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नेपाल में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद अस्थिरता के भंवर में फंसा देश, राजनीतिक इतिहास पर भी डालें नजर

 Published : Sep 10, 2025 05:27 pm IST,  Updated : Sep 10, 2025 05:27 pm IST

नेपाल में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच राजनीतिक हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। सत्ता से लेकर विपक्षी नेताओं तक को निशाना बनाया है। स्थिति ऐसी बन गई है कि नेपाल अस्थिरता के भंवर में फंसा हुआ नजर आ रहा है।

Nepal Gen-Z Protest- India TV Hindi
Nepal Gen-Z Protest Image Source : AP

काठमांडू: नेपाल में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ है और इस दौरान हुई हिंसा ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। स्थिति ऐसी बन गई कि नेपाल में हालात को काबू करने के लिए सेना को आगे आना पड़ा है। सेना ने विरोध प्रदर्शन की आड़ में हिंसा को रोकने के लिए देशव्यापी प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए हैं और कर्फ्यू लगा दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है कि जब एक दिन पहले ही सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के कारण केपी ओली को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। प्रदर्शन के दौरान देश की संसद समेत प्रमुख इमारतों में आग लगा दी गई थी।

नेपाल में सेना ने उठाए बड़े कदम

सेना ने एक बयान में कहा कि प्रदर्शन की आड़ में लूटपाट, आगजनी और अन्य हिंसक गतिविधियों की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं। मंगलवार रात 10 बजे से देशभर में सुरक्षा अभियान की कमान संभालने वाली सेना ने चेतावनी दी कि प्रतिबंधात्मक अवधि के दौरान किसी भी प्रकार के प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी या व्यक्तियों और संपत्ति पर हमले को आपराधिक कृत्य माना जाएगा और उचित तरीके से उससे निपटा जाएगा। वैसे देखा जाए तो नेपाल में अस्थिरता के लंबा इतिहास रहा है। चलिए इसी पर एक नजर डालते हैं।

अस्थिरता से भरा रहा है नेपाल का राजनीतिक इतिहास

नेपाल, हिमालय की गोद में बसा एक सुंदर और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देश है। परंतु, अपने भौगोलिक वैभव और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद नेपाल का राजनीतिक इतिहास लगातार अस्थिरता से गुजरता रहा है। यहां लोकतंत्र की नींव रखने से लेकर राजतंत्र के पतन और फिर गणतंत्र की स्थापना तक की यात्रा उथल-पुथल से भरी रही है।

राजतंत्र से लोकतंत्र तक की यात्रा

नेपाल में लंबे समय तक शाह वंश का राज रहा। 18वीं शताब्दी में पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल को एकीकृत किया और आधुनिक नेपाल की नींव रखी। इसके बाद लगभग ढाई सौ वर्षों तक राजशाही ही सत्ता का केंद्र बनी रही। 20वीं सदी के मध्य में लोकतंत्र की मांग उठी और 1951 में राणा शासन का अंत हुआ। हालांकि, असली लोकतांत्रिक व्यवस्था जमीनी स्तर पर कभी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाई। राजा और राजनीतिक दलों के बीच टकराव लगातार बना रहा।

पंचायत व्यवस्था और जनआंदोलन

1960 में राजा महेंद्र ने बहुदलीय व्यवस्था समाप्त कर ‘पंचायत व्यवस्था’ लागू की। यह एक तरह का नियंत्रित शासन था, जिसमें राजा ही सर्वोच्च था। इस व्यवस्था के खिलाफ जनता और राजनीतिक दलों में असंतोष बढ़ता गया। 1990 का जनआंदोलन नेपाल के इतिहास का बड़ा मोड़ साबित हुआ। इसके बाद बहुदलीय लोकतंत्र की वापसी हुई और संविधान बना।

गृहयुद्ध और माओवादी विद्रोह

1996 से 2006 तक नेपाल ने एक और भीषण दौर देखा। माओवादी विद्रोह ने देश को गहरे संकट में डाल दिया। इस दस साल के गृहयुद्ध में हजारों लोग मारे गए और नेपाल की राजनीतिक स्थिरता पूरी तरह हिल गई। 2001 में दरबार हत्याकांड ने देश को और भी गहरे संकट में धकेल दिया। राजा बीरेन्द्र और उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए, जिसके बाद राजा ज्ञानेंद्र सत्ता में आए। परंतु उनकी निरंकुश नीतियों के चलते जनता में भारी आक्रोश पनपा।

गणतंत्र की स्थापना

2006 के जनआंदोलन ने नेपाल के इतिहास की धारा बदल दी। जनता के दबाव और राजनीतिक दलों की एकजुटता ने राजतंत्र को खत्म कर दिया। 2008 में नेपाल को आधिकारिक रूप से गणतंत्र घोषित किया गया और संघीय लोकतांत्रिक संविधान 2015 में लागू हुआ।

वर्तमान में राजनीतिक अस्थिरता

संविधान लागू होने के बाद उम्मीद थी कि नेपाल स्थिरता की ओर बढ़ेगा, परंतु हालात अब भी अलग हैं। लगातार सरकारों का गिरना, दल-बदल, कमजोर गठबंधन और सत्ता संघर्ष नेपाल की राजनीति की पहचान बन गए। प्रधानमंत्री के पद पर बार-बार बदलाव, अदालत और राष्ट्रपति के बीच टकराव तथा क्षेत्रीय और जातीय मुद्दों के कारण नेपाल आज भी अस्थिर राजनीतिक हालात से गुजर रहा है।

नेपाल को उठाने होंगे बड़े कदम

नेपाल का राजनीतिक इतिहास संघर्षों और परिवर्तनों से भरा रहा है। राजतंत्र से लेकर गणतंत्र तक की यात्रा ने इसे नई पहचान दी है, परंतु अस्थिरता अब भी बड़ी चुनौती है। नेपाल को स्थिर और समृद्ध भविष्य की ओर बढ़ने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे। भ्रष्टाचार और दल-बदल की सियासत को रोकना साथ ही जनता की आकांक्षाओं को प्राथमिकता देनी होगी।

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