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Batwara 1947: विभाजन के दर्द को दिखाती है 'बंटवारा 1947', सनी देओल की दमदार परफॉर्मेंस, प्रीति जिंटा का धांसू कमबैक

 Written By: Himanshi Tiwari
 Published : Aug 14, 2026 02:00 pm IST,  Updated : Aug 17, 2026 12:33 pm IST

डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की 'बंटवारा 1947' 14 अगस्त को रिलीज हो चुकी है। सनी देओल, शबाना आजमी, प्रीति जिंटा और अभिमन्यु सिंह ने अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों को कहानी से जोड़ने में कामयाबी हासिल की।

Batwara 1947
बंटवारा 1947 रिव्यू Photo: INSTAGRAM/@IAMSUNNYDEOL
  • फिल्म रिव्यू: बंटवारा 1947 रिव्यू
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: Aug 14, 2015
  • डायरेक्टर: Rajkumar Santoshi
  • शैली: historical period drama

असगर वजाहत के अवॉर्ड-विनिंग नाटक 'जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई' पर आधारित 'बंटवारा 1947' इमोशन और देशभक्ति से भरपूर है। यह फिल्म बटवारे में हुई बर्बादी और दर्द की कहानियों को दिखाती है।  'घायल', 'दामिनी' और 'घातक' के बाद 'बंटवारा 1947' से राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी ने आते ही धूम मचा दी। बटवारा भारत और पाकिस्तान के इतिहास के सबसे दर्दनाक चैप्टर में से एक है। इस फिल्म में मां-बेटे के प्यार से लेकर विभाजन का दर्द तक सबकुछ दिखाया गया है। कई सीन में सनी देओल का 'गदर' वाला गुस्सा भी देखने को मिला।

'बंटवारा 1947' की कहानी

पंजाब इलाके के लाहौर में सेट यह कहानी तब शुरू होती है, जब नए आजाद हुए देश भारत और पाकिस्तान लाखों बेघर रिफ्यूजी से भर जाते हैं। जिन परिवारों ने अपने घर खो दिए हैं, उन्हें अनजान माहौल में अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उनमें से एक सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) है, जो अपनी पत्नी हमीदा (प्रीति जिंटा), बेटे जावेद (करण देओल) और बेटी तनवीर के साथ लखनऊ से लाहौर चला जाता है। एक रिफ्यूजी कैंप में कुछ समय बिताने के बाद सिकंदर मिर्जा के परिवार को एक बड़ी हवेली दी जाती है, जिसे उसके हिंदू मालिकों ने छोड़ दिया था।

हालांकि, उनकी नई शुरुआत में एक अनचाहा मोड़ तब आता है, जब उन्हें पता चलता है कि एक बुजुर्ग हिंदू औरत माई दुर्गावती (शबाना आजमी) अभी भी वहीं रह रही है। वह अपने घर से जाने से मना कर देती है और जोर देती है कि हवेली उसके परिवार की है। इसके बाद दो परिवारों के बीच टकराव होता है, जिन्होंने सब कुछ खो दिया है। कहानी में देखने को मिलता है कि सिकंदर अपने परिवार को बचाने की कोशिश करता है और साथ ही माई दुर्गावती के दुश्मनों से भी निपटता है। कहानी का अंत काफी इमोशनल कर देने वाला होता है। पनप रही नफरत हार जाती है और इंसानियत की जीत होती है।

'बंटवारा 1947' के एक्टर्स की परफॉर्मेंस

सनी देओल सिकंदर मिर्जा के रोल में छा गए। वह अपने किरदार में हमेशा की तरह गहराई और दमदार अंदाज लाते हैं, खासकर भावुक और एक्शन सीन में। उनका कैरेक्टर अपने परिवार को बचाने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है और सनी उन पलों को कामयाब बनाने में सफल रहे हैं। उनका एक्शन देख आपको गदर फिल्म याद आ जाएगी।

हालांकि, शबाना आजमी फिल्म का दिल हैं। उनकी परफॉर्मेंस कहानी में बहुत इमोशनल है, जो दर्शकों को रोने पर मजबूर कर देती है। उनके कुछ सीन सच में दिल तोड़ने वाले हैं, जो आप कभी नहीं भूल सकते।

प्रीति जिंटा लगभग 8 साल के लंबे ब्रेक के बाद फिल्म 'बंटवारा 1947' से बड़े पर्दे पर वापसी आईं। हमीदा मिर्जा के रोल में प्रीति ने दिल जीत लिया। हालांकि, एक्ट्रेस का रोल थोड़ा ज्यादा अच्छा लिखा जा सकता था।

करण देओल का किरदार वाकई दिलचस्प और संभावनाओं से भरा था। उनके कैरेक्टर के पास कहानी को देने के लिए काफी कुछ था, जिसे थोड़े और निखार और गहराई के साथ पेश किया जाता तो उनकी परफॉर्मेंस और भी प्रभावशाली बन सकती थी। फिलहाल उनके पिता संग उनकी जोड़ी अच्छी लगी, उनके लुक में यंग सनी की झलक दिखती है।

हबीब काजमी के रोल में ली फजल कहानी में एक और लेयर जोड़ते हैं। वह बिल्कुल अलग एनर्जी के साथ दिखते हैं, जैसे नरम, सोचने वाले और लगभग पोएटिक। सिकंदर मिर्जा के साथ उनके सीन में एक शांति है जो उनके आस-पास की हिंसा के साथ खूबसूरती से अलग है।

याकूब पहलवान के किरदार में अभिमन्यु सिंह विलेन के रूप में अपनी मजबूत छाप छोड़ते हैं। वह सही मायने में खतरनाक लगते हैं और उस नफरत का चेहरा बन जाते हैं, जिसके खिलाफ इंसानियत की जीत होती है।

सपोर्टिंग कैरेक्टर बटवारा को एक स्टार की कहानी से बड़ा महसूस कराते हैं। यह सही मायने में एक ग्रुप फिल्म है। तनवीर मिर्जा के रोल में खुशी हजारे ने ठीक-ठाक काम किया, जबकि कनिका कपूर, ईशा संधीर, खालिद सिद्दीकी, रुखसार रहमान, परमिंदर सिंह कैंथ, शिविका ऋषि, अंबिका नागवानी, पंकज रैना, राजन मोदी और चंदन दिलावर जैसे सपोर्टिंग कास्ट का कहानी में खास योगदान रहा।

बंटवारा 1947 का निर्देशन

राजकुमार संतोषी का निर्देशन भारत-पाकिस्तान की सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों के साझा दर्द को प्रभावी ढंग से दिखाता है। फिल्म याद दिलाती है कि बंटवारे ने सिर्फ देश को नहीं बांटा, बल्कि परिवारों को भी अलग कर दिया और लोगों को अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने के लिए मजबूर किया। फिल्म की कहानी बहुत मजबूत है और इसका सब्जेक्ट भी बहुत इमोशनल है। पहला हाफ काफी अच्छा है और आगे भी आपकी दिलचस्पी बनाए रखता है। हालांकि, दूसरा हाफ थोड़ा खिंचा हुआ लगता है। डायरेक्शन और एडिटिंग और शानदार हो सकती थी, खासकर कुछ हिस्सों में जहां फिल्म रिपिटिटिव लगने लगती है। सनी देओल के एक्शन और हीरो वाले सीन्स थोड़े ज्यादा हैं। कुछ सीन बहुत ज्यादा ड्रामैटिक और लार्जर-दैन-लाइफ हो जाते हैं, जो हमेशा फिल्म की इमोशनल सेटिंग में फिट नहीं बैठते। कुछ डायलॉग इमोशनल है, लेकिन सीन के अनुसार उनते बेहतरीन नहीं है। 

म्यूजिक

बैकग्राउंड स्कोर अच्छा काम करता है और फिल्म के इमोशनल मूड को और अच्छे से पेश करता है। शुक्र है कि कहानी में कोई फालतू गाने नहीं हैं। शबाना आज़मी का एक गाना सबसे अलग है और खास तौर पर इमोशनल है, जिसमें भगवान श्री राम और रानी कौशल्या का जिक्र है।

टेक्निकल एनालिसिस

राजकुमार संतोषी और सनी देओल पहले भी साथ में एक्शन से भरपूर फिल्में बना चुके हैं। टेक्निकली, बंटवारा 1947 एक उथल-पुथल वाले दौर के माहौल को काफी अच्छे से फिर से बनाने में कामयाब रही है। प्रोडक्शन डिजाइन और कॉस्ट्यूम उस दौर की सेटिंग बनाने में मदद करते हैं, जबकि सिनेमैटोग्राफी किरदारों के आस-पास की उदासी और अनिश्चितता को दिखाती है।

फिल्म कभी-कभी रफ्तार खो देती है, खासकर जब कहानी अपने मुख्य इमोशनल टकराव से दूर चली जाती है। बैकग्राउंड स्कोर ड्रामैटिक हिस्सों को पूरा करता है, लेकिन अपने इमोशन को नैचुरली डेवलप होने देने के बजाय उन्हें आगे बढ़ा देती है।

टेक्निकल में सबसे बड़ी कमी यह थी कि पार्टीशन जैसे भावनात्मक विषय पर बनी कहानी परतदार और दिलचस्प होनी चाहिए थी, लेकिन बार-बार आवाज रुक-रुक के आने से कहानी का मजा खराब होने लगता है।

बंटवारा 1947 की सबसे खात बात

फिल्म 'बंटवारा 1947' की सबसे बड़ी ताकत इसका सब्जेक्ट है। पार्टीशन ड्रामा पार्टीशन को आम पॉलिटिकल कहानी से आगे देखने की कोशिश करता है और उन आम लोगों पर फोकस करता है, जिन्हें अपने घर, यादें और पहचान छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। शबाना आजमी का माई वाला कैरेक्टर किसी ऐसे व्यक्ति का दर्द दिखाता है, जिसने लगभग सब कुछ खो दिया है। दूसरी ओर, माई और सिकंदर के बीच मां-बेटे का खूबसूरत रिश्ता दिखाया जाता है। एक मुस्लिम व्यक्ति और एक बुजुर्ग हिंदू महिला, जिन्हें बंटवारा अलग करना चाहता था। धीरे-धीरे एक-दूसरे का सहारा बनते हैं और परिवार की तरह जुड़ जाते हैं।

बंटवारा 1947 कैसी है

देश बंट सकते हैं। घर बंट सकते हैं। जमीन बंट सकती है, लेकिन इंसानियत का बटवारा नहीं हो सकता है। 'बंटवारा 1947' में एक इमोशनल पार्टीशन ड्रामा के सारे एलिमेंट हैं - एक्शन, फैमिली ड्रामा, देशभक्ति, इमोशन और एक मजबूत सेंट्रल कॉन्फ्लिक्ट। सेकंड हाफ और अच्छा हो सकता था। वहीं डायलॉग और शार्प हो सकते थे। कुछ सीन से हीरोइज्म और एक्शन कम ड्रामैटिक हो सकते थे। हालांकि, कहानी बहुत शानदार है। ये फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए।

बंटवारा 1947 के लिए 3.5/5 स्टार।

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