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वेलकम बैक फिल्म रिव्यू

 Written By: Abhishek Gupta
 Published : Sep 03, 2015 11:56 pm IST,  Updated : Sep 04, 2015 03:09 pm IST

रेटिंग्स- *** कलाकार- जॉन अब्राहम, ऋुति हासन, नाना पाटेकर, अनिल कपूर, परेश रावल निर्देशक-  अनीस बज्मी शैली- कॉमेडी सीक्वेल के इस दौर में कई फिल्ममेकर्स अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस कोशिश में कुछ को

वेलकम बैक फिल्म रिव्यू- India TV Hindi
वेलकम बैक फिल्म रिव्यू

रेटिंग्स- ***

कलाकार- जॉन अब्राहम, ऋुति हासन, नाना पाटेकर, अनिल कपूर, परेश रावल

निर्देशक-  अनीस बज्मी

शैली- कॉमेडी

सीक्वेल के इस दौर में कई फिल्ममेकर्स अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस कोशिश में कुछ को सफलता हासिल हुई है, वहीं कुछ ने नाकामयाबी हासिल करने के बाद सीक्वल बनाने की कभी सोचा ही नहीं। इस बार सीक्वल में अपना हाथ आजमा रहे हैं फिल्म निर्देशक अनीस बजमी जिनकी फिल्म वेलकम काफी लोकप्रिय रही थी और इसीलिए लोगों की उनसे उम्मीदें भी बढ़ी हुई हैं।

इस बार खिलाड़ी कुमार का जोर नहीं है वहीं कैटरीना कैफ के जल्वों की कमी भी है लेकिन जॉन अब्राहम और श्रुति हासन फिल्म में उनकी कमी को पूरा करते हुए दिख रहे है। साथ ही अनिल कपूर और नाना पाटेकर का कॉम्बो तो है ही। तो क्या ये सब काफी है वेलकम बैक को हिट कराने के लिए, उसका जवाब देने से पहले आपको बताते हैं फिल्म की कहानी।

पिछली कड़ी के दो भाई उदय (नाना पाटेकर) और मजनु (अनिल कपूर) बुरे काम छोड़कर दुबई में सीधे-साधे बिजनेसमैन बन गए हैं। उनका दिल नजफगढ़ की राजकुमारी चांदनी (अंकिता श्रीवास्तव) पर आ जाता है जिनकी मां नजफगढ़ की रानी (डिंपल कपाड़िया) है। लेकिन उनसे शादी करने से पहले दोनों भाईयों को अपनी सौतेली बहन रंजना (श्रुति हासन) को डोली में बैठाकर विदा करना होगा। यहां एंट्री होती है मुंबई के गुंडे अज्जु (जॉन अब्राहम) की जिनको रंजना से प्यार हो जाता है और जो इत्तेफाक से घुंघरू (परेश रावल) का सौतेला बेटा है। उदय और मजनू अपनी बहन का अंजु से पीछा छुड़ाने के लिए मोस्ट वान्टेड भाई (नसीरुद्दीन शाह) की मदद लेते हैं। लेकिन यहां पर भी ट्विस्ट है और वो जानने के लिए आपको एक बार सिनेमाघरों का रुख करना चाहिए।

अनीस बाजमी की वेलकम काफी इल्लोजिकल थी और ऐसे में इसके सीक्वल से उम्मीद करना कि इसमें तर्क होंगे वो नाइंसाफी होगी। वेलकम बैक लॉजिक्स से कोसों दूर है लेकिन इसके बावजूद ये अंत तक रोमांचक है, ठीक वैसे जैसे वेलकम थी। मैनें उम्मीद नहीं की थी कि अक्षय कुमार की अनुपस्थिति में ये फिल्म इतनी मजाकिया हो सकती है। लेकिन फिल्म के डायलॉग्स और कलाकारों के अभिनय ने मुझे गलत साबित किया।

यकीनन फिल्म में इत्तेफाकों की जो झड़ी लगी है वो रियल लाइफ में मुमकिन नहीं है। घुंघरू का अपने नाजायज गुंडे बेटे को अपनाना तर्कहीन लगता है। रंजना और मंजु जैसे गुंडे के बीच शुरुआती गलतफहमियां और फिर प्यार होना आपको नामंजूर होता है। चांदनी और उसकी मां का अपने ठग व्यवसाय की तस्वीर को ढकने के लिए नजफगढ़ की रानी का चोला पहनना और उसे मजनु-उदय द्वारा सच मान लेना भी हमें मंजूर नहीं हो पाता। ये और ऐसी तमाम बेबुनियाद बातें है जिससे साफ पता चल जाता है कि अनीस बजमी की ये फिल्म तर्क पेश करने में अपना समय व्यस्त नहीं करेगी। फिल्म हंसाने के लिए बनी है और लॉजिक्स की फिक्र न करते हुए ये आपको एक अच्छा समय देती है खूब हंसने के लिए।

टूटे-फूटे जोक्स से ठीक-ठाक शेरों-शायरी तक फिल्म आपको ठहाके लगाने का मौका देती है। एक सीन में डिंपल कपाड़िया को महसूस करते हुए फिल्म में नेत्रहीन नसीरुद्दीन शाह फरमाते है, "कांटो की तरफ क्यों ले चल रहे हो, जब खुशबू तो वहां है।" जोक्स भी ऐसे है कि जिनपर ज्यादा काम नहीं हुआ है। थोड़े सुने-सुनाए और थोड़े डबल-मीनिंग वाक्य और आपकी हंसी की पाठशाला तैयार है। और इस पाठशाला में अव्वल है अनिल कपूर-नाना पाकेकर की जोड़ी। दोनों की दादगिरी यहां कम नहीं हुई है। एक-दूसरे की और बाकियों की जिस अंदाज में ये दोनों टांग खींचते हैं वो उतना ही शानादार है जितना पहले था। यहां पर मैं कहना चाहुंगा कि अनिल कपूर की टाइमिंग और उनका अभिनय सबसे अलग है। हर एक फ्रेम में वो छा जाते है।

अक्षय कुमार के मित्र जॉन अब्राहम से बेहतर विकल्प और कोई नहीं हो सकता था एक बाहुबली गुंडे के लिए। जॉन अपनी बॉडी और मसल्स का खूब प्रदर्शन करते है और उनकी स्क्रीन प्रेसेन्स काफी प्रभावशाली है। श्रुति हासन का फिल्म में अभिनय ठीक है हालांकि एक कमर्शियल इंटरटेनर में वो खूबसूरती बिखेरने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पाती या यू कह सकते है कि उन्हें मौका नहीं मिलता अपनी अदाकारी दिखाने का।

परेश रावल अपने किरदार को फिर से जीते है और अपने हिस्से में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर कमाल के अभिनय का उदाहरण पेश करते है और खूब 'मजाक'  करते है।फिल्म की कमजोर कड़ियों में से एक है इसके गाने। एक भी गीत यादगार नहीं है और कुछ तो जबरन फिल्म में डाले गए है। इसके बावजूद ये फिल्म में छोटी सी ही खलल पैदा करती है। वेल्कम बैक एक बार जरूर देखी जा सकती है बशर्ते आप अपना दीमाग घर पर रखकर जाए। ये वेल्कम जितनी तर्कहीन है लेकिन उससे थोड़ी ज्यादा इंटरटेनिंग है।

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