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एचआईवी/एड्स की दवाओं पर भारतीय नीति के पक्ष में UN

 Written By: IANS
 Published : Jun 09, 2016 07:11 pm IST,  Updated : Jun 09, 2016 07:12 pm IST

दुनिया भर के गरीबों के लिए एचआईवी और एड्स जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए जेनरिक दवाएं बनाने की इजाजत देने की भारत की नीति को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की स्वीकृति मिल गई है।

HIV AIDS MEDICINES
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उन्होंने कहा, सस्ती दवाओं की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भारत ट्रिप के लचीलेपन को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

ट्रिप विश्व व्यापार संगठन के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय करार है जो पेटेंट दवाए हैं उनका जेनरिक संस्करण बनाने पर रोक लगाता है। हालांकि, ट्रिप के अंतर कथित लचीलापन देशों को कुछ खास परिस्थितियों में अनिवार्य लाइसेंस जारी कर दवाओं की सस्ती जेनरिक दवाएं बनाने की इजाजत देते हैं।

इस घोषणा में कहा गया कि बौद्धिक संपदा अधिकार को लागू करने के उपायों को इस रूप में समझा जाना चाहिए कि वे सदस्य राष्ट्रों के जन स्वास्थ्य के अधिकारों का मददगार है और खासकर सबको दवा की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को बढ़ावा देता है।

दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत पर जेनरिक दवाएं बनाने के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के खिलाफ दबाव बना रही हैं। डॉक्टर्स विदाउट बार्डर या मेडिसिन्स सैन्स फ्रांटियर्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानवातावादी संगठन इसके जवाब में भारत के दवाओं के सस्ते संस्करण बनाने की इजाजत देने के पक्ष में अभियान चला रहे हैं।

नड्डा ने कहा कि भारत एड्स की महामारी का 15 साल पहले सामना कर चुका है। वर्ष 2007 से एड्स की वजह से होने वाली मौतों में करीब 55 फीसदी की कमी आई है। वर्ष 2000 से एचआईवी संक्रमण करीब 66 फीसदी घटा है। करीब दस लाख लोगों का अभी इलाज चल रहा है।

लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराए बगैर यह उल्लेखनीय सफलता हासिल कर पाना संभव नहीं था।

भारत के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के आकलन के अनुसार, वर्ष 2015 में 21 लाख लोग एड्स से पीड़ित थे और उस साल 86 हजार नए संक्रमण सामने आए थे।

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