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आवारापन 2 रिव्यू: दर्द, अकेलापन और वही पुराना शिवम पंडित! रंग लाया 19 साल का लंबा इंतजार

 Written By: Anindita Mukhopadhyay
 Published : Aug 14, 2026 03:43 pm IST,  Updated : Aug 14, 2026 03:46 pm IST

'आवारापन 2' में 19 साल बाद इमरान हाशमी बतौर शिवम पंडित लौटे हैं। बच्ची को मानव तस्करी से बचाने की इस कहानी में बेहतरीन संगीत, नॉस्टैल्जिया और दमदार अभिनय है, हालांकि पटकथा थोड़ी धीमी व पूर्वानुमानित है।

emraan hashmi
इमरान हाशमी। Photo: VISHESH FILMS/INSTAGRAM
  • फिल्म रिव्यू: आवारापन 2
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 14.08.2026
  • डायरेक्टर: नितिन कक्कड़
  • शैली: क्राइम थ्रिलर

साल 2007 भारतीय सिनेमा और विशेषकर इमरान हाशमी के प्रशंसकों के लिए एक बेहद खास दौर था। उस दौर में बॉलीवुड काफी हद तक सरल और सादगी भरा हुआ करता था। उसी साल बड़े पर्दे पर एक ऐसा किरदार उभरा, जिससे हिंदी सिनेमा का एक बड़ा दर्शक वर्ग गहराई से जुड़ गया 'शिवम पंडित'। एक टूटा हुआ, खामोश और अपनी अधूरी मोहब्बत के गम में डूबा हुआ आशिक। उस वक्त किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक किरदार की खुमारी लोगों के दिलों पर इतने लंबे समय तक छाई रहेगी। 19 सालों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार निर्माताओं ने 'आवारापन' की उस डार्क, भावुक और खूनी दुनिया में दोबारा कदम रखा है। जब सिनेमाघरों में 'आवारापन 2' का पहला शो शुरू हुआ, तो थिएटर्स के बाहर दर्शकों का तांता और लगभग हाउसफुल शोज इस बात का सबूत थे कि शिवम पंडित का जादू आज भी फीका नहीं पड़ा है। सवाल यह उठता है कि क्या नितिन कक्कड़ के निर्देशन में बनी 'आवारापन 2' पहले भाग के उस जादुई अहसास, दर्द और संगीत को दोबारा पर्दे पर जीवंत कर पाती है? इसका जवाब काफी हद तक 'हां' में है।

क्या है आवारापन 2 की कहानी और प्लॉट?

'आवारापन 2' की कहानी ठीक उसी जगह से आगे बढ़ती है, जहां 2007 की पहली फिल्म खत्म हुई थी। श्रिया सरन द्वारा निभाया गया 'आलिया हामिद' का किरदार अब इस दुनिया में नहीं है और शिवम पंडित (इमरान हाशमी) एक बार फिर अपने उसी पुराने अकेलेपन और खालीपन के मोड़ पर खड़ा है। वह अब जरायम की दुनिया और गोलियों की तड़तड़ाहट से काफी दूर एक शांत जीवन जीने की कोशिश कर रहा है। उसका अधिकांश समय अपनी दिवंगत प्रेमिका की मजार के पास गुमसुम बैठकर बितता है। दर्द और यादों के इस भंवर के बीच एक दिन जब वह कब्र के पास बैठा होता है, तो उसे एक लावारिस नवजात बच्ची के रोने की आवाज सुनाई देती है।

शिवम उस बच्ची को अपनी गोद में उठाता है और उसे एक अनाथालय के हवाले कर देता है। हालांकि, वह अपनी पुरानी मोहब्बत की याद में उस बच्ची का नाम भी 'आलिया' रखता है और दूर रहकर चुपचाप उस पर अपनी नजर बनाए रखता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब एक परिवार उस मासूम बच्ची को गोद लेने के लिए सामने आता है। बच्ची शिवम को छोड़कर नहीं जाना चाहती, लेकिन शिवम अपनी निजी भावना को दबाकर उसे उस परिवार के साथ भेज देता है, क्योंकि उसका मानना है कि बच्ची एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य की हकदार है।

लेकिन शिवम का यह फैसला जल्द ही एक भयानक दुखद सपने में बदल जाता है। उसे पता चलता है कि जिस परिवार ने बच्ची को गोद लिया था, वह दरअसल फर्जी था और बच्ची मानव तस्करी के एक बेहद खौफनाक और खतरनाक अंतरराष्ट्रीय रैकेट के जाल में फँस चुकी है। जब शिवम को यह अहसास होता है कि वह अपनी आलिया को दूसरी बार खोने की कगार पर है, तो उसके भीतर का सोया हुआ भाड़े का हत्यारा फिर से जाग उठता है। वह अपनी बच्ची को बचाने और इस रैकेट के मास्टरमाइंड को बेनकाब करने के लिए दोबारा अपने पुराने खूनी रास्ते पर लौट आता है। उसका यह खोजी अभियान उसे बैंकॉक की खतरनाक गलियों तक ले जाता है, जहां उसे अहसास होता है कि यह जाल सिर्फ एक बच्ची तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार एक बहुत बड़े जुर्म के साम्राज्य से जुड़े हैं। अब उसके सामने दो मुख्य चुनौतियां हैं, इस सिंडिकेट की जड़ें उखाड़ना और अपनी मासूम आलिया की हर कीमत पर रक्षा करना।

इमरान हाशमी का दबदबा और दमदार सपोर्टिंग कास्ट

पंजाबी व बॉलीवुड अभिनेता राघव जुयाल ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में मजाकिया अंदाज में कहा था, 'अक्खा बॉलीवुड एक तरफ, इमरान हाशमी एक तरफ' और 'आवारापन 2' देखने के बाद आप इस बात से पूरी तरह सहमत हो जाएंगे। इमरान हाशमी के रूप में शिवम पंडित इस पूरी फिल्म की आत्मा और सबसे मजबूत स्तंभ हैं। उनका गंभीर और उदास चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, लंबे बाल और आंखों का खालीपन बिना एक भी शब्द बोले बहुत कुछ कह जाता है। एक ठुकराए गए और प्यार में टूटे हुए इंसान का दर्द वे बेहद स्वाभाविकता के साथ पर्दे पर उतारते हैं। उनका चलने का तरीका, उनका सन्नाटा और उनकी नजरें शिवम के व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी हैं। उन्हें पर्दे पर देखते ही दर्शक सीधे 2000 के दशक के उस दौर में पहुंच जाते हैं, जब इमरान हाशमी के 'लॉस्ट लवर' वाले अंदाज ने एक पूरी पीढ़ी को अपना दीवाना बना रखा था। फिल्म में दिशा पाटनी ने 'जारा' का किरदार निभाया है। ट्रेलर देखकर ऐसा लगा था कि उनका रोल बेहद सीमित होगा, लेकिन फिल्म में उनके किरदार को काफी गहराई और स्पेस दिया गया है। हालाँकि कुछ दृश्यों में उनकी डायलॉग डिलीवरी थोड़ी बेहतर हो सकती थी, लेकिन कुल मिलाकर वह फिल्म की कहानी को एक मजबूत सहारा देती हैं।

मुख्य खलनायक 'जोरावर' के रूप में पूरन गब्बी ने एक सनकी, मनोरोगी और अजीब किस्म के साइकोपैथ विलेन का किरदार निभाया है। पर्दे पर उनकी मौजूदगी दर्शकों के भीतर एक बेचैनी और अजीब सी सिहरन पैदा करती है। उनके अजीबोगरीब डांस मूव्स और उनके काम करने का अजीब तरीका फिल्म के खौफनाक माहौल को और बढ़ा देता है। इमरान हाशमी जैसे मंझे हुए अभिनेता के सामने विलेन के रूप में खुद को साबित करना कोई आसान काम नहीं था, खासकर तब जब यह उनके करियर की शुरुआती प्रमुख भूमिकाओं में से एक हो, लेकिन पूरन गब्बी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी ने नाफिसा का किरदार निभाया है, जो एक खूंखार गैंगस्टर गैंग की लीडर हैं। यद्यपि पर्दे पर उनका स्क्रीन टाइम काफी कम है, लेकिन वे जितनी देर भी स्क्रीन पर रहती हैं, पूरे फ्रेम पर अपना दबदबा कायम कर लेती हैं। उनके किरदार में और अधिक खौफनाकपन लाने की गुंजाइश थी, जिसका इस्तेमाल निर्देशक थोड़ा और कर सकते थे। इसके अलावा सुविंदर विक्की जो आजकल हर दूसरी बेहतरीन थ्रिलर का हिस्सा हैं, इस फिल्म में भी एक बेहद जटिल और परतदार भूमिका में नजर आते हैं। उनका अभिनय फिल्म की कहानी को एक अलग ही गांभीर्य और बौद्धिक गहराई प्रदान करता है।

फिल्म के सबसे बेहतरीन क्षण और नॉस्टैल्जिया का तड़का

'आवारापन 2' शुरुआत से ही दर्शकों को अपनी रहस्यमयी और दर्दभरी दुनिया में खींच लेती है। मेकर्स ने पुरानी यादों यानी नॉस्टैल्जिया के कार्ड को बेहद बुद्धिमत्ता के साथ खेला है। जब थियेटर की स्क्रीन पर इमरान हाशमी का चेहरा सामने आता है और बैकग्राउंड में 'तो फिर आओ' का एक नया और धीमा रीमेक बजना शुरू होता है, तो हॉल में मौजूद दर्शकों की आहें साफ सुनी जा सकती हैं। वह एक ऐसा लम्हा होता है जब दर्शक खुद-ब-खुद 19 साल पुरानी 'आवारापन' की दुनिया में वापस लौट जाते हैं। फिल्म में एकाकीपन है, खोया हुआ प्यार है, बदले की आग है और रोंगटे खड़े कर देने वाला एक्शन भी है। लेकिन इस पूरे ताने-बाने का सबसे खूबसूरत हिस्सा फिर से 'शिवम पंडित' का किरदार ही बनकर उभरता है। जब स्क्रीन पर शिवम पिटता है या दर्द से कराहता है, तो दर्शक उस दर्द को निजी तौर पर महसूस करते हैं। उसका अकेलापन, उसकी खामोशी और उसका उदास चेहरा फिल्म के खत्म होने के बाद भी दिमाग में बना रहता है। कहानी के बीच-बीच में कुछ पुराने जाने-पहचाने चेहरों की सरप्राइज एंट्री भी दर्शकों के अनुभव को और शानदार बना देती है। फिल्म की पटकथा अधिकतर हिस्सों में काफी कसी हुई है जो दर्शकों को बाँधकर रखती है।

क्या पुराने कल्ट ट्रैक्स का जादू कायम रहा?

साल 2007 में जब 'आवारापन' पहली बार सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, तो बॉक्स ऑफिस पर इसे बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली थी। लेकिन समय के साथ इसके कालजयी संगीत ने इसे एक 'कल्ट' फिल्म का दर्जा दिला दिया। 'आवारापन 2' के संगीतकारों को इस बात का भली-भांति अहसास था कि उनसे क्या उम्मीद की जा रही है। उन्होंने पुराने आइकॉनिक गानों को पूरी तरह बदलने की भूल नहीं की, बल्कि उन्हीं की आत्मा को नए अंदाज में पिरोने का प्रयास किया। फिल्म में जहां-जहां भावनात्मक मोड़ आते हैं, वहां बांसुरी की धुन के साथ 'तो फिर आओ' और 'तेरा मेरा रिश्ता पुराना' के नए संस्करण बैकग्राउंड में बजते हैं, जो दृश्यों के प्रभाव को दोगुना कर देते हैं। सुबोध शर्मा और साज भट्ट द्वारा गाए गए रीमेक मूल गानों की शिद्दत और गहराई से काफी हद तक मेल खाते हैं। इसके अलावा अरिजीत सिंह द्वारा गाया गया 'ये आवारापन', मिथुन द्वारा कंपोज किया गया 'वे जुनून' और अखिल सचदेवा का 'पिया घर आया' जैसे नए गाने भी फिल्म के डार्क और इमोशनल जॉनर में पूरी तरह फिट बैठते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि संगीत के मामले में यह एक बेहद ईमानदार और सफल प्रयास रहा है।

निर्देशन और मेकिंग

नितिन कक्कड़ ने इस सीक्वल के निर्देशन की कमान मोहित सूरी से अपने हाथों में ली है। नितिन यह अच्छी तरह समझते हैं कि दर्शक सिनेमाघर में क्या देखने आए हैं। वे जानते थे कि 'आवारापन 2' केवल एक आम सीक्वल नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी के लिए एक भावनात्मक सफर है जो पहली फिल्म के समय स्कूल या कॉलेज में हुआ करती थी। निर्देशक ने नॉस्टैल्जिया के साथ जोखिम भी उठाया है, लेकिन वे पूरी तरह केवल पुरानी यादों पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने फिल्म को एक नई और स्वतंत्र कहानी दी है, जिसका अपना एक भावनात्मक केंद्र है। यही वजह है कि यह फिल्म जहाँ एक तरफ इमरान के पुराने प्रशंसकों को भावुक करती है, वहीं दूसरी तरफ आज की युवा पीढ़ी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। फिल्म की सबसे बड़ी जीत यह है कि यह अपने पुराने अंदाज और भावनात्मक ड्रामे को दिखाने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करती।

क्या हैं फिल्म के मजबूत पहलू

शिवम पंडित का किरदार जैसे इमरान हाशमी के लिए ही बना है। उनका दर्द, उनकी खामोशी और चेहरे की शिद्दत पूरी फिल्म को खींचकर ले जाती है। पुराने कल्ट गानों का सही समय पर इस्तेमाल और नए गानों का बेहतरीन तालमेल फिल्म को एक संगीतमय भावनात्मक ऊंचाई देता है। फिल्म में एक्शन सिर्फ मारधाड़ के लिए नहीं रखा गया है, बल्कि हर एक्शन सीन शिवम के आंतरिक दर्द और उसकी भावनात्मक यात्रा से जुड़ा हुआ है। दिशा पाटनी का जिम्मेदार अभिनय, पूरन गब्बी की सनक और सुविंदर विक्की की गहराई फिल्म के प्रभाव को और मजबूत बनाती है।

कहां कमजोर पड़ी फिल्म

फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पहलू यह है कि यह कुछ जगहों पर पहली फिल्म के भावनात्मक बोझ पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाती है। जिन दर्शकों ने 2007 की 'आवारापन' नहीं देखी है, उन्हें शायद शिवम का यह दर्द उतना प्रभावित न करे। एक बार जब शिवम मानव तस्करी के रैकेट में कूद पड़ता है, तो कहानी काफी हद तक अनुमानित हो जाती है। दर्शक आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है। इंटरवल के बाद फिल्म की गति कुछ जगहों पर काफी धीमी हो जाती है। दृश्य जिस रफ्तार और छटपटाहट की माँग करते हैं, वहां स्क्रीनप्ले थोड़ा सुस्त पड़ जाता है। पूरन गब्बी का अभिनय अच्छा है, लेकिन उनका किरदार खौफनाक से ज्यादा 'सनकी' और 'अजीब' ज्यादा लगता है, जिससे एक बड़े विलेन का डर थोड़ा कम हो जाता है।

फाइनल वर्डिक्ट

'आवारापन 2' को अपनी पहचान की पूरी समझ है। यह एक ऐसा सीक्वल है जो उन प्रशंसकों के लिए बनाया गया है जिन्होंने 19 सालों में कभी शिवम पंडित के किरदार को अपने दिल से अलग नहीं किया। यह फिल्म पर्दे पर वही पुराना अकेलापन, वही रूहानी संगीत और वही घायल आशिक वापस लेकर आती है, लेकिन इस बार उसे जीने का एक नया मकसद भी देती है। इमरान हाशमी इस पूरी फिल्म के सरताज हैं। उनके अभिनय में एक जानी-पहचानी आत्मीयता है, और वही आत्मीयता इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। फिल्म में कुछ खामियाँ और सुस्त पल जरूर हैं, लेकिन जैसे ही हॉल में 'तो फिर आओ' की धुन गूंजती है और पर्दे पर शिवम पंडित की एंट्री होती है, आप समझ जाते हैं कि यह किरदार आज भी दर्शकों के दिलों पर क्यों राज करता है। 19 साल का लंबा इंतजार करने वाले फैंस के लिए 'आवारापन 2' उस पुरानी यादों की दुनिया में एक यादगार और वफादार वापसी है।

रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार

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