वाशिंगटन: शरण मांगने वाले उन 22 भारतीय सिखों में से 20 लोगों को बॉण्ड के आधार पर रिहा कर दिया गया है, जो आव्रजन विभाग की कथित अनुचित कार्यप्रणाली के विरोध में फ्लोरिडा के हिरासत केंद्र में दो सप्ताह से अधिक समय से भूख हड़ताल पर बैठे थे। शरण मांगने वाले ये 20 लोग छह माह से ज्यादा समय तक विभिन्न देशों की यात्रा करते हुए पैदल टेक्सास की सीमा पर पहुंचे थे। इसके बाद ये लोग आईसीई इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट के उस फैसले के खिलाफ 25 जुलाई को हड़ताल पर चले गए थे, जिसके तहत उन्हें बॉण्ड की अनुमति देने से इंकार कर दिया गया था। इसके साथ ही इनके विरोध की वजह आव्रजन न्यायाधीश रेक्स फोर्ड की वह नीति भी है, जिसके तहत आव्रजन संबंधी मामलों में हिरासत में लिए गए उन लोगों को ग्रांट बॉण्ड देने से इंकार किया जाता है, जिनके परिजन अमेरिका में नहीं हैं। नॉर्थ अमेरिकन पंजाबी असोसिएशन के कार्यकारी निदेशक सतनाम सिंह चहल ने कहा कि मियामी स्थित एक गुरूद्वारे के एक प्रमुख ग्रन्थी इन लोगों को दक्षिण फ्लोरिडा के हिरासत केंद्र से अपने साथ ले गए । वह नियमित रूप से आईसीई अधिकारियों के संपर्क में थे और इन्होंने इन सिखों की रिहाई में अहम भूमिका निभाई।
चहल ने कहा कि हालांकि इन्हें जेल से रिहा कर दिया गया है लेकिन आव्रजन दर्जा मिल जाने के बाद भी अमेरिका में इनका भविष्य अनिश्चितता से भरा है। खुद को यहां स्थापित करने के लिए इन्हें बहुत मुश्किलों से जूझना होगा। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन ऑफ फ्लोरिडा की स्टाफ अटॉर्नी शालिनी अग्रवाल ने पिछले सप्ताह आईसीई को पत्र लिखकर इन लोगों की रिहाई की मांग की थी। शालिनी ने कहा, चीजों को कभी भी इतने चरम बिंदु तक नहीं पहुंचना चाहिए था।
उन्होंने कहा, आईसीई को आंतरिक सुरक्षा विभाग द्वारा तय की गई आव्रजन कानून से जुड़ी प्राथमिकताओं का सम्मान करना चाहिए और शरण मांगने वालों को बिना बॉण्ड के हिरासत में रखना अभियोजन के लिहाज से कोई विवेक का काम नहीं है। खासकर तब, जब इन लोगों ने अपने देश लौटने पर अत्याचार का भय साबित करके दिखाया हो। उन्होंने कहा, इनमें से कुछ लोगों को बॉण्ड दे देना अहम कदम है लेकिन इनकी तरह कई अन्य लोग भी हिरासत में हैं, जिन्हें सलाखों के पीछे नहीं रखा जाना चाहिए, जबकि उनकी शरण संबंधी कार्यवाही जारी है।