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लेफ्ट का 'पार्टी सोसाइटी' सिस्टम, जिसने 34 साल तक बंगाल में वामपंथ को सत्ता में बनाए रखा

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Apr 15, 2026 10:23 pm IST,  Updated : Apr 15, 2026 10:23 pm IST

पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन को 34 साल तक जनता का समर्थन मिला। ऐसे में यह सवाल उठता है कि बंगाल की मिट्टी में ऐसा क्या था, जिसने कम्युनिस्टों को इतने लंबे वक्त तक सत्ता में बनाए रखा।

पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लेफ्ट का रहा अखंड राज- India TV Hindi
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लेफ्ट का रहा अखंड राज Image Source : INDIA TV

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दहलीज पर खड़ा है और सियासी पारा अपने चरम पर है। ऐसे में बंगाल के चुनावी इतिहास को भी खंगाला जा रहा है। जब बंगाल के चुनावी दौर की चर्चा होती है, तो वामपंथी शासन का जिक्र किए बिना वहां की राजनीति का इतिहास अधूरा रहता है। बंगाल में 34 सालों तक वामपंथी शासन रहा। 1977 से 2011 तक चला यह शासन दुनिया के इतिहास में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार थी। उस दौर में बंगाल की दीवारों पर लाल रंग के सिवा किसी और रंग की कल्पना भी नहीं की जाती थी। बंगाल में वामपंथी शासन को 34 साल तक जनता का अटूट साथ मिला। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि बंगाल की मिट्टी में ऐसा क्या था, जिसने कम्युनिस्टों को इतने लंबे समय तक सत्ता के शिखर पर बनाए रखा।

भारत की राजनीति का यह एक अलग उदाहरण रहा है, जो कि सामान्य राजनीतिक घटना नहीं थी। इसलिए यह सवाल उठता है कि आखिर बंगाल में ऐसा क्या था, जिसके चलते कम्युनिस्ट पार्टी इतने लंबे वक्त तक सत्ता में बनी रही। क्या इसका कारण बंगाली समाज की कोई विशेष साम्यवादी मानसिकता थी, या फिर इसके पीछे ऐतिहासिक और सामाजिक वजहें थीं? इसके लिए सबसे पहले बंगाल को समझने की जरूरत है। 

19वीं सदी में जिस दौर को बंगाल पुनर्जागरण कहा जाता है। इस दौरान यहां समाज और सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा बहुत तेजी से मजबूत हुई। राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने धर्म, जाति, महिलाओं की स्थिति और सामाजिक अन्याय पर खुलकर बहस की। वहीं, बंगाल में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ राजनीतिक चेतना भी बहुत पहले पैदा हो चुकी थी। बंगाल में अखबार, किताबें, कविता और नाटक सिर्फ मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि समाज और सत्ता की आलोचना के मंच भी थे। बंगाली समाज के बीच चाय की दुकानों से लेकर साहित्यिक सभाओं तक हर जगह सियासत पर हमेशा बहस होती रही। यही वजह है कि जब 20वीं सदी में मार्क्सवाद जैसे विचार आए तो बंगाल के लोगों को यह अजनबी नहीं लगे, क्योंकि बराबरी, न्याय और शोषण जैसे विचार पहले से ही समाज में मौजूद थे

गांवों में वामपंथ की मजबूत पकड़

आजादी से पहले और उसके बाद लंबे समय तक बंगाल का किसान जमींदारी शोषण से परेशान थे। बटाईदार किसानों के पास जमीन थी, लेकिन कानूनी सुरक्षा नहीं थी। इसकी वजह से वह डर में जीते थे। जब 1977 में लेफ्ट पार्टी सत्ता में आई तो 'ऑपरेशन बर्गा' शुरू किया। और फिर बटाईदार किसानों का पंजीकरण किया गया और उन्हें कानूनी अधिकार दिए गए। कुछ ही वर्षों में 12 से 15 लाख बटाईदार किसानों को यह सुरक्षा मिली। इसके अलावा, सरकार ने अतिरिक्त कृषि भूमि को गरीब किसानों में बांटा। पूरे देश में जितनी अतिरिक्त जमीन वितरित हुई, उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल में ही हुआ। इससे लाखों दलित, आदिवासी और गरीब परिवार पहली बार जमीन के मालिक बने। इससे ग्रामीण इलाकों में वामपंथ की मजबूत पकड़ बनी।

इस दौरान कांग्रेस पार्टी बंगाल में कमजोर होती चली गई। 70 के दशक में कांग्रेस गुटबाजी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अस्थिरता से जूझ रही थी। इमरजेंसी की यादें भी लोगों के मन में ताजा थीं। तब कम्युनिस्ट पार्टी ने खुद को एक अनुशासित, सादा और वैचारिक रूप से साफ विकल्प के रूप में पेश किया। लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु ने अपने भाषणों में कई बार यह कहा कि उनकी पार्टी लोकतंत्र और संविधान के भीतर रहकर बदलाव की बात करती है। इससे बंगाल के मध्यम वर्ग का डर भी बहुत हद तक कम हुआ।

लेफ्ट का 'पार्टी सोसाइटी' सिस्टम 

वामपंथ के लंबे शासन को समझने के लिए 'पार्टी सोसाइटी' का कॉन्सेप्ट समझना भी अहम है। वामपंथ के सत्ता में रहते बंगाल में धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन गई थी, जहां पार्टी और समाज के बीच की दूरी लगभग खत्म हो गई थी। गांवों में लोगों के छोटे-बड़े काम जैसे- जमीन विवाद, सरकारी योजनाएं, नौकरी की सिफारिश, इन सबके लिए लोग सीधे पार्टी कार्यकर्ताओं के पास जाते थे। स्थानीय स्तर पर पार्टी ही एक तरह से 'मध्यस्थ' बन गई थी। कई जगहों पर प्रशासन से ज्यादा असर पार्टी कैडर का दिखता था। इस तरह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने एक समानांतर सामाजिक ढांचा खड़ा कर लिया था, जिसे ही "पार्टी सोसाइटी" कहा गया। इस सिस्टम ने वामपंथ को चुनाव जीतने में लगातार मदद की। ऐसे में कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं थी। सीपीआई(एम) गांव-गांव तक फैला हुआ संगठन था। शिक्षक संगठन, ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन और स्थानीय कमेटियां पार्टी से जुड़ी हुई थीं। 

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