम भूमिका रही। उनके पिता जय प्रकाश जैन वर्ष 1996 से 2021 तक एक समय भोजन, विभिन्न धार्मिक व्रतों और उपवासों के नियमों का पालन करते रहे। उनके पिता की साधु बनने की इच्छा अधूरी रह गई थी। माता-पिता के प्रति गहरे सम्मान और पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने की भावना ने भी वकील चंद जैन के वैराग्य के निर्णय को प्रेरित किया।
नग्नता नहीं, त्याग और अपरिग्रह की साधना
दिगंबर जैन परंपरा में मुनि जीवन केवल वस्त्रों का त्याग नहीं, बल्कि मोह, माया, संग्रह और सांसारिक आकर्षणों से दूर होने की कठिन साधना है। दीक्षा के बाद मुनि अपरिग्रह, अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य जैसे महाव्रतों का पालन करते हैं। दिगंबर मुनि वस्त्रों का भी त्याग करते हैं और पैदल विहार करते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार करते हैं। उनका जीवन मौसम की कठिनाइयों, लंबी यात्राओं, सीमित आहार और कठोर अनुशासन के बीच बीतता है। वे भौतिक सुविधाओं पर निर्भर रहने के बजाय आत्मसंयम और साधना को प्राथमिकता देते हैं। यह मार्ग आसान नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, दृढ़ संकल्प और गुरु के मार्गदर्शन की मांग करता है।
परिवार, पद और प्रतिष्ठा से आगे आत्मकल्याण की राह
वकील चंद जैन विवाहित हैं। उनके परिवार में पत्नी बबीता जैन, दो बेटे अंकित और रोहित तथा बेटी शिप्रा हैं। उनके जीवन में परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा और शिक्षा जगत में उपलब्धियों का महत्वपूर्ण स्थान रहा। प्रिंसिपल के रूप में जिम्मेदारी निभाने के बाद अब उनका लक्ष्य आत्मकल्याण और आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ना है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सफलता का अर्थ केवल ऊंचा पद हासिल करना नहीं, बल्कि अपने जीवन के उद्देश्य को पहचानना भी है।
वकील चंद जैन की जीवन यात्रा संघर्ष से शुरू होकर शिक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और अब वैराग्य तक पहुंची है।
परिवार और संस्कारों से जुड़ा है जीवन
वकील चंद जैन का जन्म 31 मार्च 1964 को बड़ौत में हुआ। उनके पिता जय प्रकाश जैन और माता मति रामवती जैन थीं। परिवार में बड़े भाई मुकेश कुमार जैन और लोकेश कुमार जैन, छोटे भाई रविंद्र कुमार जैन तथा बड़ी बहन अनीता जैन हैं। उनका विवाह 3 जुलाई 1987 को दिल्ली के दरिबा कलां निवासी बबीता जैन से हुआ। परिवार में दो बेटे अंकित जैन और रोहित जैन तथा बेटी शिप्रा जैन हैं। उनके परिवार में पोते-पोतियां और नाती-नातिन भी हैं। इस तरह उनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवार और संस्कारों से भी गहराई से जुड़ा रहा।
बागपत से रहा है गहरा नाता
बागपत जिले के बड़ौत नगर से जुड़े वकील चंद जैन ने यहीं अपने संघर्ष और कर्मठता के बल पर पहचान बनाई। उनका दिगंबर जैन इंटर कॉलेज बड़ौत से लंबा जुड़ाव रहा, जहां उन्होंने शिक्षक, अंग्रेजी के लेक्चरर और बाद में प्रधानाचार्य के रूप में सेवाएं दीं। स्थानीय जैन समाज के धार्मिक आयोजनों में भी उनके परिवार की भागीदारी रही है।
पद और प्रतिष्ठा से आगे चुना आत्मसाधना का मार्ग
वकील चंद जैन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि इंसान अपनी मेहनत से विपरीत परिस्थितियों को बदल सकता है। बचपन में परिवार की मदद के लिए छोटे-मोटे काम करने से लेकर शिक्षा जगत में सम्मानजनक पद तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। वर्षों तक अध्यापन और प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी निभाने के बाद उनके जीवन में आध्यात्मिक चिंतन अधिक महत्वपूर्ण होता गया। आचार्य विमर्श सागर जी महाराज के सान्निध्य में वर्ष 2014 में वैराग्य की भावना जागी और बाद में आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज के संघ से जुड़ाव ने इस संकल्प को और दृढ़ किया।
बड़ौत के लिए प्रेरणा की कहानी
वकील चंद जैन की कहानी का एक पहलू संघर्ष है, दूसरा शिक्षा और सेवा, जबकि तीसरा त्याग और आत्मकल्याण की ओर बढ़ने का संकल्प। एक ऐसे व्यक्ति का सांसारिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ना, जिसने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं, विद्यार्थियों को पढ़ाया और संस्थान में नेतृत्व किया, समाज के सामने जीवन के उद्देश्य पर विचार करने का अवसर रखता है। उनके जीवन की यह यात्रा बड़ौत और बागपत के लोगों के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि यह स्थानीय परिवेश में पले-बढ़े एक व्यक्ति के लंबे संघर्ष और उसके बाद चुने गए कठिन आध्यात्मिक मार्ग की कहानी है।
जैन मुनि कितने आदरणीय होते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब आचार्य विद्यासागर महाराज ने समाधि ली तो पीएम मोदी ने शोक जताया था। (इनपुट- पारस जैन)
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